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निठारी कांड: जल्लाद तैयार था, फंदा भी रेडी, 12 साल पहले मेरठ जेल में फांसी से कैसे बचा था सुरेंद्र कोली?

2014 में सुरेंद्र कोली को फांसी होने ही वाली थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को एक फ़ैसला सुनाकर उसकी फांसी पर रोक लगा दी. लगभग 19 साल जेल में रहने के बाद उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया, लेकिन आज़ाद होने के एक साल से भी कम समय बाद वह हरिद्वार में अपनी चाय की दुकान पर लटका हुआ मिला.

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सुरेंद्र कोली को 2014 में मेरठ जेल में फांसी दी जानी थी. (Photo: ITG)
सुरेंद्र कोली को 2014 में मेरठ जेल में फांसी दी जानी थी. (Photo: ITG)

आखिरकार सुरेंद्र कोली तक फांसी का फंदा पहुंच ही गया. यह मेरठ जेल में 2014 में नहीं हुआ, जहां जल्लाद ने फंदा तैयार किया था और उसकी मजबूती जांची थी, बल्कि शुक्रवार को हरिद्वार में हुआ, जहां सभी आरोपों से बरी होने के बाद वह चाय की दुकान चला रहा था. निठारी हत्याकांड में पहले दोषी ठहराए गए कोली को 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया था. हालांकि जेल से रिहा होने के एक साल के अंदर ही उसकी मौत हो गई.

लेकिन आम लोगों की नजर में कोली वह व्यक्ति था जो नाबालिग लड़कियों को बंगले में बुलाता था, उनका यौन शोषण करके उन्हें मार डालता था और उनकी लाशों को नाले में फेंक देता था. इन आरोपों से लोगों में भारी गुस्सा फैल गया, विरोध-प्रदर्शन हुए और मीडिया में भी इसकी खूब चर्चा हुई. कोर्ट में केस कमज़ोर पड़ने से पहले वह निठारी कांड का मुख्य चेहरा बन गया था.

पीड़ितों के कंकाल और कपड़े D-5 के पास एक नाले से मिले थे. 

सुरेंद्र कोली नोएडा के D-5 बंगले से मौत की सजा पाने वाले कैदी कैसे बना?

सुरेंद्र कोली नोएडा के निठारी में मोनिंदर सिंह पंधेर के घर पर काम करता था, उसे दिसंबर 2006 में उसके मालिक के साथ गिरफ़्तार किया गया था. इसके बाद जो मुक़दमा चला, वह काफ़ी हद तक कोली के कथित कबूलनामे और D-5 के पास की नाली और खुली ज़मीन से इंसानी अवशेष मिलने पर आधारित था.

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फरवरी 2009 में गाज़ियाबाद की एक स्पेशल CBI कोर्ट ने एक टीनएज लड़की के रेप और मर्डर के मामले में कोली और पंधेर को दोषी ठहराया और दोनों को मौत की सज़ा सुनाई. बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस मामले में पंधेर को बरी कर दिया, लेकिन कोली की सज़ा को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में कोली की मौत की सज़ा को बरकरार रखा. 

इसके बाद और भी मुकदमे चले. एक के बाद एक मामलों में कोली को दोषी ठहराया गया यहां तक कि उसे निठारी के 13 मामलों में मौत की सज़ा सुनाई गई. सालों तक सरकारी पक्ष की दलीलों और कोली के कबूलनामे की वजह से उसकी पहचान निठारी हत्याकांड से ही जुड़ गई. 

मेरठ जेल में फांसी से कैसे बचा कोली

सितंबर 2014 तक कोली पहले मामले में अपनी अपील और रिव्यू की प्रक्रिया पूरी कर चुका था और उसकी दया याचिका भी खारिज हो गई थी. उसे मेरठ जेल भेज दिया गया, जहां 8 सितंबर की सुबह उसे फांसी दी जानी थी. जल्लाद को बुला लिया गया था और जेल प्रशासन फांसी की तैयारी कर रहा था. 

लेकिन 7 सितंबर की देर रात, सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. जस्टिस एआर दवे और जस्टिस एचएल दत्त की एक इमरजेंसी बेंच ने जस्टिस दत्त के घर पर इस मामले की सुनवाई की. रात करीब 1 बजे, यानी कोली को फांसी दिए जाने से कुछ ही घंटे पहले कोर्ट ने उसकी फांसी पर रोक लगा दी.

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फांसी का फंदा तैयार था. कोली उससे बच गया. वह ज़िंदा रहा. 

जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में हुई देरी की वजह से उसकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया. लेकिन कोली जेल में ही रहा क्योंकि निठारी के दूसरे मामलों की सुनवाई अदालतों में चल रही थी. 

कोली का केस कैसे कमज़ोर पड़ने लगा

अक्टूबर 2023 में मामले ने एक बड़ा मोड़ लिया. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोली को 12 मामलों में और पंढेर को उनके खिलाफ़ चल रहे मामलों में बरी कर दिया. कोर्ट ने उस जांच में गंभीर कमियां पाईं, जिसे सालों तक निठारी हत्याकांड का समाधान बताया जा रहा था. पंढेर तो आज़ाद हो गए, लेकिन कोली नहीं.

इस बदलाव की मुख्य वजह वे सबूत थे, जिनसे कभी कोली की सज़ा तय मानी जा रही थी. कोली के वकील ने दलील दी कि उसका कबूलनामा बिना किसी ठोस कानूनी मदद के, लगातार लगभग 60 दिनों तक पुलिस कस्टडी में रहने के बाद दर्ज किया गया था. कोली ने टॉर्चर और जबरन बयान रटवाए जाने का भी आरोप लगाया था. इसलिए हाई कोर्ट ने कोली के कबूलनामे को अपनी मर्ज़ी से न दिया गया और अविश्वसनीय माना.

बरामद चीज़ों की भी जांच-पड़ताल हुई. कोर्ट ने बरामद अवशेषों को सिर्फ़ कोली से जोड़ने और अभियोजन पक्ष की ओर से उनकी बरामदगी के तरीके के बयानों में कमियां पाईं. घर के अंदर खून के ऐसे कोई निशान नहीं मिले जो वहां हत्या और शव के टुकड़े-टुकड़े करने के अभियोजन पक्ष के दावों की पुष्टि करते हों, जबकि फॉरेंसिक प्रक्रिया की कड़ी में भी बड़ी कमियां थीं.

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कोली पर लगे सनसनीखेज आरोपों ने सालों तक सुर्खियां बटोरीं, लेकिन कोर्ट में वे सबूत टिक नहीं पाए. 

...और बरी हो गया कोली

11 नवंबर, 2025 को, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस सूर्यकांत और विक्रम नाथ की तीन जजों की बेंच ने कोली की आखिरी बची हुई सज़ा को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि एक ही सबूत के आधार पर दो अलग-अलग नतीजे कानूनी तौर पर एक साथ नहीं हो सकते और इस स्थिति को "न्याय का स्पष्ट मज़ाक" बताया.

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर किसी और मामले में उसकी ज़रूरत न हो, तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए. एक दिन बाद, 12 नवंबर को कोली ग्रेटर नोएडा की कसना जेल से बाहर आ गया। उसने लगभग 19 साल जेल में बिताए थे. 

रिहा होने के बाद कोली नोएडा के निठारी स्थित D-5 बंगले से दूर चला गया. आखिरकार कोली हरिद्वार में मिला जहां पुलिस के मुताबिक वह कई महीनों से चाय की दुकान चला रहा था. हरिद्वार में वह लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जी रहा था. वही आदमी जिसका चेहरा भारत के सबसे भयानक अपराधों में से एक के आरोपी के तौर पर टीवी स्क्रीन और अख़बारों में छाया हुआ था. 

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फिर, शुक्रवार 18 सितंबर को कोली हरिद्वार में अपनी चाय की दुकान में फंदे से लटका हुआ मिला. 

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