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$110 के पास ब्रेंट क्रूड... हरकत में आया अमेरिका, दाम घटाने के लिए खोला इमरजेंसी रिजर्व

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने के बीच अमेरिका ने तेल की सप्लाई बढ़ाने की तैयारी की है. अमेरिकी सरकार अपने आपात भंडार से 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल कंपनियों को देने की योजना बना रही है.

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अमेरिकी सरकार अपने आपात भंडार से 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल कंपनियों को देने की योजना बना रही है.  (Photo: AP)
अमेरिकी सरकार अपने आपात भंडार से 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल कंपनियों को देने की योजना बना रही है. (Photo: AP)

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव कम करने के लिए अमेरिका अपने इमरजेंसी ऑयल रिजर्व का सहारा लेने जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने और तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ने के बीच अमेरिकी सरकार अपने स्ट्रैटेजिक रिजर्व से 1.7 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल रिलीज करने की योजना बना रही है. वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड (WTI) शनिवार को 3.51% चढ़कर 101.4 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 3.72% चढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया.

अमेरिका के इस कदम का मकसद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों में तेजी पर लगाम लगाने की कोशिश करना है. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की एक बड़ी वजह दुनिया में तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता है. ईरान के साथ अमेरिका के युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर हमलों के कारण तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है. इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई बाधाओं ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक है. यहां से तेल की सप्लाई प्रभावित होने का मतलब है कि दुनिया के कई देशों तक कच्चा तेल पहुंचने में परेशानी हो सकती है.

जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को लगता है कि आने वाले दिनों में तेल की कमी हो सकती है, तो कीमतें बढ़ने लगती हैं. इसी दबाव को कम करने के लिए अमेरिका अपने आपात भंडार से अतिरिक्त तेल बाजार में लाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने शुक्रवार को तेल की नई अदला-बदली योजना के लिए कंपनियों से प्रस्ताव मांगे. इसके तहत कंपनियां फिलहाल सरकार से तेल ले सकेंगी और बाद में उसे वापस करेंगी.

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तेल पर क्या है अमेरिका की योजना?

अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) ऐसा आपात भंडार है, जिसमें संकट के समय इस्तेमाल के लिए कच्चा तेल जमा रखा जाता है. युद्ध, तेल की सप्लाई में रुकावट या कीमतों में असामान्य तेजी जैसी परिस्थितियों में सरकार इस भंडार का इस्तेमाल कर सकती है. इस बार अमेरिका अपने भंडार से 17 मिलियन यानी करीब 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की तैयारी में है. यह तेल कंपनियों को अदला-बदली की व्यवस्था के तहत दिया जाएगा. यानी कंपनियों को अभी तेल मिलेगा, लेकिन उन्हें बाद में तय शर्तों के मुताबिक तेल लौटाना होगा.

इस व्यवस्था का फायदा यह है कि बाजार में तत्काल तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है. जब कंपनियों को अतिरिक्त तेल मिलता है, तो उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बाजार में उतनी ज्यादा खरीदारी नहीं करनी पड़ सकती. इससे कीमतों पर बने दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, यह जरूरी नहीं कि भंडार से तेल निकालते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिर जाएं. अगर युद्ध जारी रहता है, तेल के जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या सप्लाई में बड़ी कमी बनी रहती है, तो कीमतें ऊंची रह सकती हैं.

पहले इस प्लान को नहीं मिला था समर्थन

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अमेरिका की यह पहल मार्च में किए गए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वादे से भी जुड़ी है. उस समय अमेरिका ने अपने रणनीतिक भंडार से 17.2 करोड़ बैरल तेल उपलब्ध कराने का वादा किया था. यह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के करीब 30 सदस्य देशों की साझा योजना का हिस्सा था. इस पहल के तहत दुनिया भर में आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का लक्ष्य रखा गया था. इसका उद्देश्य तेल की सप्लाई में आई बाधाओं के असर को कम करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार को संभालना था. लेकिन इस योजना को लागू करना आसान नहीं रहा.

अमेरिका की ओर से पहले की गई एक पेशकश को कंपनियों से बहुत कम प्रतिक्रिया मिली. जून में कंपनियों ने केवल करीब 5 लाख बैरल तेल उधार लेने में दिलचस्पी दिखाई. इसकी एक वजह योजना की शर्तें भी थीं. कंपनियों को उधार लिए गए तेल के बदले बाद में 24 फीसदी तक अतिरिक्त कच्चा तेल लौटाना पड़ सकता था. यानी तेल लेने वाली कंपनियों को भविष्य में मूल मात्रा से ज्यादा तेल वापस करना होता. ऐसी शर्तों के कारण उनके लिए यह सौदा आकर्षक नहीं रहा. अब अमेरिका की नई पेशकश पर नजर रहेगी. अगर कंपनियां ज्यादा मात्रा में तेल लेने के लिए आगे आती हैं, तो बाजार में अतिरिक्त सप्लाई पहुंचाने की योजना को मदद मिल सकती है.

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रूसी डीजल की सप्लाई पर भी बनी बात

तेल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अमेरिका की कोशिशें केवल अपने भंडार तक सीमित नहीं हैं. इस महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच रूसी डीजल के निर्यात की अनुमति को लेकर भी सहमति बनी है. शुरुआत में करीब 3 लाख टन डीजल जारी होने की उम्मीद है. डीजल की सप्लाई बढ़ने से उन बाजारों को राहत मिल सकती है, जहां इसकी उपलब्धता को लेकर दबाव है.

हालांकि, इस कदम को लेकर राजनीतिक विवाद भी है. यूक्रेन और यूरोपीय नेताओं ने रूस को राहत देने की आलोचना की है. उनका तर्क है कि रूसी तेल उत्पादों के निर्यात में ढील देने से मॉस्को को आर्थिक फायदा मिल सकता है. इससे साफ है कि तेल की कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिशें केवल आर्थिक फैसला नहीं हैं. इनके साथ युद्ध, प्रतिबंध और देशों के राजनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं.

G7 की 10 करोड़ बैरल तेल की है योजना

दुनिया के सात प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह जी7 ने भी 2 अक्टूबर को आपात तेल जारी करने की अलग योजना घोषित की थी. इसके तहत करीब 10 करोड़ बैरल तेल चार महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कराने की योजना है. यह पहल अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के माध्यम से आगे बढ़ाई जाएगी. इस योजना में डीजल की सप्लाई बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि बाजार में उसकी कमी को दूर करने में मदद मिल सके.

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अमेरिका और जी7 की इन कोशिशों का साझा मकसद बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना है. जब सप्लाई बढ़ती है, तो मांग और उपलब्धता के बीच का अंतर कम हो सकता है. इससे कीमतों में तेजी पर कुछ हद तक रोक लगने की उम्मीद रहती है. लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि आपात भंडार से तेल निकालना स्थायी समाधान नहीं है. यह संकट के समय बाजार को राहत देने का एक तरीका है. अगर तेल की सामान्य सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो सिर्फ भंडार से तेल निकालकर कीमतों को लगातार नीचे रखना मुश्किल हो सकता है.

भारत में तेल की कीमतों पर कितना असर?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर भी पड़ता है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है. ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने पर देश के लिए आयात का खर्च बढ़ जाता है. इसका असर तेल कंपनियों की लागत और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. अगर अमेरिका की योजना और दूसरे देशों की पहल से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ती है और कीमतों में गिरावट आती है, तो भारत को भी राहत मिल सकती है. इससे कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है.

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हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी. घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव के अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर, तेल कंपनियों की लागत, केंद्र और राज्य सरकारों के कर तथा दूसरे खर्चों का भी असर पड़ता है. इसलिए अमेरिकी योजना से भारतीय उपभोक्ताओं को कितनी राहत मिलेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कितनी और कितने समय तक गिरावट आती है. अगर सप्लाई की चिंता बनी रहती है और कच्चा तेल 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर रहता है, तो राहत सीमित हो सकती है.

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