भूख और कुपोषण से निपटना आज पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है. जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, फसलों में नए कीटों का हमला और प्राकृतिक संसाधनों का घटता स्तर कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए वैज्ञानिक सहयोग और नई तकनीकों की जरूरत बढ़ रही है. ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) भारत की कृषि विशेषज्ञता को दुनिया तक पहुंचाने और वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही है.
पिछले पांच दशकों में ICAR ने विभिन्न देशों, अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों और बहुपक्षीय संगठनों के साथ 100 से अधिक समझौते किए हैं. इनमें से 72 समझौते फिलहाल सक्रिय हैं, जो 37 देशों तक फैले हुए हैं. इनमें विभिन्न देशों के साथ 49 समझौते, अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्रों के साथ 12 साझेदारियां और कई देशों से जुड़े 11 सहयोग शामिल हैं. पिछले एक दशक में ही 31 सक्रिय समझौते किए गए हैं, जो भारतीय कृषि अनुसंधान की बढ़ती वैश्विक अहमियत को दर्शाते हैं.
हरित क्रांति से लेकर आधुनिक कृषि तकनीकों तक योगदान
भारत की हरित क्रांति ने दिखाया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नई तकनीकों और उनके प्रभावी इस्तेमाल से कृषि उत्पादन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. अब ICAR फसल सुधार, संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और कृषि तकनीकों के विकास से जुड़े अपने अनुभव दूसरे देशों के साथ साझा कर रहा है. भारत की भूमिका अब विदेशी तकनीकों को अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश अपने शोध और तकनीकी समाधानों से भी वैश्विक कृषि विकास में योगदान दे रहा है.
BRICS कृषि अनुसंधान मंच (BRICS-ARP) के जरिए भारत विभिन्न देशों के बीच वैज्ञानिक जानकारी और तकनीकों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दे रहा है. वहीं, ASEAN-भारत सहयोग के तहत फसल सुधार, बागवानी, कृषि मशीनीकरण, पशुधन और टिकाऊ खेती जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करने की संभावनाएं हैं. G20 और BIMSTEC जैसे मंच भी फसलों में फैलने वाले कीटों और कृषि रोगों से निपटने के लिए साझा प्रयासों को मजबूत करते हैं.
मोटे अनाज और AI पर भी जोर
मोटे अनाज यानी मिलेट्स को बढ़ावा देने में भारत अहम भूमिका निभा रहा है. हैदराबाद स्थित ICAR के भारतीय मिलेट्स अनुसंधान संस्थान में MAHARISHI पहल का सचिवालय है. इसके जरिए मोटे अनाज पर दूसरे देशों के साथ मिलकर रिसर्च की जाती है और जानकारी साझा की जाती है. वहीं, मिलेट्स का वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र इनकी खेती, उत्पादन, प्रोसेसिंग और नए उत्पाद बनाने की तकनीकों पर काम करता है. साथ ही, लोगों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है. इन कोशिशों से मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा मिलेगा, लोगों को पौष्टिक भोजन मिल सकेगा और बदलते मौसम में भी खेती को बनाए रखने में मदद मिलेगी.
ICAR आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल और पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी योगदान दे रहा है. परिषद के संस्थानों ने पशु बीमारियों से निपटने के लिए टीके और तकनीकें विकसित की हैं. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए इन तकनीकों को दूसरे देशों तक पहुंचाने से पशुधन की सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को फायदा मिल सकता है.
ग्लोबल साउथ के देशों के साथ बढ़ेगा सहयोग
करीब 50 देशों के शोध संगठनों को जोड़ने के लिए प्रस्तावित ग्लोबल साउथ अनुसंधान मंच कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक ज्ञान को साझा करने का नया अवसर दे सकता है. इससे विभिन्न देशों की शोध क्षमता बढ़ाने और कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान में मदद मिल सकती है.
वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए ICAR का योगदान केवल समझौतों की संख्या से नहीं, बल्कि साझा तकनीकों, मजबूत शोध संस्थानों और कृषि समस्याओं के समाधान से आंका जाएगा. भारत का लक्ष्य अपनी कृषि विशेषज्ञता को दुनिया के साथ साझा करना और ऐसी टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देना है, जो बढ़ती आबादी की खाद्य एवं पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकें.
(यह लेख DARE के सचिव और ICAR के महानिदेशक एम. एल. जाट और ICAR के सहायक महानिदेशक (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) नवीन पी. सिंह ने लिखा है. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं)