इजरायल में चुनाव के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी को लेकर एक नई संभावना की चर्चा हो रही है. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू के सहयोगी उनकी पार्टी लिकुड और गादी आइजनकोट की याशर पार्टी के बीच गठबंधन कराने की कोशिश कर रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिनिधियों ने भी इजरायली अधिकारियों से इस संभावना पर चर्चा की है.
दरअसल, यह चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब चुनाव से पहले के सर्वे में ईसेनकोट की पार्टी को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से आगे दिखाया गया है. हालांकि, किसी भी राजनीतिक खेमे को 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद नेसेट में बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें मिलती नहीं दिख रही हैं.
वहीं आइजनकोट ने सार्वजनिक तौर पर नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने से इनकार किया है. ऐसे में गठबंधन की संभावना फिलहाल राजनीतिक चर्चा तक सीमित है. अंतिम तस्वीर इलेक्शन रिजल्ट और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ता पर निर्भर करेगी.
चुनावी सर्वे में क्या तस्वीर सामने आई?
दरअसल, द जेरूसलम पोस्ट ने 23 अक्टूबर को इजरायली ब्रॉडकास्टर N12 और चैनल 13 के सर्वे के आधार पर चुनावी आंकड़े प्रकाशित किए थे. N12 के सर्वे में ईसेनकोट की याशर पार्टी को 23 सीटें और नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 19 सीटें मिलने का अनुमान था. चैनल 13 के सर्वे में याशर को 20 और लिकुड को 19 सीटें मिलने की संभावना जताई गई थी.
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गठबंधन के स्तर पर भी दोनों खेमे बहुमत से दूर दिखे. N12 के सर्वे में ईसेनकोट के विपक्षी खेमे को 55 सीटें और नेतन्याहू के खेमे को 51 सीटें मिलने का अनुमान था. चैनल 13 के सर्वे में दोनों खेमों को 52 और 49 सीटें मिलने की संभावना जताई गई.
मालूम हो, इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है. ऐसे में अगर कोई भी खेमा अपने दम पर बहुमत तक नहीं पहुंचता, तो सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन लेना अहम हो सकता है.
नेतन्याहू क्यों चाहते हैं ईसेनकोट के साथ गठबंधन?
दरअसल, नेतन्याहू निजी बातचीत में अमेरिकी और यूरोपीय अधिकारियों से कह रहे हैं कि आइजनकोट के साथ साझेदारी से वह पहले के मुकाबले ज्यादा मध्यमार्गी सरकार बना सकते हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी सरकार में नेतन्याहू अपने पुराने दक्षिणपंथी सहयोगियों में से कुछ को बाहर कर सकते हैं. इनमें ओत्जमा येहुदित पार्टी के नेता और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्विर का नाम भी शामिल है.
नेतन्याहू ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने यह तर्क भी दिया है कि उनके नेतृत्व वाली सरकार ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की सबसे मजबूत साझेदार होगी.
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हालांकि, ट्रंप प्रशासन में भी इस विचार पर एक राय नहीं है. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि बेन ग्विर के प्रभाव के बिना नेतन्याहू ज्यादा मध्यमार्गी सरकार चला सकते हैं. वहीं, कुछ अधिकारी नेतन्याहू पर भरोसा नहीं करते. उनका मानना है कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहने के लिए पहले भी राजनीतिक सहयोगियों से अलग हो चुके हैं.
वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू के एक और कार्यकाल का समर्थन किया है. 18 अक्टूबर को उन्होंने लिकुड नेता नेतन्याहू को 'महान योद्धा प्रधानमंत्री' बताया था. साथ ही उन्हें ईरान के खिलाफ लड़ाई में उन्हें शांति के लिए साझेदार कहा था. ट्रंप ने 25 अक्टूबर को भी नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया. वह इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग से नेतन्याहू को भ्रष्टाचार के मामलों में माफी देने की मांग भी कर चुके हैं.
लिकुड पार्टी के एक अधिकारी ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा कि ट्रंप चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द से जल्द एक स्थिर और भरोसेमंद इजरायली सरकार बने. नेतन्याहू ही इस भूमिका के लिए सही व्यक्ति हैं.लहालांकि, अमेरिकी प्रशासन में गठबंधन सरकार को लेकर मतभेद बने हुए हैं. इसलिए ट्रंप के समर्थन के बावजूद यह तय नहीं है कि ईसेनकोट के साथ समझौता हो पाएगा.
ईसेनकोट ने गठबंधन से इनकार किया
गादी आइजनकोट और उनके सहयोगियों ने नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने का विरोध किया है. वे 7 अक्टूबर के हमले और उसके बाद हमास के साथ युद्ध को संभालने के नेतन्याहू के तरीके पर सवाल उठाते रहे हैं. उनकी आलोचना का एक मुद्दा नेतन्याहू का दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी दलों के साथ गठबंधन भी रहा है.
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इजरायली रेडियो स्टेशन 103FM को दिए बयान में आइजनकोट ने कहा था, "बिल्कुल नहीं. मैं नेतन्याहू के अधीन काम नहीं करूंगा, रोटेशन समझौते में भी नहीं." उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसा करने के बजाय वह इस्तीफा देना पसंद करेंगे.
आइजनकोट के सामने एक और राजनीतिक चुनौती है. अगर उनका खेमा बहुमत से दूर रहता है, तो उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन चाहिए होगा. रिपोर्ट के मुताबिक, एक विकल्प इजरायल के अरब दलों जॉइंट लिस्ट और रा'आम से बातचीत करना हो सकता है. ये दल देश के फिलिस्तीनी मूल के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
लेकिन आइजनकोट के कुछ सहयोगी ऐसे विकल्प का पहले ही विरोध कर चुके हैं. इस वजह से सरकार बनाने के लिए उनके पास उपलब्ध विकल्प सीमित हो सकते हैं.
नेतन्याहू के साथ गठबंधन पर भरोसे का संकट
आइजनकोट के लिए नेतन्याहू के साथ सरकार बनाना राजनीतिक जोखिम भी हो सकता है. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में 2020 के घटनाक्रम का उदाहरण दिया गया है. उस समय पूर्व जनरल बेनी गैंट्ज ने नेतन्याहू के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन बाद में लिकुड के साथ एकता सरकार बनाने पर सहमति जताई.
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उस समझौते के तहत नेतन्याहू को पहले प्रधानमंत्री बनना था और बाद में गैंट्ज को यह पद मिलना था. हालांकि, गठबंधन उनके पद संभालने से पहले ही टूट गया. उस समय नेतन्याहू पर आरोप लगे थे कि उन्होंने समझौते को टूटने दिया ताकि गैंट्ज प्रधानमंत्री न बन सकें.
इजरायली पोलस्टर मेनाखेम लाजर ने मीडिया से कहा कि राजनीतिक क्षेत्र में नेतन्याहू पर भरोसे की कमी है. उन्होंने इसे ईसेनकोट के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बताया.
क्या नेतन्याहू को राजनीतिक गतिरोध से फायदा मिल सकता है?
दूसरी ओर, नेतन्याहू के पुराने सहयोगी बेन ग्विर भी गठबंधन की चर्चा से नाराज बताए गए हैं. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, उन्होंने सोमवार को नेतन्याहू और लिकुड पर अपनी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया.
बेन ग्विर ने दावा किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने यूरोपीय देशों को भरोसा दिलाया है कि अगली सरकार ऐसी गठबंधन सरकार होगी, जिसमें उन्हें शामिल नहीं किया जाएगा. उन्होंने नेतन्याहू से दक्षिणपंथी दलों के साथ खड़े रहने और पूरी तरह दक्षिणपंथी सरकार बनाने की मांग की.
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अगर चुनाव में कोई भी खेमा बहुमत हासिल नहीं करता और गठबंधन वार्ता नाकाम रहती है, तो नेतन्याहू को कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने का मौका मिल सकता है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में वह आगे एक और चुनाव कराने की कोशिश भी कर सकते हैं.
इस तरह नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच गठबंधन की संभावना कई राजनीतिक अड़चनों से घिरी है. एक तरफ आइजनकोट ने उनके नेतृत्व में सरकार बनाने से साफ इनकार किया है, वहीं दूसरी तरफ बहुमत न मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के विकल्प सीमित हो सकते हैं. अब देखना होगा कि चुनाव के बाद राजनीतिक दलों के बीच बातचीत किस दिशा में जाती है.
शौनक सान्याल