इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व पर जनमत संग्रह की तरह देखा जा रहा है. 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद यह पहला चुनाव है. करीब तीन साल से जारी जंग, सुरक्षा में हुई चूक और सरकार की जवाबदेही चुनाव अभियान के बड़े मुद्दे हैं. इसके अलावा सेना में भर्ती, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष समुदायों के बीच मतभेद, जातीय पहचान और अर्थव्यवस्था भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.
ओपिनियन पोल के मुताबिक, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी खेमा करीबी मुकाबले में हैं. पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी यायर लैपिड के साथ अलग विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं. सरकार बनाने के लिए किसी भी खेमे को संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा.
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7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही बड़ा मुद्दा
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में इज़रायल में करीब 1,200 लोग मारे गए थे और 251 लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया था. इस हमले से पहले सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक को लेकर नेतन्याहू पर सवाल उठते रहे हैं. उन्होंने इन नाकामियों की जांच के लिए स्वतंत्र राज्य आयोग बनाने की मांगों को स्वीकार नहीं किया है.
युद्ध के संचालन और जवाबदेही की मांग को लेकर हजारों नहीं, बल्कि लाखों की संख्या में इज़रायली नागरिक अलग-अलग प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं. शनिवार को तेल अवीव में हुई रैली के आयोजकों ने दावा किया कि इसमें एक लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए. प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा में हुई चूक की जांच के लिए राज्य आयोग बनाने की मांग की.
सेना में भर्ती और धार्मिक समुदायों के बीच विवाद
चुनाव का एक बड़ा मुद्दा सेना में अनिवार्य भर्ती को लेकर भी है. इज़रायल में ज्यादातर यहूदी पुरुषों को सेना में सेवा देनी होती है, लेकिन धार्मिक संस्थानों में पढ़ने वाले अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय यानी हरेदी पुरुषों को लंबे समय से छूट या राहत मिलती रही है.
लंबी जंग के कारण सेना पर दबाव बढ़ा है. रिजर्व सैनिकों को बार-बार लंबी अवधि के लिए बुलाया जा रहा है और सेना को जवानों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में छूट जारी रखने को लेकर विरोध बढ़ा है. इज़रायल के सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में कहा था कि हरेदी पुरुषों को कानूनी आधार के बिना सामूहिक छूट नहीं दी जा सकती. इस मुद्दे ने नेतन्याहू के गठबंधन में भी मतभेद बढ़ाए हैं.
जातीय पहचान और राजनीतिक बदलाव की चुनौती
इजरायल की राजनीति में मिजराही और अश्केनाजी यहूदियों के बीच पहचान का अंतर भी अहम रहा है. मिजराही यहूदी मूल रूप से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका से जुड़े हैं, जबकि अश्केनाजी यहूदियों की ऐतिहासिक जड़ें मध्य और पूर्वी यूरोप में हैं. लिकुड को लंबे समय से मिजराही और परंपरागत यहूदी मतदाताओं का समर्थन मिलता रहा है.
लेकिन 7 अक्टूबर के हमले के बाद नेतन्याहू की सुरक्षा संबंधी छवि को नुकसान पहुंचा है. आइजेनकोट, जिनके परिवार की जड़ें मोरक्को के यहूदी समुदाय से जुड़ी हैं, उनके प्रमुख चुनौती देने वालों में शामिल हैं. युद्ध में आइजेनकोट ने अपने बेटे और दो भतीजों को भी खोया है.
अरब मतदाता भी तय कर सकते हैं समीकरण
इज़रायल की आबादी में अरब नागरिक करीब 21 फीसदी हैं. चुनाव में उनकी भागीदारी सरकार बनाने के समीकरण को प्रभावित कर सकती है. सर्वे में अरब मतदाताओं की भागीदारी करीब 63 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि 2022 के चुनाव में यह करीब 53 फीसदी थी. अपराध और सार्वजनिक सुरक्षा अरब मतदाताओं की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं.
अरब नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट और मंसूर अब्बास की पार्टी राम अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं. विपक्षी सरकार को उनका समर्थन मिलेगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है. कुछ विपक्षी नेताओं ने अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर हिचक दिखाई है, हालांकि संसद में बाहर से समर्थन की संभावना खुली रखी है.
फिलिस्तीन का मुद्दा पीछे, अर्थव्यवस्था पर भी दबाव
चुनाव अभियान में इज़रायल-फिलिस्तीन विवाद के दो-राज्य समाधान यानी अलग फिलिस्तीनी देश बनाने की योजना पर ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है. मुख्य मुकाबले में सुरक्षा, शासन और नेतन्याहू के नेतृत्व पर जोर है. सितंबर में प्रकाशित प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में 56 फीसदी इज़रायली लोगों ने कहा कि इज़रायल और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश शांतिपूर्वक साथ रह सकते हैं, इस पर उन्हें भरोसा नहीं है. वहीं, 17 फीसदी लोगों ने इसके संभव होने की बात कही.
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जंग का आर्थिक असर भी परिवारों, कारोबार और रिजर्व सैनिकों पर पड़ा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव से पहले नेतन्याहू का समर्थन किया है, लेकिन इस दखल का वोटरों पर क्या असर होगा, यह स्पष्ट नहीं है. नेतन्याहू के समर्थक उनके अनुभव और सुरक्षा नीति को अहम बताते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि 7 अक्टूबर की नाकामियों के बाद राजनीतिक बदलाव जरूरी है.
भारत के समय के मुताबिक कब होगी वोटिंग?
इज़रायल में मतदान मंगलवार, 27 अक्टूबर को स्थानीय समय के मुताबिक सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक होगा. भारतीय समय के अनुसार, ज्यादातर मतदान केंद्र सुबह 10:30 बजे खुलेंगे और बुधवार, 28 अक्टूबर की रात 1:30 बजे बंद होंगे. हालांकि, 350 या उससे कम योग्य मतदाताओं वाली छोटी बस्तियों और अस्पतालों व जेलों में बने विशेष मतदान केंद्रों पर मतदान स्थानीय समय के मुताबिक सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक होगा. भारत के समय के अनुसार, इन केंद्रों पर मतदान सुबह 11:30 बजे से रात 11:30 बजे तक चलेगा. मतदान केंद्र बंद होने से पहले कतार में लग चुके योग्य मतदाताओं को समय सीमा के बाद भी वोट डालने की अनुमति होगी.
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