इस साल दिल्ली सहित उत्तर भारत में मॉनसून की शुरुआत काफी देरी से और कमजोर रूप में हुई है. आमतौर पर जून के अंत तक दिल्ली में मॉनसून पहुंच जाता है, लेकिन इस बार जुलाई की शुरुआत में भी स्थिति आधी-अधूरी बनी रही. किसान चिंतित हैं, गर्मी बढ़ी हुई है. बारिश की कमी से जल संकट की आशंका भी जताई जा रही है.
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मुख्य कारण पाकिस्तानी गर्म हवाओं का ड्राई फ्लो और बंगाल की खाड़ी में कमजोर लो प्रेशर सिस्टम का न बन पाना रहा है. अब स्थिति में सुधार हो रहा है. मॉनसून की रफ्तार तेज होने की संभावना है.
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भारतीय मॉनसून मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं पर निर्भर करता है जो हिंद महासागर से नमी लेकर आती हैं. केरल से शुरू होकर यह पूरे देश में फैलता है. दो मुख्य शाखाएं होती हैं - अरब सागर और बंगाल की खाड़ी. बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लो प्रेशर एरिया बनाकर नमी खींचती है.
इस साल मॉनसून की स्पीड शुरू में अच्छी रही लेकिन मध्य जून के बाद यह रुक गई. दिल्ली और आसपास के इलाकों में सूखी गर्म हवाएं लगातार बनी रहीं. इन हवाओं को पाकिस्तानी गर्म हवा कहा जा रहा है क्योंकि ये उत्तर-पश्चिम दिशा से, पाकिस्तान और उससे सटे राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों से आ रही थीं.
ये सूखी हवाएं (Dry Air Intrusion) मॉनसून की नम हवाओं को रोक रही थीं. नतीजा यह हुआ कि मॉनसून पूर्वी और मध्य राजस्थान तक ही सिमटकर रह गया. दिल्ली में बारिश की बजाय गर्मी और उमस बनी रही.
पाकिस्तानी गर्म हवाओं और ड्राई एयर इंट्रूजन का असर
पाकिस्तान की तरफ से आने वाली ये गर्म और सूखी हवाएं पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) से जुड़ी थीं. आमतौर पर पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों में बारिश लाते हैं लेकिन इस बार मॉनसून सीजन में इनकी सक्रियता ने सूखी हवा को दक्षिण-पूर्व की ओर धकेला. इससे मॉनसून ट्रफ कमजोर हो गया. ट्रफ वह रेखा है जहां नम और सूखी हवाएं मिलती हैं और बारिश होती है. जब सूखी हवा मजबूत होती है तो ट्रफ टूट जाता है या पीछे हट जाता है.
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दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस वजह से बारिश नहीं हो पाई. तापमान 40 डिग्री के ऊपर बना रहा और नमी कम होने से लोगों को गर्मी ज्यादा लगी. कृषि के लिए यह स्थिति चिंताजनक थी क्योंकि खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो रही थी. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि ड्राई एयर इंट्रूजन मॉनसून ब्रेक (Monsoon Break) की स्थिति पैदा कर रही थी, जिससे बारिश रुक गई.
बंगाल की खाड़ी का लो प्रेशर एरिया: क्यों कमजोर रहा?
मॉनसून की सफलता के लिए बंगाल की खाड़ी में लगातार लो प्रेशर सिस्टम बनना जरूरी है. ये सिस्टम नमी खींचते हैं. मॉनसून को उत्तर की ओर धकेलते हैं. इस साल खाड़ी में ऐसे सिस्टम कमजोर रहे या बन ही नहीं पाए. अल-नीनो की स्थिति, कमजोर मेडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और न्यूट्रल इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) जैसे बड़े पैमाने के मौसम कारकों ने इसका असर किया.
अल-नीनो प्रशांत महासागर में गर्म पानी बढ़ाता है जिससे भारतीय मॉनसून कमजोर होता है. MJO की कमजोर गतिविधि से बादल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई. नतीजा यह कि बंगाल की खाड़ी से नमी का प्रवाह कम रहा और मॉनसून की उत्तर की ओर बढ़त रुक गई. IMD और स्काईमेट जैसे संस्थानों ने पहले ही नॉर्मल से कम बारिश की भविष्यवाणी की थी, जो सही साबित हो रही है.
सूखी हवा का पीछे हटना और मॉनसून की नई रफ्तार
अच्छी खबर यह है कि हाल के दिनों में मॉनसून ने सूखी हवा की दीवार को तोड़ दिया है. मॉनसून ने पूर्वी और मध्य राजस्थान तक पहुंचकर सूखी हवाओं को पीछे धकेल दिया है. इससे नम हवाओं का प्रवाह बढ़ा है. मॉनसून ट्रफ मजबूत हो रहा है. अब मॉनसून बड़े हिस्से में देश में स्थापित हो चुका है.
मॉडल्स के अनुसार उत्तर बंगाल की खाड़ी में जल्द ही एक नया लो प्रेशर सिस्टम बनने की संभावना है. अगर यह बनता है तो बची हुई सूखी हवा को पूरी तरह साफ कर देगा और मॉनसून को पूरे देश में फैला देगा. IMD के अनुसार 10 जुलाई तक मॉनसून की शुरुआत पूरी होने की उम्मीद है. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के बाकी हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है.
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जुलाई का पूर्वानुमान और सावधानियां
जुलाई मॉनसून का महत्वपूर्ण महीना है. IMD ने जुलाई में नॉर्मल से नीचे की बारिश का अनुमान लगाया है लेकिन उत्तर भारत में सामान्य या थोड़ी ज्यादा बारिश हो सकती है. अगर नया लो प्रेशर सिस्टम सक्रिय हुआ तो दिल्ली में 3-4 जुलाई के आसपास मॉनसून पहुंच सकता है.
किसानों को सलाह है कि वे बुआई के लिए तैयार रहें लेकिन अतिवृष्टि की स्थिति में फसल बचाने के उपाय भी रखें. शहरों में जल भराव और बाढ़ जैसी समस्याओं के लिए प्रशासन को तैयार रहना चाहिए. कुल मिलाकर इस साल मॉनसून चुनौती भरा रहा है लेकिन हालिया प्रगति उम्मीद जगाती है.
ऐसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हो सकती हैं. ग्लोबल वार्मिंग से मौसम पैटर्न अनियमित हो रहे हैं. अल-नीनो जैसी घटनाएं ज्यादा तीव्र हो रही हैं. भारत को लंबे समय में मॉनसून पर निर्भरता कम करने, जल संरक्षण और वैकल्पिक सिंचाई पर जोर देना होगा.
ऋचीक मिश्रा