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हॉस्टल के मेस बिल से सत्ता के तख्तापलट तक... जब छात्रों के प्रोटेस्ट ने हिला दीं सरकारें

भारत में हाल के वर्षों में शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, फीस और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर छात्रों के कई आंदोलन सामने आए हैं.  हर ओर छात्रों का आंदोलन देखने को मिल रहा है. पहले जंतर मंतर, फिर झारखंड और अब पंजाब में भी हर ओर विरोध प्रदर्शन की गूंज सुनाई दे रही हैं. आइए जानते हैं, आंदोलनों का इत‍िहास जब सत्ता को भनक तक नहीं लगी कि प्रदर्शन इतना असर डालेगा.

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जब छात्र आदोलनों से हिल गई सरकार.
जब छात्र आदोलनों से हिल गई सरकार.

एक हॉस्टल की मेस फीस बढ़ी, छात्रों ने विरोध किया और देखते ही देखते मामला पूरे राज्य में फैल गया. यह किसी एक कॉलेज की कहानी नहीं, बल्कि भारत के छात्र आंदोलनों के इतिहास की कई बड़ी घटनाओं की शुरुआत रही है. कई बार छात्रों की छोटी-सी मांग ने ऐसा रूप लिया कि सरकारों को फैसले बदलने पड़े और राजनीति की दिशा तक बदल गई.

आज जब देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, रोजगार, फीस और अन्य मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं. सरकारों को इतिहास से सबक लेते हुए इन आंदोलनकार‍ियों की न सि‍र्फ मांगें सुननी चाहिए बल्क‍ि अपने मतदाताओं के रुख को भी भांपना चाहिए.

आज सोशल मीडिया के दौर में तो क‍िसी अव्यवस्था या धांधलीके मुद्दे में आपस में कनेक्ट होना बहुत ज्यादा ही आसान हो गया है. हाल ही में सोशल मीड‍िया से जन्म लेने वाली कॉकरोच जनता पार्टी इसका सटीक उदाहरण है. एक बार फिर कहेंगे कि ये नई बात नहीं है. आइए ऐसे कुछ और आंदोलनों के बारे में जानते हैं जिन्हें पहले सत्ता ने सीर‍ियस लेना उच‍ित नहीं समझा मगर बाद में उन्हीं व‍िरोध के सुरों ने उनकी कुर्सी तक ह‍िला दी. 

1973-74 का वो दौर, जब मेस बिल से नाराज थे छात्र और... 

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बात दिसंबर 1973 की है. गुजरात के एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में हॉस्टल मेस की फीस में करीब 20 प्रतिशत इजाफा हुआ था. छात्र इसका व‍िरोध कर रहे थे. उन्होंने प्रशासन से ये बिल कम करने की मांग की. लेकिन प्रशासन ने उनकी नहीं सुनी. वहीं से नव न‍िर्माण आंदोलन की नींव पड़ी. नाराज छात्रों ने प्रशासन के ख‍िलाफ विरोध शुरू किया. शुरुआत में यह सिर्फ कॉलेज परिसर का मामला था, छात्र कॉलेज पर‍िसर में ही नारेबाजी कर रहे थे. 

फिर चंद दिनों में ही ये आंदोलन महंगाई, भ्रष्टाचार और राशन संकट की तरफ मुड़ गया. छात्र, शिक्षक, व्यापारी और आम लोग आंदोलन का हिस्सा बनने लगे. आंदोलन को अनुशास‍ित रखने की गरज से 'नवनिर्माण युवक समिति' बनाई गई. फिर देखते ही देखते आंदोलन पूरे गुजरात में फैल गया. लगातार प्रदर्शनों और जनदबाव से सरकार पर इतना प्रेशर बना कि तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. बाद में गुजरात विधानसभा भी भंग कर दी गई. इसे आजाद भारत का पहला बड़ा आंदोलन माना जाता है जिसने एक निर्वाचित राज्य सरकार को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया. 

1974: बिहार से उठी आवाज, पूरे देश में गूंजी

गुजरात आंदोलन के कुछ ही महीनों के बाद ही 1974 में बिहार में भी छात्रों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने 'बिहार छात्र संघर्ष समिति' के बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया. बाद में स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण इस आंदोलन से जुड़े और उन्होंने 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया.

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इसके बाद आंदोलन केवल छात्र आंदोलन नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय जनआंदोलन बन गया. इस आंदोलन ने केंद्र सरकार पर जबरदस्त राजनीतिक दबाव बनाया. बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों, जिनमें 1975 का आपातकाल और 1977 के आम चुनाव शामिल हैं में इस आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. हालांकि, केवल इस आंदोलन की वजह से ऐसा नहीं हुआ था लेकिन ये एक अहम हिस्सा माना जाता है.  

1979-1985: छह साल चला असम का ये आंदोलन

असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और अवैध प्रवास के मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था. इसकी शुरुआत भले ही स्थानीय स्तर पर हुई लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे राज्य का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन गया. करीब छह साल तक चले इस आंदोलन के दौरान कई बार बंद और बड़े प्रदर्शन हुए. आखिरकार 1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच असम समझौता हुआ. इसके बाद छात्र नेताओं ने असम गण परिषद (AGP) बनाई और सत्ता तक पहुंचे. यह भारत के सबसे सफल छात्र आंदोलनों में गिना जाता है. 

1990: मंडल आयोग और देशव्यापी छात्र विरोध

1990 में केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की जिसके तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया. इसके विरोध में दिल्ली विश्वविद्यालय समेत देश के कई शिक्षण संस्थानों के छात्र सड़कों पर उतर गए. दिल्ली के छात्र राजीव गोस्वामी के आत्मदाह के प्रयास के बाद आंदोलन और तेज हो गया. कई शहरों में प्रदर्शन हुए और लंबे समय तक शिक्षण संस्थान प्रभावित रहे. इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श पर गहरा प्रभाव डाला.

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आज भी कायम है छात्र आंदोलनों की ताकत

समय बदलता गया लेकिन छात्र आंदोलनों की ताकत आज भी कायम है. अब सोशल मीडिया के कारण किसी विश्वविद्यालय या कॉलेज से शुरू हुआ विरोध कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाता है. शिक्षा, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक, रोजगार और फीस जैसे मुद्दों पर छात्र लगातार अपनी आवाज उठा रहे हैं. 

इतिहास क्या सिखाता है?

भारत का इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलनों को कभी सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं माना जा सकता. कई बार छोटी-सी मांग से शुरू हुआ विरोध पूरे समाज का मुद्दा बन जाता है. लोकतंत्र में छात्रों की आवाज हमेशा महत्वपूर्ण रही है और जब यह आवाज जनता के व्यापक समर्थन से जुड़ती है, तो सरकारों को भी फैसलों पर दोबारा से विचार कर रही हैं.

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