वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा पिछले 20 साल में करीब 10 फीसदी कम हुई है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में 2003 से 2023 के बीच धूल में यह गिरावट दर्ज की गई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, धूल के कम होने से धरती तक पहुंचने वाली सूरज की गर्मी में मामूली बदलाव हो सकता है. Photo: PTI
यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि हवा में मौजूद धूल सिर्फ गंदगी या प्रदूषण नहीं है. धूल के बेहद छोटे कण सूरज की कुछ किरणों को वापस अंतरिक्ष की ओर भेजते हैं. इससे धरती को मिलने वाली गर्मी थोड़ी कम होती है. ऐसे में वायुमंडल में धूल घटने से इस प्राकृतिक ठंडक का असर भी कम हो सकता है. हालांकि, वैज्ञानिक साफ कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य वजह अभी भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है. Photo: PTI
इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने 2003 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा, जमीन पर किए गए माप और एटमॉस्फेरिक मॉडल का इस्तेमाल किया. रिसर्च के मुताबिक, पिछले दो दशकों में धूल में कमी तो आई है, लेकिन वैज्ञानिक अभी यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि इसके पीछे असली वजह क्या है. Photo: PTI
वायुमंडल में पहुंचने वाली धूल का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी इलाकों से आता है. उत्तरी अफ्रीका का सहारा और एशिया का गोबी रेगिस्तान इसके बड़े स्रोत हैं. तेज हवाएं इन इलाकों की मिट्टी के बेहद महीन कणों को उठाकर हजारों किलोमीटर दूर तक ले जाती हैं. हर साल करीब 200 करोड़ टन धूल और रेत वायुमंडल में पहुंचती है. इसका बड़ा हिस्सा उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व के रेगिस्तानों से आता है. हवा के साथ ये कण दूसरे महाद्वीपों और समुद्रों तक भी पहुंच जाते हैं. Photo: PTI
धूल के कण सूरज की कुछ रोशनी को रिफ्लेक्ट करके वापस अंतरिक्ष में भेजते हैं. इससे धरती की सतह तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा कुछ कम हो जाती है. इसलिए धूल की मात्रा घटने पर इस प्राकृतिक कूलिंग का असर भी थोड़ा कम हो सकता है. Photo: PTI
रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक, धूल में आई कमी ने इंसानी गतिविधियों से हो रही गर्मी में मामूली बढ़ोतरी की है. लेकिन इसका असर ग्रीनहाउस गैसों की वजह से हो रही गर्मी की तुलना में काफी छोटा है. यानी धूल की कमी को ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य वजह नहीं माना जा सकता. Photo: PTI
वायुमंडलीय धूल का असर सिर्फ तापमान पर नहीं पड़ता. इसके कण समुद्र और जमीन तक जरूरी पोषक तत्व पहुंचाने में मदद करते हैं. दूसरी ओर, जब धूल बर्फ और हिम पर जमती है तो उनकी सतह की चमक कम हो जाती है. इससे बर्फ ज्यादा सूरज की ऊर्जा सोख सकती है और उसके पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूखती झीलें और जलाशय भी धूल के नए स्रोत बन रहे हैं. अमेरिका की साल्टन सी, ग्रेट साल्ट लेक और एशिया का अरल सागर इसके उदाहरण हैं. Photo: PTI
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2003 से 2023 के बीच धूल में यह कमी क्यों आई. बदलती हवाएं, जमीन की स्थिति और दूसरे पर्यावरणीय बदलाव इसके संभावित कारण हो सकते हैं. हालांकि, वायुमंडल में धूल की मात्रा अभी भी औद्योगिक दौर से पहले के स्तर से ज्यादा है. इसलिए वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के साथ धूल का यह पैटर्न किस तरह बदल सकता है. Photo: PTI