उत्तर प्रदेश में यादव समाज: किन सीटों पर हैं मजबूत वोटबैंक, कितना है सत्ता में दखल?

उत्तर प्रदेश में यादव समाज के राजनीतिक प्रभाव और चुनावी समीकरणों को रेखांकित करती इस रिपोर्ट में सूबे की सियासत में उनके मजबूत दखल, आबादी के आंकड़ों और प्रमुख सीटों की पूरी तस्वीर पेश की गई है. आइए जानते हैं कि यूपी में यादव समुदाय का वोटबैंक कितना अहम है?

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यूपी की सियासत में यादव फैक्टर (Photo-ITG) यूपी की सियासत में यादव फैक्टर (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 19 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:42 PM IST

उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव अब बस दहलीज पर है. सियासी पार्टियां अपने-अपने कोर वोटर्स को लामबंद करने और दूसरों के कोर वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं. सूबे की राजनीति में यादव समाज केवल एक बड़ा पिछड़ा वर्ग नहीं, बल्कि सपा की राजनीति का सबसे बड़ा सामाजिक आधार भी है. यादव समाज को एक मजबूत 'वोटबैंक' और 'किंगमेकर' के रूप में देखा जाता है.

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यूपी में ओबीसी समाज में सबसे बड़ी आबादी यादव समाज की है, जो सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. समाजवादी पार्टी इसी वोटबैंक के दम पर सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए है, तो बीजेपी उसमें सेंधमारी कर अपने सियासी वर्चस्व को बरकरार रखना चाहती है.

उत्तर प्रदेश के इटावा, मैनपुरी, बदायूं और आजमगढ़ से लेकर पूर्वांचल के कई इलाकों तक यादव समाज चुनावी समीकरणों को प्रभावित करता है. सपा की राजनीति में इस समुदाय की केंद्रीय भूमिका रही है, जिसे मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने प्रदेश की सत्ता के विमर्श के केंद्र में पहुंचाया. ऐसे में आइए जानते हैं कि यादव समाज का वोटबैंक सियासी रूप से कितना अहम है और कितनी सीटों पर प्रभाव रखता है?

यूपी में यादव समाज की आबादी कितनी है?

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उत्तर प्रदेश में यादव समाज की आबादी को लेकर अक्सर अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं, लेकिन कोई आधिकारिक स्पष्ट आंकड़ा नहीं है. यादव समाज की हिस्सेदारी आमतौर पर प्रदेश की कुल आबादी के लगभग 10 फीसदी के दायरे में बताई जाती है. सूबे की कुल आबादी लगभग 24 करोड़ है, तो यादव समुदाय की संख्या करीब 1.7 करोड़ से 2.4 करोड़ के बीच बैठती है.

यूपी में ओबीसी समुदाय के बीच यादव समुदाय आबादी का 22 फीसदी से भी ज्यादा है. इससे समझा जा सकता है कि यादव समुदाय राजनीतिक रूप से कितना अहम है, जो यूपी में सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. इसीलिए सपा इसे हर हाल में अपने साथ जोड़कर रखना चाहती है तो बीजेपी भी इसे अपने पाले में लाने की कवायद में है.

यादव समाज की राजनीतिक अहमियत क्यों है?

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पिछड़े समुदायों में शामिल होने के कारण यादव मतदाता अनेक क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. मध्य उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल के कई इलाकों में उनकी अच्छी-खासी आबादी है. यूपी में यादव समाज में मंडल आयोग के बाद ऐसी गोलबंदी हुई कि यह सपा का कोर वोटर बन गया. समाजवादी पार्टी के लंबे राजनीतिक नेटवर्क ने यादव समुदाय के भीतर मजबूत नेतृत्व और कार्यकर्ता आधार विकसित किया है.

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यादवों के साथ मुस्लिम, अन्य पिछड़े वर्गों और कुछ क्षेत्रों में दलित समाज का समर्थन जुड़ने पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं. यादव वोटरों के दम पर मुलायम सिंह यादव तीन बार और अखिलेश यादव एक बार सूबे के मुख्यमंत्री रहे. इसलिए यादव समाज की ताकत का आकलन केवल प्रदेशव्यापी आबादी से नहीं, बल्कि विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में उनके अहम वोटबैंक से होता है.

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हालांकि, समाजवादी पार्टी के राजनीतिक उद्भव से पहले ही रामनरेश यादव जनता पार्टी से यूपी के मुख्यमंत्री रहे थे. बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया. इस तरह से अभी तक सूबे में यादव समाज के तीन नेता मुख्यमंत्री रह चुके हैं. हालांकि, 2014 के बाद यूपी में बीजेपी ने ऐसी राजनीतिक बिसात बिछाई कि यादव वर्चस्व वाली राजनीति को तगड़ा झटका लगा. नतीजतन 2017 के चुनाव में अखिलेश यादव को सत्ता गंवानी पड़ी, लेकिन यादव वोटबैंक पर आज भी सभी की नजरें हैं.

यादव समाज के प्रभाव वाले जिले और सीटें?

यादव समाज का सबसे अधिक प्रभाव मध्य उत्तर प्रदेश के इटावा-मैनपुरी-कन्नौज बेल्ट में रहा है. यह इलाका लंबे समय से समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव परिवार की राजनीति का केंद्र रहा है. उत्तर प्रदेश के इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़, फैजाबाद, बलिया, संतकबीर नगर, जौनपुर और कुशीनगर जिलों को यादव बहुल माना जाता है.

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यादव समाज यूपी की 60 से 65 विधानसभा सीटों पर असर रखता है, जहां यादव वोटर हार-जीत तय करते हैं. सूबे के 44 जिलों में लगभग 9 फीसदी वोटर यादव हैं, जबकि 10 जिलों में ये वोटर 15 फीसदी से ज्यादा हैं. पूर्वांचल, मध्य यूपी और ब्रज के इलाकों में यादव समाज सियासत की दशा और दिशा तय करता है.

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यूपी की पांच दर्जन सीटों पर यादव मतदाताओं की संख्या और उम्मीदवारों के सामाजिक समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं. जिन सीटों पर यादव मतदाताओं की संख्या निर्णायक होती है, वहां वे चुनाव परिणाम तय करते हैं. इसके अलावा कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां यादव मतदाता दूसरे समुदायों के साथ मिलकर हार-जीत में अपनी भूमिका अदा करते हैं.

उत्तर प्रदेश में यादव राजनीति का उदय

यूपी में यादव राजनीति का चेहरा भले ही अभी अखिलेश यादव हों, लेकिन यादव राजनीति आजादी के बाद से ही सक्रिय हो गई थी. रघुवीर सिंह यादव आगरा पूर्वी संसदीय सीट से कांग्रेस के टिकट पर 1952 में लोकसभा सदस्य चुने गए थे. यूपी में यादव समाज के वे पहले नेता थे, जो संसद पहुंचे थे. वहीं बाराबंकी और फतेहपुर से रामसेवक यादव यूपी की विधानसभा पहुंचने वाले पहले यादव विधायक थे, जो भारतीय क्रांति दल के टिकट पर जीते थे.

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यूपी में राममनोहर लोहिया कांग्रेस के खिलाफ ओबीसी जातियों को एकजुट करने में सफल रहे. सूबे में ओबीसी की अगुवाई यादव समाज के नेताओं के हाथ में रही. लोहिया के बाद चौधरी चरण सिंह ने भी इसी फॉर्मूले को आजमाया, जिससे रामनरेश यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता निकले. 1967 में यूपी में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो मुलायम सिंह कैबिनेट मंत्री बने. 1977 में रामनरेश यादव सूबे के पहले यादव मुख्यमंत्री बने.

मंडल आंदोलन के दौरान मुलायम सिंह उभरे और 1989 में जनता दल से मुख्यमंत्री बने. इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी खड़ी की और सूबे के सबसे बड़े यादव नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई. इसके बाद से यादव समाज सपा के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है. यादव समाज के दम पर मुलायम सिंह यादव तीन बार तो अखिलेश यादव एक बार मुख्यमंत्री बने.

सूबे की सियासत और सत्ता में कितना दखल

उत्तर प्रदेश में सपा के सत्ता में रहने से यादव समाज को राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से भी मजबूती मिली. सपा सरकार पर हमेशा यादव-परस्त होने का आरोप विपक्ष लगाता रहा है. इसके चलते ही गैर-यादव ओबीसी जातियां सपा से छिटककर बीजेपी और दूसरे दलों के साथ चली गईं, लेकिन अखिलेश यादव ने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए यादव-परस्त वाली छवि को बदलने का दांव चला, जो काफी हद तक कामयाब भी रहा.

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उत्तर प्रदेश में बीजेपी की गैर-यादव राजनीति ने यादवों को तकरीबन हाशिये पर धकेलने में जबरदस्त भूमिका अदा की है. 2022 के विधानसभा चुनाव में यादव समाज से 27 विधायक ही जीतने में सफल रहे, जिसमें 24 समाजवादी पार्टी और 3 बीजेपी से जीते थे. 2017 में कुल 18 यादव विधायक चुने गए थे, जिनमें से 6 बीजेपी से और बाकी 12 सपा से जीते थे.

2024 में यूपी से कुल 5 यादव लोकसभा सांसद बने हैं और सभी मुलायम परिवार से हैं. इसके अलावा रामगोपाल यादव सपा से राज्यसभा सांसद हैं. यूपी की योगी सरकार में यादव समुदाय से गिरीश चंद्र यादव एकमात्र कैबिनेट मंत्री हैं. सुभाष यदुवंश को पहले बीजेपी युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था और अब वे एमएलसी हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी के टिकट पर यादव समाज के तीन अध्यक्ष बने थे और निरहुआ यादव बीजेपी के प्रमुख यादव चेहरे माने जाते हैं.

यूपी में यादव किसके साथ कितना है?

उत्तर प्रदेश में यादव समुदाय का वोटिंग पैटर्न देखें तो सपा उनकी पहली पसंद है, जबकि दूसरी पसंद बीजेपी है. सीएसडीएस (CSDS) के आंकड़े बताते हैं कि यूपी के 2022 के विधानसभा और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव समुदाय ने लगभग 83 फीसदी वोट सपा गठबंधन को दिया, तो वहीं 12 फीसदी के करीब यादव समुदाय ने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया था.

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यूपी में यादव समुदाय के सबसे बड़े चेहरों के तौर पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और शिवपाल यादव हैं, उसके बाद धर्मेंद्र यादव और आदित्य यादव आते हैं. इसके अलावा सपा में अंबिका चौधरी, रमाकांत यादव और दुर्गा यादव जैसे नेता पूर्वांचल में यादव चेहरा हैं, तो बीजेपी के पास निरहुआ यादव और गिरीश चंद्र यादव हैं.

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कांग्रेस ने भी अनिल यादव और मनोज यादव को यादव चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया है. बसपा में एक समय यादव नेताओं की लंबी फेहरिश्त रही है, लेकिन फिलहाल श्यामलाल यादव को छोड़कर कोई बड़ा चेहरा नहीं है. कांग्रेस से लेकर सपा और बीजेपी तक सभी की नजरें यादव वोटों पर टिकी हुई हैं.

उत्तर प्रदेश में यादव समाज की सियासी ताकत उसकी आबादी, क्षेत्रीय उपस्थिति, समाजवादी आंदोलन और मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क से मिलकर बनती है. इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, फिरोजाबाद, बदायूं और आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों में इसकी भूमिका विशेष रूप से दिखाई देती है.

मुलायम सिंह यादव ने इस सामाजिक आधार को प्रदेश की सत्ता की राजनीति में स्थापित किया, जबकि अखिलेश यादव ने इसे आगे बढ़ाते हुए व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश की. ऐसे में देखना यह है कि 2027 के चुनाव में यादव समुदाय किसके पाले में खड़ा होता है?

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