उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी समीकरण साधे जाने लगे हैं. सूबे की पूरी सियासत ओबीसी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई है. यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी आबादी ओबीसी में कुर्मी समुदाय की है. कुर्मी समाज के वोटों को अपने पाले में करने के लिए बीजेपी से लेकर सपा और कांग्रेस तक जोर आजमाइश में जुटी हैं.
बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष की कमान कुर्मी जाति से आने वाले पंकज चौधरी को सौंपने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी और गुजरात के पूर्व विधायक जगदीश पटेल को सह प्रभारी बनाया है. बीजेपी की रणनीति इन दोनों नेताओं के जरिए कुर्मी जातीय समुदाय को अपने पक्ष में एकजुट करने की है.
वहीं, अपना दल के दोनों धड़े कुर्मी समाज की बदौलत किंगमेकर बनने का सपना संजोए बैठे हैं तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने पीडीए के जरिए कुर्मी समाज के बीच गहरी पैठ जमाने में जुटे हैं. इसके लिए सपा इन दिनों यादव समुदाय से ज्यादा तवज्जो कुर्मी समाज को दे रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि यूपी की सियासत में कुर्मी समुदाय का कितना सियासी प्रभाव है और कितनी सीटों पर असर रखते हैं?
कुर्मी समाज किन किन उपनाम से जाति है
उत्तर प्रदेश में कुर्मी-सैंथवार समाज का वोट करीब 6 से 7 फीसदी के बीच है, जो यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है. कुर्मी समाज के लोग उत्तर प्रदेश में पटेल, गंगवार, सचान, कटियार, निरंजन, चौधरी और वर्मा जैसे उपनाम से जाने जाते हैं.
रुहेलखंड में कुर्मी गंगवार और वर्मा से पहचाने जाते हैं तो कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में कुर्मी, पटेल, कटियार, निरंजन और सचान कहलाते हैं. अवध और पश्चिमी यूपी के क्षेत्र में कुर्मी समाज के लोग वर्मा, चौधरी और पटेल नाम से जाने जाते हैं.
कुर्मी समाज का कितना सियासी असर
यूपी में भले ही कुर्मी समाज 6 से 7 फीसदी है, जो ओबीसी में करीब 35 फीसदी है. सूबे की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटें और 8 से 10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कुर्मी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है. पूर्वांचल से लेकर बुंदेलखंड और अवध और रुहेलखंड इलाके में कुर्मी समाज किसी भी दल का सियासी खेल बनाने और बिगाड़ने की स्थिति में है.
कुर्मी समाज का प्रभाव यूपी के 25 जिलों में है, लेकिन 16 जिलों में 12 फीसदी से अधिक सियासी ताकत रखते हैं. संत कबीर नगर, महाराजगंज, कुशीनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती और बाराबंकी, कानपुर, अकबरपुर, एटा, बरेली और लखीमपुर जिलों में इनकी ज्यादा आबादी है. यूपी की करीब 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी समुदाय जिताने की स्थिति में है या फिर किसी को हराने की ताकत रखता है.
उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज के क्षत्रप
उत्तर प्रदेश में कुर्मियों का कोई एक नेता नहीं बल्कि हर इलाके में अपने-अपने क्षत्रप हैं. इन्हीं क्षत्रपों के सहारे राजनीतिक दल अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त कर सत्ता के सिंहासन पर काबिज होते रहे हैं. रुहेलखंड में कुर्मी समाज के सबसे बड़े नेता संतोष गंगवार रहे, जो झारखंड के राज्यपाल हैं. बीजेपी ने अब उनकी बेटी श्रुति गंगवार को राज्यसभा भेजा है. इस इलाके में सपा में भगवत चरण गंगवार हैं.
पूर्वांचल क्षेत्र में अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल कुर्मी समाज का चेहरा मानी जाती हैं, जो बीजेपी के साथ हैं. एक समय बीजेपी के नेता ओम प्रकाश सिंह हुआ करते थे, लेकिन पार्टी अब पंकज चौधरी को बढ़ा रही है. बीजेपी ने यूपी प्रदेश अध्यक्ष की कमान उन्हें सौंपी है.
सपा में लालजी वर्मा और बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा हैं तो कांग्रेस के पास बीरेंद्र चौधरी हैं. कानपुर और बुंदेलखंड इलाके में कुर्मी समाज की सियासत ददुआ के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी. इलाके में बीजेपी की विनय कटियार और प्रेमलता कटियार एक बड़ी नेता हुआ करती थीं, पर अब स्वतंत्र देव सिंह और राकेश सचान हैं.
वहीं, सपा में ददुआ के भाई बालकुमार पटेल और नरेश उत्तम पटेल कुर्मी समाज के चेहरे हैं. ददुआ के बेटे को भी बीजेपी आगे बढ़ा रही है. यूपी में कुर्मी समाज से रामपूजन वर्मा, रामस्वरूप वर्मा, बरखू राम वर्मा, बेनी प्रसाद वर्मा और सोनेलाल पटेल कुर्मी समाज के दिग्गज नेता माने जाते थे.
यूपी में कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व
यूपी में कुर्मी समाज की सियासी ताकत को देखते हुए बीजेपी ने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है तो सपा ने भी कई कुर्मी नेताओं को आगे कर रखा है. मौजूदा समय में कुर्मी समाज के कुल 40 विधायक हैं, जिनमें से सबसे ज्यादा 27 बीजेपी गठबंधन के हैं.
समाजवादी पार्टी के 12 और कांग्रेस का एक कुर्मी विधायक है. 2022 के चुनाव में ओबीसी समुदाय में इस बार सबसे ज्यादा कुर्मी समुदाय से विधायक चुनकर आए थे, जबकि ओबीसी में उनकी आबादी यादव समुदाय से कम है. 2017 में कुर्मी समाज के 34 विधायक थे, जिसमें 26 बीजेपी, 4 अपना दल (एस), दो बसपा और दो सपा से थे.
कुर्मी समुदाय का प्रभाव उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में भी दिखता है. चार कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान, संजय गंगवार और आशीष पटेल कुर्मी समुदाय से हैं. समाज के नेताओं को यह अहमियत सामाजिक गठबंधन को लेकर बीजेपी की रणनीति को दर्शाने वाली है.
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी से कुल 11 कुर्मी लोकसभा सांसद चुने गए थे, जिनमें से सात सपा से हैं. अंबेडकर नगर से लालजी वर्मा, फतेहपुर से नरेश उत्तम पटेल, बस्ती से राम प्रसाद चौधरी, खीरी से उत्कर्ष वर्मा, प्रतापगढ़ से शिवपाल सिंह पटेल, बांदा से कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल और श्रावस्ती से राम शिरोमणि वर्मा समाजवादी पार्टी के सांसद बने थे.
वहीं, बीजेपी से तीन कुर्मी सांसद चुने गए थे. महाराजगंज से पंकज चौधरी, बरेली से छत्रपाल सिंह गंगवार और फूलपुर से प्रवीण पटेल सांसद चुने गए थे. बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के सहयोगियों में अनुप्रिया पटेल अकेली कुर्मी सांसद हैं, जो अपना दल की कमान संभाल रही हैं. मोदी सरकार में मंत्री पंकज चौधरी और अनुप्रिया पटेल कुर्मी समाज से हैं.
2019 में यूपी से आठ कुर्मी लोकसभा सांसद चुने गए थे, जिनमें 6 बीजेपी, एक बसपा और एक अपना दल (एस) शामिल थे. पांच साल के बाद 2024 में चुनाव हुए कुर्मी सांसदों की संख्या बढ़कर 11 हो गई है. इसी तरह बीजेपी के विधायकों की संख्या भी बढ़ गई है.
कुर्मी वोटों पर आधार रखने वाले दल
उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की सियासी ताकत को देखते हुए बीजेपी ने अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने के लिए अपना दल (एस) से गठबंधन कर रखा है तो सपा ने पल्लवी पटेल को अपने साथ जोड़ा है. हालांकि, अपना दल को स्थापित करने वाले सोनेलाल पटेल इस बिरादरी के बड़े और सर्वमान्य नेता थे, लेकिन कभी चुनाव नहीं जीत सके. सोनेलाल पटेल की सियासत की विरासत दो धड़ों में बंटी हुई है. अपना दल के एक धड़े को उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल संभाल रही हैं जबकि दूसरा अपना दल (एस) अनुप्रिया पटेल के हाथों में है.
अनुप्रिया पटेल और पल्लवी पटेल दोनों बहनें कुर्मी वोटों के सहारे अपनी सियासत कर रही हैं. पल्लवी पटेल और उनकी मां कृष्णा पटेल अभी तक कोई बड़ी चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी हैं जबकि अनुप्रिया पटेल दूसरी बार सांसद हैं और पार्टी के 11 विधायक हैं. अनुप्रिया पटेल का प्रभाव प्रयागराज और पूर्वांचल के इलाके के कुर्मी समुदाय के बीच है. विश्लेषक मानते हैं कि वह सहयोगी होने के नाते अन्य क्षेत्रों में भी बीजेपी के लिए फायदा दिलाती हैं.
कुर्मी समाज किसी एक पार्टी के साथ नहीं
कुर्मी मूल रूप से किसान जाति है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी है. हालांकि अब शहरों में भी उनकी संख्या है. आजादी के बाद कुर्मी समाज लंबे समय तक कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ा रहा है. इसके बाद कांशीराम ने कुर्मी समाज के बड़े तबके को अपने साथ जोड़ा तो सपा ने भी कुर्मी समाज के एक तबके को साथ लिया.
मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जब भी सपा की सरकार बनी कुर्मी बिरादरी के दिग्गज नेता बेनी प्रसाद वर्मा का बड़ा कद रहा. यूपी में लंबे समय तक बेनी प्रसाद वर्मा कुर्मी बिरादरी के दिग्गज नेता के रूप में प्रदेश में जाने जाते रहे. वहीं, बीजेपी सूबे में लंबे समय से कुर्मी वोटों को साधने के लिए तमाम जतन करती रही.
कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के दौर में ओम प्रकाश सिंह कुर्मी समाज के बड़े नेता थे. ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार लंबे अरसे तक बीजेपी में कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और अपने समाज को बीजेपी के परंपरागत वोटर बनाने में अहम भूमिका अदा की. मौजूदा समय में बसपा के पास कुर्मी समाज का कोई बड़ा नेता नहीं है, जो कुर्मियों को जोड़ने की दिशा में कदम उठा सके. ऐसे में देखना है कि कुर्मी समाज किसे 2027 के विधानसभा चुनाव में पसंद करता है.
कुबूल अहमद