उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश बढ़ने के साथ ही मुस्लिम सियासत के कद्दावर चेहरे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी एक्टिव हो गए हैं. सूबे में एक के बाद एक जनसभा कर सियासी माहौल बनाने में जुटे हैं. अब ओवैसी ने गुरुवार को अपनी तस्वीर के साथ एक पोस्ट कर दावा किया है,'उत्तर प्रदेश में पूरा गेम बदल देंगे'.
असदुद्दीन ओवैसी एक बार फिर यूपी में अपनी पार्टी की किस्मत आजमाने की कोशिश में हैं. ओवैसी की पार्टी यूपी में उन सभी सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारने की कोशिश में है, जहां मुस्लिम मतदाता जीत या हार तय करने में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी के बीच बहराइच के मटेरा और बिजनौर की नजीबाबाद विधानसभा सीट पर जनसभा कर चुके ओवैसी अब सोशल मीडिया पर यूपी का पूरा गेम बदल देने का दावा कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वकायी ओवैसी यूपी का गेम बदलने की ताकत रखते हैं?
यूपी का सियासी गेम बदलने उतरे ओवैसी
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पूर्वांचल से लेकर पश्चिम यूपी तक अपनी सियासी गतिविधियां बढ़ा दी हैं वो सूबे में रैलियां कर सियासी माहौल बनाना शुरू कर दिया है. मिशन-यूपी का आगाज ओवैसी ने पूर्वांचल के बहराइच की मटेरा विधानसभा सीट किया और उसके बाद पश्चिमी यूपी के बिजनौर जिले की नजीबाबाद में रैली की. ओवैसी की 18 जुलाई को सहारनपुर और 25 जुलाई को मुरादाबाद में जनसभा प्रस्तावित है.
उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटों पर ओवैसी फोकस कर रहे हैं, क्योंकि उन जिन दो क्षेत्रों में रली हुई है, वहां पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं और दोनों ही सीटों पर सपा के मुस्लिम विधायक हैं. इसके अलावा आने वाले समय में ओवैसी की जिन इलाके में रैली होनी है, वो इलाके भी मुस्लिम बहुल माने जाते हैं. इस तरह मुस्लिम बहुल इलाके से सियासी हुंकार भरते ही ओवैसी ने अपने सियासी तेवर दिखाना शुरू कर दिया है.
असदुद्दीन ओवैसी ने गुरुवार को अपने सोशल मीडिया में एक तस्वीर पोस्ट कर दावा किया है, 'उत्तर प्रदेश में पूरा गेम बदल देंगे.' इस पोस्ट में ओवैसी की तस्वीर के साथ यूपी का नक्शा है और सामने भीड़ व भारत का झंडा है. ऐसे में उनकी इस तस्वीर और पोस्ट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है . ओवैसी वाकई यूपी का 'गेम चेंजर' बनने का माद्दा रखते हैं या वो सिर्फ वोटों के ध्रुवीकरण का जरिया हैं.
यूपी में क्या सियासी गेम बदल पाएंगे ओवैसी
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता 20 फीसदी के करीब हैं, जो सूबे की कुल 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 143 सीटें पर निर्णायक भूमिका में हैं. इनमें से करीब 73 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, जो मुख्य रूप से पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के जिलों में फैली हुई है. मौजूदा समय में मुस्लिम वोटर बीजेपी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी के पक्ष में लामबंद होते रहे हैं, लेकिन अब इन्हीं वोटों पर असदुद्दीन ओवैसी की नजर है.
ओवैसी मुस्लिम वोटों को अपने साथ लामबंद कर यूपी की सियासत में गेम बदलने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह से यूपी में मुस्लिम मतदाता सपा का परंपरागत वोट बना हुई है, उसके चलते AIMIM 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुला. ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन तलाशने के लिए फिर से पूरी ताकत झोंक रखी है, लेकिन जब बात 'गेम बदलने' की आती है, तो दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा फासला नजर आता है.
यूथ में क्रेज बनाम बूथ की हकीकत
ओवैसी की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ और युवाओं में उनका क्रेज सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरता है. ओवैसी का बेबाक अंदाज, संविधान के दायरे में रहकर हक की बात करना और मुस्लिम समाज के मुद्दों पर आक्रामक रुख, युवाओं के एक वर्ग को आकर्षित करता है. इतना ही नहीं ओवैसी की जज्बाती बाते मुस्लिम युवाओं को काफी लुभा रही है, लेकिन भीड़ हमेशा वोटों में तब्दील नहीं होती. सूबे में देखा गया है कि ओवैसी का भाषण सुनने के लिए भीड़ तो जुटती है, लेकिन चुनाव के दिन 'जीतने वाले उम्मीदवार' की तरफ शिफ्ट हो जाती है.
उत्तर प्रदेश की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी 2017 के चुनाव से किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन अभी तक उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला. 2017 में AIMIM ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें से सिर्फ एक सीट पर ही मुख्य मुकाबले थे, वो सीट संभल रही थी, जहां से जियाउर्रहमान बर्क चुनाव लड़े थे. हालांकि, वो भी जीत नहीं सके थे. इसके अलावा सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. 2022 के चुनाव में AIMIM ने करीब 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से एक उम्मीदवार गुड्डू जमाली को छोड़कर सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी. 2017 में AIMIM को 0.2 फीसदी और 2022 में 0.43 फीसदी वोट मिला है.
'गेम चेंजर' या फिर 'वोट कटवा' बनेंगे?
यूपी की सियासत में मुख्य रूप से भाजपा और समाजवादी पार्टी (गठबंधन) के बीच सिमटी हुई है. ऐसे में ओवैसी पर लगातार 'वोट कटवा' पार्टी या विपक्ष द्वारा बीजेपी की 'बी-टीम' होने का आरोप लगता है. यूपी का मुस्लिम वोटर बेहद रणनीतिक तरीके से मतदान करता है. मुस्लिमों की पहली प्राथमिक लक्ष्य उस उम्मीदवार या पार्टी को चुनना होता है जो भाजपा को हराने की स्थिति में हो. मुस्लिम समुदाय को लगता है कि ओवैसी को वोट देने से धर्मनिरपेक्ष वोट बंट जाएंगे, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा. इसके कारण है कि ओवैसी की अपील के बावजूद जमीनी स्तर पर बड़ा वोट बैंक उनके साथ नहीं जुड़ पाता.
मुस्लिम मतदाता सूबे में सपा का कोर वोटबैंक माना जाता है. 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का 80 फीसदी से भी ज्यादा वोट सपा को मिला है. यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन होने से अखिलेश यादव मानकर चल रहे हैं कि 2027 में मुस्लिम वोटर लामबंद रहेंगे. इसीलिए मुस्लिम वोटों पर बहुत ज्यादा तवज्जे देने के बजाय बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी के लिए दांव चल रहे हैं, जिसके लिए सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर खड़े दिख रहे हैं.
अखिलेश यादव जिस तरह मुसलमानों के मुद्दे और मुस्लिम प्रतिनिधित्व की पर चुप्पी साधे हुए हैं, उसे लेकर मुस्लिमों में बेचैनी है. ऐसे में ओवैसी अब उस असंतोष को भुनाने की कवायद में जुट गए हैं और उनकी नजर मुस्लिम वोटबैंक को अपने पाले में लाने की है. ओवैसी भले ही खुद सीटें न जीत पाएं, लेकिन अगर वे मुस्लिम बहुल सीटों पर 10-15 हजार वोट भी काटने में कामयाब रहे, तो सियासी गेम बदल सकता है. बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने आरजेडी को इसी तरह नुकसान पहुंचाया था, लगता है कि ओवैसी उसी फॉर्मूले से यूपी का गेम बदलने का दावा कर रहे हैं.
यूपी में संगठन और लीडरशिप की कमी
किसी भी राज्य में गेम बदलने के लिए सिर्फ एक दमदार चेहरे की नहीं, बल्कि एक मजबूत सांगठनिक ढांचे की जरूरत होती है. यूपी में एआईएमआईएम के पास बूथ स्तर का मजबूत संगठन नहीं है.ओवैसी को आज भी यूपी की सियासत में 'हैदराबाद के नेता' के रूप में देखा जाता है. जब तक AIMIM स्थानीय स्तर पर मजबूत और सर्वमान्य नेता तैयार नहीं करेगी, तब तक केवल ओवैसी के दौरों के दम पर चुनाव जीतना नामुमकिन है.
ओवैसी का राजनीतिक प्रभाव देश में उन्हीं सीटों पर दिखा है, जहां पर उनके साथ मजबूत मुस्लिम नेता रहे हैं और मुस्लिमों की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा रही है. तेलंगाना से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक ओवैसी की पास स्थापित मुस्लिम नेता है, जिन्हें आगे कर चुनावी गेम बदला है और यूपी में भी उनकी पार्टी की जमानत उन्हीं सीटों पर बची है, जहां पर स्थानीय स्थापित मुस्लिम नेता चुनाव लड़े थे. ट
ओवैसी तलाश रहे यूपी में कोई मजबूत साथी
उत्तर प्रदेश में ओवैसी के पास कोई बड़ा जनाधार वाला मुस्लिम चेहरा नहीं है और न ही जमीनी स्तर पर संगठन बहुत मजबूत है. ऐसे में यूपी का मिजाज बदलने के लिए ओवैसी 'केवल मुस्लिम राजनीति' वाले ठप्पे से बाहर निकलकर मुस्लिम, दलितों, पिछड़ों और वंचितों का एक मजबूत सामाजिक गठबंधन बनाने की है, जैसा उन्होंने बिहार में प्रयोग किया था. असदुद्दीन ओवैसी यूपी में बसपा के साथ गठबंधन करने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं, लेकिन मायावती अकेले चुनाव लड़ने के फैसले पर कायम है.
मायावती से हरी झंडी न मिलती देख ओवैसी यूपी में स्वामी प्रसाद मौर्य और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर चुनाव लड़ने बात की चल रही है. हालांकि, स्वामी प्रसाद मौर्य यूपी की राजनीति में अब मजबूत आवाज नहीं रह गए हैं. ऐसे में उनके साथ जुड़ने से भी ओवैसी का कोई बहुत भला होगा, ये कहना जल्दबाजी होगी. चंद्रशेखर आजाद भी चुनावी तैयारियों में जुटे हैं, लेकिन उनके साथ भी ओवैसी के जाने से कितना असर होगा, ये भविष्य में ही पता चलेगा.
कुबूल अहमद