अखिलेश को आई आजम खान की याद... क्या ये ओवैसी की रामपुर रैली का इफेक्ट है?

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के रामपुर दौरे और जेल में बंद वरिष्ठ नेता आजम खान से 22 अक्टूबर को होने वाली मुलाकात के सियासी मायने तलाशे जा रहे. ओवैसी की रैलियों के बाद मुस्लिम वोटबैंक को साधना सपा की सियासी मजबूरी भी है.

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आजम खान और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-ITG) आजम खान और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 20 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:30 PM IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव रामपुर जेल में बंद पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान से मुलाकात करने पहुंच रहे हैं. यह मुलाकात ऐसे वक्त पर हो रही है जब कुछ ही समय पहले AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने रामपुर में एक बड़ी जनसभा कर सपा की मुस्लिम पॉलिटिक्स पर सवाल उठाए थे.

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रामपुर में मुस्लिम वोटबैंक को लेकर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है. ऐसे में अखिलेश यादव और आजम खान की इस मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या अखिलेश यादव का यह दौरा महज एक 'संयोग' है या कोई बड़ा 'सियासी प्रयोग'.

अखिलेश यादव रामपुर के जौहर विश्वविद्यालय पहुंचेंगे और इसके बाद वे जिला जेल में जाकर आजम खान से मुलाकात करेंगे. जेल से निकलने के बाद अखिलेश यादव आजम खान के घर जाएंगे, जहां उनके परिवार से मिलेंगे. ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस समय अखिलेश यादव की यह राजनीतिक मजबूरी क्यों बन गई है, जिसके चलते वे आजम खान से मिलने पहुंच रहे हैं.

ओवैसी की रामपुर एंट्री से सपा बेचैन?

असदुद्दीन ओवैसी की उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों, खासकर रुहेलखंड और रामपुर बेल्ट में सक्रियता बढ़ाना समाजवादी पार्टी के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है. उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता लंबे समय से सपा का सबसे मजबूत और पारंपरिक वोटबैंक माना जाता रहा है. ओवैसी की रैलियों और आक्रामक बयानों का मकसद इसी कोर वोटबैंक में सेंध लगाना है, जो सपा के लिए सियासी टेंशन का सबब बन रही है. रामपुर आजम खान के चलते सपा का प्रमुख गढ़ माना जाता रहा है, जिस पर अब ओवैसी की भी पैनी नजर है.

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रामपुर और आसपास के जिलों में सपा के कद्दावर नेता आजम खान का आज भी मुस्लिम समाज पर सीधा और गहरा प्रभाव है. ऐसे में ओवैसी के बढ़ते कदमों को रोकने और मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की पकड़ को मजबूत बनाए रखने के लिए आजम खान की सियासी अहमियत को नकारा नहीं जा सकता. अखिलेश यादव यह अच्छी तरह जानते हैं कि बिना आजम खान के समर्थन या उनकी अप्रत्यक्ष रजामंदी के उस क्षेत्र के मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट रखना आसान नहीं होगा.

अखिलेश का दौरा संयोग कहें या प्रयोग?

विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच अखिलेश यादव का रामपुर जेल जाने और आजम खान से मिलने का कार्यक्रम बनाना किसी इत्तेफाक या महज औपचारिकता का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया 'प्रयोग' माना जा रहा है. आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम लंबे समय से जेल में बंद हैं, और रामपुर में आजम खान के विरोधी खेमे की सपा में एंट्री को लेकर भी चर्चाएं रही हैं, जिस पर ओवैसी ने भी सवाल उठाने का काम किया था.

पिछले कुछ समय से आजम खान के समर्थकों और परिवार के भीतर यह सुगबुगाहट थी कि इस संकट के दौर में पार्टी ने उस मजबूती से उनका साथ नहीं दिया जिसकी उन्हें उम्मीद थी. अखिलेश यादव का खुद जेल जाकर उनसे मिलना इस नाराजगी को दूर करने की एक बड़ी कोशिश है. इसके जरिए आजम खान को साधकर रखने और रामपुर में उनकी मर्जी के मुताबिक राजनीतिक कदम उठाने के लिए मंथन किया जा रहा है.

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सपा के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण में 'अल्पसंख्यक' वर्ग की सबसे बड़ी कड़ी आजम खान ही हैं. 2027 के चुनाव से ठीक पहले मुस्लिमों को एकजुट रखने के लिए पार्टी नेतृत्व को यह संदेश देना जरूरी था कि सपा हर परिस्थिति में अपने वरिष्ठ नेताओं के साथ खड़ी है. इसे मुस्लिमों को एकजुट रखने का एक बड़ा प्लान माना जा रहा है.

आजम से अखिलेश की मुलाकात के मायने?

अखिलेश यादव के लिए आजम खान से यह मुलाकात करना कई मायनों में राजनीतिक अनिवार्यता बन चुका है. यूपी की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद के उभार और ओवैसी की सक्रियता के बाद विरोधी दल लगातार विपक्षी वोटों में बिखराव कराने की जुगत में हैं. इतना ही नहीं, विपक्ष सपा को मुस्लिम विरोधी कठघरे में भी खड़ा करने में जुट गया है. विपक्ष के इस सियासी चक्रव्यूह को भेदने के लिए सपा अपने मुस्लिम क्षत्रपों को सक्रिय कर कोर वोटबैंक को साधे रखने की कवायद कर रही है.

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2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों ने भले ही एकजुट होकर सपा-कांग्रेस गठबंधन को वोट किया हो, लेकिन 2027 में जिस तरह से ओवैसी से लेकर मायावती और चंद्रशेखर तक मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोड़ने में लगे हैं, उससे समीकरण बदल सकते हैं. यदि मुस्लिम मतदाता नए विकल्प तलाशने लगे, तो सपा के सारे समीकरण लड़खड़ा सकते हैं. मुस्लिम वोट यदि छिटकते हैं, तो सपा के चुनावी समीकरण पूरी तरह चरमरा जाते हैं.

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आजम खान के बहाने मुस्लिमों को संदेश

आजम खान की गैर-मौजूदगी में उस वैक्यूम को भरना अकेले अखिलेश के लिए मुश्किल साबित हो रहा है. आजम खान के स्वास्थ्य और उनके परिवार पर हुई कार्रवाई को लेकर मुस्लिम समाज के एक बड़े हिस्से में गहरी सहानुभूति है. उस सहानुभूति को अपने पक्ष में भुनाने के लिए सपा प्रमुख हर मुमकिन राजनीतिक संकेत दे रहे हैं. 2027 के महासमर से पहले मुस्लिम समाज के बीच यह संदेश जाना बेहद जरूरी है कि सपा उनके हितों और सम्मान के लिए पूरी तरह गंभीर है.

अखिलेश यादव और आजम खान की यह मुलाकात सिर्फ दो नेताओं की भेंट नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के बदलते राजनीतिक समीकरणों की एक अनिवार्य पटकथा है. ओवैसी की रैलियों के बाद इस मुलाकात का होना यह साबित करता है कि समाजवादी पार्टी अपने सबसे भरोसेमंद वोटबैंक को लेकर किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है. ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव का यह प्रयोग कितना असरदार साबित होता है और क्या यह रूठे हुए काडर को फिर से पार्टी के पाले में लाने में कामयाब हो पाता है या नहीं.

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