नेपाल-चीन बॉर्डर पर 26 अगस्त को हुई तबाही के लिए नेपाल में कुछ आवाजें चीन के खिलाफ उठ रही हैं. नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने बुधवार को चीन पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि हमारा उत्तर का पड़ोसी देश अचानक आई बाढ़ के बारे में पहले से चेतावनी देने में नाकाम रहा. विदेश और रणनीतिक मामलों के पत्रकार काफ्ले ने बीजिंग पर आरोप लगाया कि उसने विनाशकारी बाढ़ के बारे में पहले से चेतावनी न देकर काठमांडू को 'कमजोर' किया है.
परशुराम काफ्ले ने एक्स पर लिखा है कि नेपाल ने लगातार उनके इलाके से पैदा होने वाले संकटों का सामना किया है, हम उनकी संभी चिंताओं का समाधान करते रहे हैं, चाहे वे जरूरी हों या गैर-जरूरी.
उन्होंने अपनी बात खरी-खरी सुनाते हुए कहा कि 'आखिर एकतरफा प्यार की कीमत सिर्फ़ नेपाल को ही क्यों चुकानी पड़े?'
नेपाल की चिंता को समझने से पहले 26 अगस्त को हुई इस घटना की ज्योग्राफी और सिक्वेंस को समझना जरूरी है. इस घटना में 100 लोगों की मौत हो चुकी है और 133 भारतीय समेत 700 लोग लापता हैं.
26 अगस्त की सुबह जिस जगह तिब्बत में फ्लैश फ्लड की घटना हुई वहां से नेपाल-चीन के फ्रेंडशिप ब्रिज के बीच की दूरी करीब 20 किलोमीटर है. यानी कि नेपाल के पास तब तक का समय था जबतक की तिब्बत से आए सैलाब ने 20 किलोमीटर की दूरी पूरी नहीं की. अगर इस दरम्यान चीन ने नेपाल को इस फ्लैश फ्लड की जानकारी दे दी होती तो नेपाल जरूर अपने नागरिकों को अलर्ट कर सकता था और नुकसान कम हो सकता था.
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद को बताया कि सुबह 8:37 बजे (स्थानीय समय) तिब्बत इलाके में भूकंप आया और उसके तीन मिनट बाद फ्लैश फ्लड की खबर मिली. इससे संकेत मिलता है कि भूकंप के झटकों की वजह से ग्लेशियर फटा होगा, जिससे बाढ़ आई.
अधिकारियों ने बताया कि बाढ़ का पानी भोटे कोशी नदी से होते हुए तिब्बत से सटे रसुवा और धाडिंग जिलों में फैल गया.
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने बताया कि नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित ल्हेंडे (Lhende) नदी में पानी बढ़ने और चट्टानें खिसकने के कारण, रसुवा जिले के सीमावर्ती शहर तिमुरे में भोटे कोशी नदी से होते हुए बाढ़ का पानी त्रिशूली नदी में जा पहुंचा.
इसके बाद यह बाढ़ नदी के रास्ते नुवाकोट, चितवन, गोरखा, तनहुं और नवलपरासी ईस्ट जैसे अन्य जिलों में फैल गई, जिससे राजधानी काठमांडू से लगभग 70 किमी से लेकर करीब 200 किमी तक के इलाके प्रभावित हुए.
इस आपदा ने नेपाल की पुरानी पुरानी चिंताओं को फिर से जाहिर कर दिया है.
नेपाल चाहता है कि चीन अपने क्षेत्र में होने वाली भौगोलिक घटनाओं की रियल टाइम जानकारी उसके साथ शेयर करे, ताकि नेपाल समय रहते एहतियात के कदम उठा सके. दुनिया में ऊंचाई पर मौजूद कई देश निचले क्षेत्र में स्थित देशों के साथ ऐसा ही करते हैं.
पिछले साल जुलाई में चीन के ऊंचे पहाड़ों में एक ग्लेशियर के ऊपर एक झील बनी और रासुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर की ओर फट गई थी. पानी का तेज़ बहाव लेंधे खोला और भोटे कोशी नदियों से नीचे आया, बॉर्डर पार किया और नीचे की ओर 80 से 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को प्रभावित किया. इससे तब भी करोड़ों का नुकसान हुआ था और एक प्रोजेक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों सहित कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई थी. और रसुवागढ़ी में फ्रेंडशिप ब्रिज पूरी तरह से बह गया था.
इस घटना के बाद दोनों देश बाढ़ और लैंडस्लाइड के बारे में सीमा-पार रियल-टाइम जानकारी साझा करने और ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ के संभावित खतरों के बारे में चेतावनी देने पर सहमत हुए थे.
लेकिन ऐसे सिस्टम को लागू करने के लिए कोई औपचारिक समझौता नहीं किया गया है. अगर ये समझौता आज लागू होता तो नेपाल पानी के बहाव को तो नहीं रोक सकता था लेकिन जान माल के नुकसान को जरूर खत्म कर सकता था.
इस साल मई में नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की चीन यात्रा के दौरान यह मुद्दा फिर से उठाया गया था, लेकिन दोनों पक्षों ने अभी तक किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इस देरी ने नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के लिए दिक्कतें पैदा कर दी हैं. चेतावनी देने वाले किसी कारगर सिस्टम के न होने नदी के किनारे रहने वाले लोग कभी भी प्राकृतिक आपदा के शिकार हो सकते हैं.
बता दें कि बुधवार को तिब्बत से शुरू हुई ज़बरदस्त बाढ़ और फ्लैश फ्लड ने मध्य नेपाल में कई कस्बों और गांवों को तबाह कर दिया, पुल बहा दिए और एक दर्जन पनबिजली परियोजनाओं को ठप कर दिया है. इस घटना में लगभग 100 लोग मारे गए और 133 भारतीय नागरिकों समेत 750 से ज़्यादा लोग लापता हैं.