
अमेरिका और ईरान की बीच हुए डील में शर्तों के अलावे एक और चीज की चर्चा है वो है डील के दस्तावेज का फारसी भाषा में होना. हालांकि डील के दस्तावेज फारसी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में तैयार किए गए थे, लेकिन व्हाइट हाउस और ईरान के राष्ट्रपति ने मीडिया में जो दस्तावेज जारी किया है उस वीडियो में ट्रंप फारसी भाषा वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते दिख रहे हैं.
ईरान और अमेरिका का ये डील काफी अहम और काफी नाजुक था. इसकी हर शर्तें समझौते का मजमून बदल सकती थीं. इसलिए ईरान ने द्विभाषी दस्तावेज की मांग की ताकि कोई अनुवाद की गलती या गलत व्याख्या न हो. फारसी संस्करण ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि आधिकारिक दस्तावेज उनकी अपनी भाषा में होना संप्रभुता और घरेलू राजनीति के लिहाज से जरूरी था.
इस डील पर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी साइन किए. इस डील पर फ्रांस के वर्साय में साइन किया गया है. ये वही जगह है जहां प्रथम विश्व युद्ध के बाद वर्साय की संधि साइन की गई थी. कहा जाता है कि इसी संधि में सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बीज छिपे हुए थे.
इस जंग के आ रही हिंसा की तस्वीरों को देखकर शायद ही किसी को यकीन होगा कि ईरान में रिजीम चेंज का सपना देखने वाले ट्रंप उसी रिजीम के साथ, उस रिजीम की भाषा में समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे.
7 अप्रैल 2026 को ट्रंप ने कहा था कि, "A whole civilization will die tonight, never to be brought back again. I don't want that to happen, but it probably will." यानी कि आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी जो फिर कभी वापस नहीं आएगी.
लेकिन ट्रंप ने अब इसी सभ्यता की सैकड़ों साल पुरानी भाषा में बने दस्तावेज में हस्ताक्षर किया है.

इस पेपर में बायीं ओर जो काली स्याही से सिग्नेचर है वह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का है.
ईरान ने ट्रंप को फारसी भाषा में डील पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर अपनी जनता को ईरानी संप्रभुता, ईरानी संस्कृति, ईरानी भाषा की सर्वोच्चता का संदेश दिया है.
बता दें कि यह एक प्रारंभिक समझौता है, जो युद्ध समाप्त करने, 60 दिनों के लिए सीजफायर बढ़ाने, हॉर्मुज स्ट्रेट फिर से खोलने और आगे की बातचीत का आधार तैयार करता है.
कैसा होता है अंतर्राष्ट्रीय डील का प्रोटोकॉल
वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ ट्रीटीज अंतरराष्ट्रीय कानून का वह मूल दस्तावेज है जो बताता है कि देशों के बीच होने वाली संधियां कैसे बनाई जाएंगी, उनकी व्याख्या कैसे होगी, उन्हें बदला या समाप्त कैसे किया जा सकता है. इसे अक्सर 'Treaty on Treaties' भी कहा जाता है.
इसे 23 मई 1969 को ऑस्ट्रिया की राजधानी Vienna में अपनाया गया. यह 27 जनवरी 1980 से प्रभावी हुआ. आज 100 से अधिक देश इसके पक्षकार हैं. यह परिभाषित करता है कि किन समझौतों को अंतर्राष्ट्रीय संधि माना जाएगा.
अंतर्राष्ट्रीय डील या संधियों का प्रोटोकॉल काफी औपचारिक और मानकीकृत होता है. सबसे पहले दोनों पक्ष मुद्दे पर बातचीत करते हैं. फिर टेक्स्ट को अंतिम रूप दिया जाता है. इस पर हस्ताक्षर इरादे का प्रतीक होता है, यह बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन सद्भावना (Good faith) का संकेत देता है कि पक्षकार आगे अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी करेंगे.
जब दो या अधिक भाषाओं में समझौता होता है, तो सभी संस्करण समान रूप से प्रमाणिक माने जाते हैं. अमेरिका-ईरान मामले में अंग्रेजी और फारसी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल हुआ.
हर भाषा के अक्षर बराबर वैध माने जाते हैं, इस दस्तावेज में स्पष्ट उल्लेख होता है कि सभी संस्करण समान अर्थ रखते हैं.
हस्ताक्षर की प्रक्रिया
राष्ट्राध्यक्ष, विदेश मंत्री या अधिकृत प्रतिनिधि इन समझौतों पर साइन करते हैं. द्विपक्षीय समझौतों में दो मूल प्रतियां तैयार की जाती हैं. यहां "Alternat" सिद्धांत लागू होता है. जिसका उद्देश्य संधि करने वाले देशों के बीच समानता बनाए रखना है.
सरल शब्दों में जब दो देश कोई द्विपक्षीय संधि करते हैं, तो संधि की दो मूल प्रतियां बनाई जाती हैं. प्रत्येक देश के पास रहने वाली प्रति में उस देश का नाम पहले लिखा जाता है, उसके प्रतिनिधि का हस्ताक्षर पहले स्थान पर होता है, और उसकी भाषा को प्राथमिक स्थान दिया जाता है.
हस्ताक्षर के बाद इन समझौतों को वहां की संसद से अनुमोदित किया जाता है. फिर दस्तावेज UN या संबंधित सचिवालय में जमा किए जाते हैं. MoU जैसे प्रारंभिक समझौते अक्सर आसान होते हैं और तुरंत प्रभावी हो सकते हैं.