दिल्ली हाईकोर्ट में जज और मणिपुर हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रहे जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल अपने 16 साल के न्यायिक कार्यकाल के दौरान 'किचन फ्लेम' नामक एलपीजी एजेंसी चलाने के विवाद में घिर गए हैं.
इससे उनके सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के इरादे भी मंद पड़ गए हैं. न्यायमूर्ति या साक्षात् न्याय यानी जस्टिस जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए व्यवसाय करने को नियमों के विरुद्ध मानते हुए, भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने कारण बताओ नोटिस का जवाब न मिलने पर 6 जुलाई को उनकी इस एजेंसी की डीलरशिप सस्पेंड कर दी है.
जस्टिस (रिटायर्ड) सिद्धार्थ मृदुल ने वकालत की शुरुआत 1986 में दिल्ली हाई कोर्ट से की थी. वह मार्च 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट में जज बनाए गए. अक्टूबर 2023 में वे मणिपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने.
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'किचन फ्लेम' कंपनी के लिए BPCL और मृदुल के बीच डिस्ट्रीब्यूटरशिप एग्रीमेंट को 25 अगस्त 1995, 24 अगस्त 2005, 23 अगस्त 2010, 25 अगस्त 2015, 7 मई 2025 और पिछले साल 29 सितंबर (24 अगस्त 2030 तक की वैलिडिटी के साथ) को रिन्यू किया गया था.
यह खुलासा उनके पूर्व मैनेजर की विधवा द्वारा स्वामित्व विवाद को लेकर दायर की गई याचिका और एक जनशिकायत के बाद हुआ. गैस एजेंसी को मैनेज करने वाले उनके पूर्व मैनेजर की पत्नी मोनिका यादव ने स्वामित्व अधिकार अपने नाम ट्रांसफर करवाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था. इसके बाद, दिसंबर 2025 में इस बात की औपचारिक जन शिकायत दर्ज हुई कि एजेंसी का असली मालिक एक सिटिंग जज है.
इसके बाद बीपीसीएल ने नियमों के उल्लंघन यानी न्यायिक पद पर रहते हुए बिना अनुमति व्यवसाय करने को लेकर जस्टिस मृदुल को कई कारण बताओ नोटिस भेजे. कोई जवाब न मिलने पर, बीपीसीएल ने एजेंसी की डीलरशिप को निलंबित कर दी.
न्यायिक कार्यवाही में खुलासा हुआ कि एजेंसी सस्पेंड होने के बाद मोनिका यादव ने बीपीसीएल की निष्क्रियता और पुराने मालिक (जस्टिस मृदुल) की गलतियों का हवाला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में दोबारा याचिका दायर की थी इसके बाद यह पूरा मामला सार्वजनिक हो गया.