अफ्रीका में इबोला का प्रकोप तेजी से फैल रहा है. मई में कांगो से शुरू हुआ यह संक्रमण अब कई देशों तक पहुंच चुका है. स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए इसे रोकना बड़ी चुनौती बन गया है. कमजोर निगरानी, लोगों की लगातार आवाजाही और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण बीमारी पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है. इस प्रकोप के पीछे बुंडीबुग्यो वायरस है.
यह इबोला वायरस का एक दुर्लभ प्रकार है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके लिए अभी कोई स्वीकृत टीका या विशेष इलाज नहीं है. संक्रमण के मामलों और मौतों की संख्या को लेकर चिंता बढ़ रही है.
इस महीने युगांडा के एंटेबे एयरपोर्ट पर नाइजीरिया और केन्या के दो मरीजों के एक-दूसरे के संपर्क में आने की आशंका है. अफ्रीका CDC यानी अफ्रीका रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र, अफ्रीकी संघ की एक विशेष और स्वायत्त सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी है. जिसके अधिकारियों के अनुसार, दोनों मरीजों ने 3 अक्टूबर को यहां से यात्रा की थी. हालांकि, इसकी जांच अभी जारी है. नाइजीरिया में एक महिला के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है.
उसके संपर्क में आए 44 लोगों की पहचान की जा रही है. वहीं, केन्या में अब तक नौ मामले सामने आए हैं. कांगो में मई से फैले इस प्रकोप में 9,500 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं.
पांच देशों में सामने आए मामले जैसे कांगो, युगांडा, केन्या, फ्रांस और नाइजीरिया में इस प्रकोप से जुड़े मामले सामने आए हैं. नाइजीरिया में युगांडा से लौटी एक महिला में संक्रमण की पुष्टि हुई. महिला में 7 अक्टूबर से लक्षण दिखाई देने लगे थे. हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि महिला ने कांगो की यात्रा की थी या नहीं. केन्या में नौ मामले सामने आए हैं.
इनका संबंध ऐसे व्यक्ति से बताया गया है, जिसने कांगो से युगांडा के रास्ते यात्रा की थी. वहीं, फ्रांस में कांगो से लौटे एक डॉक्टर में जून में संक्रमण मिला था. बाद में वह ठीक हो गया और 4 जुलाई को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
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अफ्रीका में इबोला वायरस फैलने के मुख्य कारण संक्रमित जंगली जानवरों, खासकर फल चमगादड़ों के संपर्क और संक्रमित मांस के सेवन से जुड़े हैं. इंसानों में यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी, दस्त और अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है. दूषित कपड़े, बिस्तर और सुई भी संक्रमण का कारण बन सकते हैं. अंतिम संस्कार की कुछ परंपराएं, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी की कठिनाइयां इसके प्रसार को बढ़ाती हैं.
इबोला संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी और शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के सीधे संपर्क से फैल सकता है. दूषित कपड़ों और बिस्तर के संपर्क से भी संक्रमण का खतरा रहता है. कांगो के कुछ इलाकों में हिंसा, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना और स्वास्थ्य अधिकारियों पर भरोसे की कमी से हालात बिगड़ रहे हैं. कई मरीजों की पहचान देर से होने के कारण संक्रमण को रोकना कठिन हो रहा है.
क्या भारत में भी कभी आया है इबोला का कोई मामला?
भारत में इबोला वायरस का मामला केवल वर्ष 2014 में सामने आया था. यहां आधिकारिक तौर पर इबोला का कोई स्थानीय या स्वदेशी संक्रमण नहीं फैला है. हालांकि, 2014 में एक अंतरराष्ट्रीय यात्री जो कि पश्चिम अफ्रीका से इलाज कराकर भारत आया था, जिसके शरीर में वायरस की पुष्टि हुई थी.