अमेरिका ने 2025 में रूस के साथ 5.9 अरब डॉलर का बिजनेस किया. इसमें निर्यात और आयात दोनों ही शामिल हैं. ये आंकड़ा 2024 के मुकाबले 14.4 प्रतिशत ज्यादा है. 2025 में अमेरिका ने रूस से कुल 3.8 अरब डॉलर का आयात किया. जो 2024 के मुकाबले 25.6 प्रतिशत ज़्यादा है.
ये आंकड़े अमेरिकी व्यापार विभाग ने जारी किए हैं. यानी कि अमेरिका अपनी जरूरतों के लिए रूस से व्यापार कर सकता है.
रूस से गैस आयात करने की आजादी यूरोपीय देशों को भी है.
2025 में यूरोपीय संघ का रूस से प्राकृतिक गैस आयात लगभग 36-38 अरब घन मीटर (bcm) था, जो कुल EU गैस आयात का करीब 12-13% हिस्सा था.
यूरोपीय देश का रूस से LNG आयात भी जारी है. फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन, नीदरलैंड जैसे देश रूसी एलएनजी ले रहे हैं. 2026 के पहले कुछ महीनों में एलएनजी आयात में वृद्धि भी दर्ज हुई. पाइपलाइन गैस हंगरी, स्लोवाकिया जैसे देशों में ड्रुजबा पाइपलाइन के जरिए आती है. कुछ रिफाइंड प्रोडक्ट्स तीसरे देशों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से यूरोप पहुंच रहे हैं.
यूरोपीय संघ 2027 तक रूसी गैस पूरी तरह बंद करने की योजना बना रहा है, लेकिन फिलहाल पुराने लंबे अनुबंधों के तहत आयात चल रहा है.
अब सवाल है कि अमेरिका किस आधार पर भारत-चीन को रूसी तेल का आयात करने पर मना कर रहा है. ऐसा न करने पर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की ओर से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 100 फीसदी टैरिफ लगा सकते हैं. दरअसल ये 100 फीसदी टैरिफ नहीं, बल्कि 100 फीसदी ब्लैकमेल की अमेरिकी रणनीति है.
जहां अमेरिका दोहरा रवैया अपनाते हुए अपनी जरूरतों के लिए रूस से उर्वरक, यूरेनियम, औद्योगिक सामग्री, रसायन, कीमती धातुएं मंगा सकता है. यूरोप के देश भी रूस से अपना आयात जारी रख सकते हैं लेकिन अगर भारत यही काम करे तो अमेरिका भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है. अमेरिका के इस कानून का अंतरराष्ट्रीय मान्यताओं और सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है
Russia sanctions bill को समझें
बुधवार को अमेरिकी हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स ने एक कानून पास किया, जिससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने के व्यापक अधिकार मिल गए हैं. अब यह कानून बनने के लिए ट्रंप के पास जाएगा.
भारत और चीन पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ने की संभावना है क्योंकि दोनों ही देश रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदते हैं. 'सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर' (CREA) नाम के थिंक-टैंक के अनुसार दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कच्चे तेल के कुल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी आधी थी. इसके बाद भारत (37%), तुर्की (5%) और EU (5%) का नंबर आता है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
बीबीसी के एक एक लेख में भू-रणनीतिक मामलों के जानकार माइकल क्रुगमैन ने कहा है कि "इस नए बिल से भारत पर बड़ी दिक्कतें आ सकती हैं, और यह सबसे बुरे समय में हो सकता है, जब आखिरी स्टेज की सेंसिटिव ट्रेड बातचीत और बड़े पैमाने पर कमजोर रिश्ते हों."
बता दें कि भारत और अमेरिका में ट्रेड डील को लेकर लगातार बातचीत हो रहा है.
भारत के सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने कहा कि भारत भी क्यों न मार्क कार्नी के तरीके को अपनाकर जवाबी टैरिफ (काउंटर-टैरिफ) तैयार किए जाएं? कार्नी ने वह किया जिसकी हिम्मत बहुत कम नेताओं ने की है. उन्होंने कनाडा के लिए नुकसानदेह लगने वाले एक व्यापार समझौते से किनारा कर लिया और अमेरिकी टैरिफ का डॉलर-दर-डॉलर जवाब दिया.
बता दें कि ट्रंप प्रशासन द्वारा कनाडाई सामानों पर 50% तक के नए टैरिफ लगाने के जवाब में कनाडा ने 'डॉलर फॉर डॉलर' जवाबी टैरिफ लगाए.
बीबीसी से बातचीत में दिल्ली के एक थिंक टैंक Global Trade Research Initiative (GTRI) से जुड़े अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि, "यह बिल भारत पर एकतरफ़ा शर्तों पर बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट पर साइन करने के लिए दबाव डालने की एक सीधी और खतरनाक कोशिश है. भारत 1.4 बिलियन लोगों के लिए सस्ती एनर्जी पाने के लिए रूस से तेल खरीदता है, युद्ध को फाइनेंस करने के लिए नहीं, और इन खरीदों ने ग्लोबल सप्लाई और कीमतों को स्थिर करने में मदद की है."
क्रूड मार्केट में स्थिरता लाता है रूसी तेल
भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद को अमेरिका पुतिन के वॉर मशीन से जोड़ता है. लेकिन अमेरिका ये नहीं देखता है भारत ने रूसी तेल खरीदकर दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ने से रोका.
2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस का तेल यूरोप से हटकर एशिया की ओर मुड़ा. भारत ने इस रियायती तेल को बड़ी मात्रा में खरीदा. अगर भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था यह तेल न खरीदती, भारत को दूसरे बाजार का रुख करना पड़ता, और रूसी कंपनियां अचानक तेल उत्पादन रोक देतीं. इससे वैश्विक आपूर्ति में अचानक कमी आती और ब्रेंट जैसी बेंचमार्क कीमतें 10-15 डॉलर प्रति बैरल या अधिक बढ़ जातीं.
भारत की खरीद से रूसी तेल बाजार में बना रहता है, आपूर्ति स्थिर रहती है और कीमतों में उछाल रुका रहा. साथ ही भारत रिफाइनरी में इसे प्रोसेस कर डीजल आदि निर्यात करता है, जिससे वैश्विक उत्पाद आपूर्ति भी बढ़ती है. इससे विकासशील देशों सहित पूरी दुनिया में महंगाई का दबाव कम होता है.
अमेरिका ने भारत को दी थी छूट
रूसी कच्चे तेल को लेकर अमेरिका की नीतियां कभी भी एक जैसी नहीं रहीं. अमेरिका ने मार्च 2026 में भारत को अस्थायी रूप से 30-दिन का वेवर दिया था. ताकि भारत रूसी रियायती तेल खरीद सके. दरअसल इस दौरान होर्मुज स्ट्रेट में जंग के कारण तेल की सप्लाई बाधित हो गई थी. इससे वैश्विक क्रूड की आपूर्ति घटी और कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं.
अमेरिका को डर था कि कीमतों में और उछाल अमेरिकी उपभोक्ताओं और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा. इसलिए अमेरिकी ट्रेजरी ने भारत को समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी. इसका उद्देश्य था कि तेल बाजार में प्रवाह जारी रहे और कीमतों पर दबाव कम हो.
यानी रूसी तेल को लेकर सवाल सिर्फ प्रतिबंधों का नहीं बल्कि नियम किसके लिए और किस शर्त पर लागू होते हैं, इसका भी है मसला है. अमेरिका खुद अपनी अर्थव्यवस्था की जरूरत के मुताबिक रूस से कुछ रणनीतिक उत्पादों का आयात जारी रखता है, यूरोप भी अभी पूरी तरह रूसी गैस से अलग नहीं हुआ है. दूसरी तरफ भारत और चीन की रूसी तेल खरीद को वॉर मशीन से जोड़कर देखा जाता है.
भारत के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मामला सिर्फ रूस से तेल खरीदने का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, रिफाइनिंग और वैश्विक तेल आपूर्ति का है. फिलहाल भारत ने दो टूक कह दिया है कि इंडिया अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों का ख्याल करते हुए कई स्रोतों से तेल खरीदना जारी रखेगा.
चीन ने किया विरोध
चीन ने भी अमेरिका के इस बिल का विरोध किया है. चीन का कहना है कि दूसरे देशों के साथ उसके सामान्य व्यापार और आर्थिक सहयोग में किसी तीसरे पक्ष का दखल या दबाव नहीं होना चाहिए.
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने यहां एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि चीन ऐसी किसी भी कार्रवाई का विरोध करता है जिसे UN सुरक्षा परिषद की मंजूरी न मिली हो. गुओ ने कहा, "चीन समानता और आपसी फायदे के आधार पर दूसरे देशों के साथ सामान्य आर्थिक और व्यापारिक सहयोग करता है."
उन्होंने कहा, "इस तरह के सहयोग का मकसद किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाना नहीं है और यह किसी तीसरे पक्ष की रुकावट या दबाव से मुक्त होगा. चीन 'लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन' और एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है, जिनका अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है और जिन्हें UN सुरक्षा परिषद का अधिकार नहीं मिला है."