पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनाव आयोग के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि टीएमसी के चुनाव चिन्ह से जुड़े मामले पर फैसला लेने में कितना समय लग सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से एक संभावित और उचित समयसीमा बताने को कहा है.
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आयोग बताए कि वह टीएमसी के चुनाव चिन्ह के मामले पर कब तक फैसला कर सकता है. इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी.
दरअसल, ममता बनर्जी की चुनाव आयोग के खिलाफ दाखिल याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर हाल ही में हुए विवाद के बाद ममता ने याचिका दायर की थी. मालूम हो, चुनाव आयोग ने हाल ही में TMC पार्टी के नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके पुराने ‘घास-फूल’ चुनाव चिन्ह को फिलहाल फ्रीज कर दिया है. आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह भी दिए हैं.
सिब्बल बोले- चुनाव कार्यक्रम के बीच क्यों लिया फैसला?
ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद आयोग ने यह आदेश क्यों दिया. आयोग के पास यह आदेश जुलाई में भी जारी करने का विकल्प था.
सिब्बल ने कहा कि उनकी ओर से कई बार आयोग के सामने अपनी बात रखी गई थी. इसके बावजूद EC ने उस समय फैसला नहीं लिया. जब चुनाव कार्यक्रम आ गया तो आयोग ने आदेश जारी कर दिया. इससे उनके पक्ष के पास तुरंत राहत पाने का रास्ता सीमित हो गया.
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सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर इस आदेश को कायम रहने दिया गया तो चुनाव आयोग भविष्य में भी हर चुनाव से पहले ऐसा फैसला ले सकता है. आयोग को अक्टूबर में ही मामले पर फैसला करना चाहिए. चुनाव खत्म होने या अगले चुनाव तक इंतजार नहीं होना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि वह चुनाव पर रोक लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं. उनकी दलील थी कि आयोग को अपने स्तर पर जल्द फैसला करना चाहिए, ताकि विवाद लंबे समय तक न खिंचे.
कोर्ट ने पूछा- चुनाव आयोग और क्या करता?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग और क्या कर सकता था. चुनाव आयोग को दोनों पक्षों के दावों और दस्तावेजों पर विचार करना है. दूसरी ओर, चुनाव आयोग की तरफ से पेश वकीलों ने जल्दबाजी में कोई समयसीमा तय करने पर आपत्ति जताई. एनके कौल ने कहा कि आयोग को दस्तावेज और सबूत देखने होते हैं. ऐसे में एक महीने के अंदर फैसला करने की समयसीमा तय करना सही नहीं होगा.
सुनवाई के दौरान शिवसेना मामले का भी जिक्र हुआ. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि शिवसेना विवाद में देरी का असर देखा गया था. वहीं एनके कौल ने कहा कि उस मामले में अलग परिस्थितियां थीं. वहां दो अलग-अलग नामांकन पत्रों से जुड़े दावे थे और आयोग को उपलब्ध सबूतों के आधार पर फैसला करना था.
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दरअसल, चुनाव आयोग ने टीएमसी के अंदर चल रहे विवाद को देखते हुए अंतरिम व्यवस्था की है. दोनों गुटों को पुराने पार्टी नाम और ‘घास-फूल’ चिन्ह के इस्तेमाल से रोका गया है. ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल प्लेयर’ चिन्ह दिया गया है. वहीं दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिन्ह मिला है.