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मजहब से ऊपर रिश्ता... बिजनौर में बिना भाई की बहन को मिला 'मुस्लिम परिवार' का साथ, रोजे में घर पहुंचकर भरा 'भात'

Bijnor News: बिजनौर के गांव गाजीपुर कुतुब में रिश्तों की एक ऐसी डोर देखने को मिली, जो दो अलग-अलग मजहबों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही मोहब्बत को दर्शाती है. चतर सिंह और अल्लादिया की वर्षों पुरानी दोस्ती को आज उनकी संतानों ने एक भावुक रस्म के जरिए जिंदा रखा.

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बिजनौर के गाजीपुर में अकूरन ने निभाया भाई का फर्ज.(Photo:ITG)
बिजनौर के गाजीपुर में अकूरन ने निभाया भाई का फर्ज.(Photo:ITG)

बिजनौर जनपद के नजीबाबाद इलाके में रिश्तों और परंपराओं को जीवंत करती एक भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है. गांव गाजीपुर कुतुब में जन्मीं अकूरन ने अपने दिवंगत पिता का वचन निभाते हुए ब्रजेश देवी के पुत्र शैंकी के विवाह में भात की रस्म अदा कर अनोखी मिसाल पेश की.

मोहल्ला नवाब का अहाता, बिजनौर में रहने वाले सोमपाल सिंह मूल रूप से गांव शादीपुर के निवासी हैं. उनकी पत्नी ब्रजेश देवी का मायका ग्राम गाजीपुर कुतुब में है.

ब्रजेश देवी का कोई सगा भाई नहीं है. वर्षों पहले उनके पिता चतर सिंह की गांव के ही अल्लादिया से गहरी मित्रता थी. दोनों मित्रों ने अपने जीवनकाल में परिवारों से यह वादा लिया था कि उनके बाद भी आपसी संबंध और आत्मीयता कायम रहनी चाहिए. समय के साथ दोनों का निधन हो गया, लेकिन उनकी दोस्ती की डोर आज भी मजबूत है.

गुरुवार को ब्रजेश देवी के पुत्र शैंकी का विवाह समारोह था. इस अवसर पर अल्लादिया की पुत्री अकूरन ने अपने पिता की कही बात को याद करते हुए भतीजी अकबरी, भतीजे शाकिब और परिवार की अन्य महिलाओं व पुरुषों के साथ विवाह समारोह में पहुंचकर भात की रस्म निभाई. देखें VIDEO:- 

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घर की दहलीज पर पहुंचते ही ब्रजेश देवी ने परंपरागत तरीके से उनकी आरती उतारकर स्वागत किया. माहौल भावुक हो उठा और दोनों परिवारों के सदस्य इस अनोखे रिश्ते की सराहना करते नजर आए.

बिना भाई की बहन को मिला 'मुस्लिम परिवार' का साथ.

भात की रस्म के दौरान अकूरन ने परिजनों को कपड़े और नकदी भेंट कर अपनी जिम्मेदारी निभाई. खास बात यह रही कि कार्यक्रम में शामिल सभी सदस्य 'रोजे' से थे. दिनभर की रस्मों में व्यस्त रहने के बावजूद उन्होंने वहां कुछ भी खाया-पिया नहीं. शाम को अपने घर पहुंचकर सभी ने रोजा इफ्तारी की.

यह आयोजन केवल एक विवाह समारोह नहीं था, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही दोस्ती, भरोसे और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बन गया. गांव और शहर के लोगों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे रिश्ते समाज को जोड़ने और परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम करते हैं.

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