किसी मरीज के लिए डॉक्टर के सामने अपनी बीमारी को सही शब्दों में बता पाना हमेशा आसान नहीं होता. खासकर तब, जब मरीज अपनी स्थानीय बोली में ही सहज महसूस करता हो और डॉक्टर किसी दूसरे प्रदेश की हो. गोंडा में एक डॉक्टर ने मरीजों की इसी परेशानी को समझा और उनकी भाषा सीखने की कोशिश शुरू कर दी. कर्नाटक में पढ़ी-बढ़ी इस डॉक्टर ने पहले हिंदी सीखी और फिर धीरे-धीरे अवधी भी सीख ली. आज स्थिति यह है कि उनके पास आने वाले मरीज जब कहते हैं कि ‘गटई पिरात है’, ‘नटई पिरात है’, ‘चिल-चिल पिरात है’ या ‘छन-छन होत है’, तो डॉक्टर न सिर्फ उनकी बात समझती हैं, बल्कि उसी अंदाज में उनसे बातचीत भी करती हैं.
उनकी अवधी बोलते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने डॉक्टर की भाषा सीखने की कोशिश की जमकर तारीफ की. खास बात यह है कि डॉक्टर का कहना है कि उन्होंने वीडियो को वायरल कराने के इरादे से सोशल मीडिया पर नहीं डाला था. वीडियो अपने आप लोगों तक पहुंचा और लोगों ने इसे खूब पसंद किया.
मरीज बोले ‘गटई पिरात है’, डॉक्टर ने सीखी अवधी
डॉ. अनीता मिश्रा मूल रूप से कर्नाटक के मंगलुरु जिले की रहने वाली हैं. उनके पिता बिजनेसमैन थे. दक्षिण भारत के माहौल में पली-बढ़ीं अनीता की मातृभाषा तुलु है, जबकि कर्नाटक में कन्नड़ भी प्रमुख भाषा है. मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात गोंडा निवासी डॉ. पूर्णोदय मिश्रा से हुई. डॉ. पूर्णोदय उनसे दो साल सीनियर थे. मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान दोनों की मुलाकात हुई और बाद में दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद अनीता मिश्रा गोंडा आ गईं. यहीं से उनकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ. दक्षिण भारत से उत्तर प्रदेश आने के बाद सबसे पहली चुनौती भाषा की थी. आसपास के लोग हिंदी बोलते थे, इसलिए उन्होंने पहले हिंदी सीखी. लेकिन गोंडा में प्रैक्टिस शुरू करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि हिंदी समझने के बावजूद मरीजों की पूरी बात समझना हमेशा आसान नहीं था. खासकर ग्रामीण इलाकों से आने वाली महिला मरीज अपनी बीमारी और शरीर से जुड़ी तकलीफों को अवधी में ही सहज होकर बताती थीं. यहीं से डॉ. अनीता मिश्रा ने अवधी सीखने का फैसला किया.
उन्होंने बताया कि सामान्य हिंदी में कोई व्यक्ति कह सकता है कि उसके सिर में दर्द हो रहा है. लेकिन अवधी बोलने वाला मरीज अपनी तकलीफ को अलग अंदाज में बताता कि सर पिरात ह. इसी तरह गले के लिए अलग-अलग स्थानीय शब्द सुनने को मिले. डॉक्टर ने बताया कि शुरुआत में उन्हें ‘गला’ शब्द ही समझ आता था. एक दिन एक मरीज आया और उसने कहा कि ‘गटई पिरात है.’ डॉक्टर ने समझा कि वह गले में दर्द की बात कर रहा है. इसके कुछ समय बाद दूसरा मरीज आया और उसने कहा कि ‘नटई पिरात है.’ तब डॉक्टर को समझ आया कि स्थानीय बोली में एक ही शरीर के अंग के लिए अलग-अलग शब्द भी इस्तेमाल होते हैं.
‘चिल-चिल पिरात है’ सुनकर भाषा से हुआ लगाव
अवधी सीखते-सीखते डॉक्टर को सिर्फ शब्द ही नहीं, बल्कि मरीजों के बोलने का अंदाज भी पसंद आने लगा. वह बताती हैं कि मरीज अपनी तकलीफ को सामान्य तरीके से बताने के बजाय उसे अलग-अलग स्थानीय शब्दों और भावों के साथ समझाते हैं. कोई दर्द को ‘पिरात है’ कहता है तो कोई ‘चिल-चिल पिरात है’, ‘छन-छन होत है’, ‘झुनझुनात है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है. मरीजों की यह भाषा डॉक्टर को इतनी दिलचस्प लगी कि उन्होंने इसे अपनी रुचि से सीखना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे मरीजों की बातचीत से उनके शब्दों का भंडार बढ़ता गया. किसी मरीज ने कोई नया शब्द बोला तो वह उसका मतलब समझने की कोशिश करतीं. फिर अगले मरीज से बातचीत में वह शब्द दोबारा सुनाई देता तो उसका अर्थ और साफ हो जाता. इस तरह किसी किताब या क्लास से नहीं, बल्कि मरीजों से बातचीत करते-करते डॉक्टर ने अवधी सीख ली.
सोशल मीडिया पर वीडियो हुआ वायरल
डॉक्टर के अवधी बोलने का अंदाज जब सोशल मीडिया पर पहुंचा तो इसे लोगों का खूब प्यार मिला. वीडियो को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह रही कि डॉक्टर ने इसे वायरल कराने के उद्देश्य से नहीं बनाया था. उनका कहना है कि जब वीडियो इंस्टाग्राम पर डाला गया तो वह अपने आप वायरल हो गया. इसके पीछे वह एक वजह यह भी मानती हैं कि गोंडा और अवध क्षेत्र से बाहर रहने वाले बहुत से लोग अपनी बोली से आज भी भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों को जब सोशल मीडिया पर कोई अपनी अवधी में बात करता दिखाई देता है तो उन्हें अपने घर और गांव की याद आती है. शायद यही वजह रही कि वीडियो तेजी से लोगों तक पहुंचा और डॉक्टर के अवधी बोलने के अंदाज को खूब पसंद किया गया.
‘अवधी बोलने में शर्म नहीं, गर्व होना चाहिए’
डॉक्टर का मानना है कि स्थानीय बोलियों को लेकर लोगों में किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए. वह अवधी को अवध क्षेत्र की पुरानी और समृद्ध बोली बताते हुए कहती हैं कि लोगों को इसे बोलने में शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस होना चाहिए. उनका कहना है कि अंग्रेजी सीखना अच्छी बात है और अलग-अलग भाषाएं सीखना भी जरूरी है, लेकिन अपनी स्थानीय भाषा और बोली से दूरी बनाना सही नहीं है. अवधी केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि अवध की संस्कृति और लोगों की पहचान से जुड़ी हुई बोली है.