दुनिया घूमने का सपना तो हर कोई देखता है, लेकिन नौकरी और पैसे की वजह से हर किसी का यह सपना पूरा नहीं हो पाता है. लेकिन एक 28 साल की लड़की ने अपने दुनिया घूमने के सपने को पूरा करने के लिए अपनी कॉरपेट जॉब छोड़ दी और दुनिया घूमने निकल पड़ी, मगर वो कहते हैं ना दूर से देखने पर हर चीज अच्छी लगती है. हालांकि सच्चाई हर बार उतनी ही अट्रैक्टिव नहीं होती है.
कई लोग नौकरी के तनाव से परेशान होकर कुछ समय के लिए ब्रेक लेने और दुनिया घूमने का सपना देखते हैं. उन्हें लगता है कि रोजाना की भागदौड़ से दूर नई जगहों पर घूमना, अलग-अलग संस्कृतियों को जानना और अपनी मर्जी से जिंदगी जीना सुकून देगा. लेकिन कई बार जिस अनुभव को हम दूर से बेहद खूबसूरत समझते हैं, असल में उसका सामना करना उतना आसान नहीं होता.
ऑस्ट्रेलिया की एक 28 साल की महिला के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. पांच साल तक नौकरी करने के बाद उसने दुनिया घूमने के लिए अपना काम छोड़ दिया, लेकिन विदेश पहुंचने के महज दो हफ्ते बाद ही उसे घर की याद सताने लगी. महिला ने सोशल मीडिया पर अपना एक्सपीरियंस शेयर किया है, उनका रेडिट पोस्ट तेजी से इंटरनेट पर वायरल हो रहा है.
नौकरी छोड़कर निकली यूरोप घूमने
ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली 28 साल महिला ने फाइनेंस सेक्टर में करीब पांच साल तक नौकरी की. लगातार काम करने के कारण वह थकान और स्ट्रेस महसूस करने लगी थी. इसी बीच उसके मन में यह ख्याल आया कि फ्यूचर में जिम्मेदारियां बढ़ने से पहले क्यों न दुनिया घूम ली जाए. उसने छह महीने तक अकेले यूरोप घूमने का प्लान बनाया. इसके लिए उसने नौकरी छोड़ दी और अपनी जरूरी चीजें समेटकर सोलो ट्रिप पर निकल पड़ी. महिला को उम्मीद थी कि इस दौरान वह नई जगहों को देखेगी, अलग-अलग लोगों से मिलेगी और वर्क स्ट्रेस से दूर रहकर जिंदगी का मजा लेगी. हालांकि, सफर शुरू होने के दूसरे वीक में ही उसका मन बदलने लगा. उसे घर की याद आने लगी और वह सोचने लगी कि कहीं नौकरी छोड़ने का फैसला जल्दबाजी में तो नहीं लिया.
वियना और रोम में नहीं मिला वैसा एक्सपीरियंस
महिला ने रेडिट पर अपनी परेशानी शेयर करते हुए बताया कि यूरोप पहुंचने के बाद उसका एक्सपीरियंस उम्मीद से काफी अलग रहा. सफर के पहले हफ्ते में वो ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में थी. उसे वहां के लोग ऑस्ट्रेलिया के लोगों की तुलना में कम मिलनसार और कुछ दूरी बनाकर रखने वाले लगे. इसके बाद जब वह इटली की राजधानी रोम पहुंची, तो वहां की साफ-सफाई और सुरक्षा को लेकर भी उसे असहजता महसूस हुई.
महिला के मुताबिक, उसे रोम ऑस्ट्रेलिया के बड़े शहरों के मुकाबले ज्यादा असुरक्षित और गंदा लगा. अपने इस एक्सपीरियंस के बाद उसे अपने देश की कई छोटी-छोटी बातें याद आने लगीं. उसे ऑस्ट्रेलिया के लोगों का फ्रेंडली नेचर, अच्छी कॉफी, सुहावना मौसम और सिक्योरिटी जैसी चीजों की अहमियत समझ आने लगी. उसने बताया कि पहले ऑफिस के काम में इतनी बिजी रहती थी कि इन बातों पर ध्यान देने का समय ही नहीं मिलता था.
यूजर्स दे रहे ट्रिप जारी रखने की सलाह
महिला की पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोग अपने अलग-अलग रिएक्शन दे रहे हैं, कई लोगों ने उसे सलाह दी कि सिर्फ दो हफ्तों के एक्सपीरियंस के आधार पर छह महीने की यात्रा को लेकर कोई फैसला न करे. उनका कहना था कि नए देश, भाषा, संस्कृति और रहन-सहन के तौर-तरीकों के साथ तालमेल बैठाने में समय लगता है. एक यूजर ने लिखा कि नई संस्कृति का अनुभव शुरुआत में असहज कर सकता है, लेकिन समय के साथ इंसान वहां के माहौल में ढलने लगता है. उसने महिला को भरोसा दिलाया कि इसका मतलब यह नहीं है कि उसने गलत फैसला लिया है.
एक अन्य यूजर ने अपने एक्सपीरियंस के बारे में बताते हुए कहा कि सोलो ट्रिप करना कभी-कभी मुश्किल हो सकता है, लेकिन कई साल बाद पीछे मुड़कर देखने पर यही अनुभव जिंदगी को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं. वहीं, एक यूजर ने कहा कि अपनी एक जर्नी का एक्सपीरियंस शेयर करते हुए बताया कि उनको एक सफर को बीच में छोड़कर घर लौटने का पछतावा हुआ था. इसलिए महिला को थोड़ा और समय देना चाहिए. एक यूजर ने यह भी कहा कि कई बार सफर करने से अपने घर की अहमियत पहले से ज्यादा समझ आने लगती है. वहीं, कुछ लोगों ने उसे आराम के दिन रखने और हर समय घूमने की प्लानिंग बनाने के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार सफर करने की सलाह दी.
क्या नौकरी छोड़कर घूमना हमेशा सुकून देता है?
इस महिला का एक्सपीरियंस हमें बताता है कि नौकरी छोड़कर घूमने निकलना हर बार वैसा नहीं होता, जैसा हम सोचते हैं. नई जगहों पर घूमने का उत्साह अपनी जगह है, लेकिन घर से दूर रहना, अकेले फैसले लेना और अनजान माहौल में खुद को ढालना भी यात्रा का हिस्सा है. कई बार हम अपनी रोजाना की जिंदगी से परेशान होकर किसी दूसरी जगह को बेहतर मानने लगते हैं. लेकिन वहां पहुंचने के बाद ही हमें अपनी पुरानी जिंदगी की उन सुविधाओं और छोटी-छोटी खुशियों का एहसास होता है, जिन्हें हम पहले नॉर्मल समझते थे.