आयरलैंड के खिलाफ टी20 सीरीज के पहले मुकाबले में टीम इंडिया को 34 रनों से शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी. हार की वजह सिर्फ बल्लेबाजों का फ्लॉप शो नहीं था, बल्कि टीम सेलेक्शन और खिलाड़ियों के इस्तेमाल को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम वॉशिंगटन सुंदर का है, जिनकी भूमिका भारतीय टी20 टीम में लगातार रहस्य बनती जा रही है.
कभी वॉशिंगटन सुंदर को प्रमुख स्पिनर बताया जाता है, कभी ऑलराउंडर के तौर पर खिलाया जाता है और कभी पूरे मैच में सिर्फ एक ओवर की गेंदबाजी कराकर छोड़ दिया जाता है. शुक्रवार (26 जून) को बेलफास्ट में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जिसके बाद फैन्स और क्रिकेट विशेषज्ञों ने हेड कोच गौतम गंभीर और कप्तान श्रेयस अय्यर की रणनीति पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
मैच से पहले कप्तान श्रेयस अय्यर ने साफ कहा था कि भारतीय टीम दो स्पिनर, तीन तेज गेंदबाज और एक ऑलराउंडर के साथ उतर रही है. सुनने में ऐसा लगा कि वॉशिंगटन सुंदर और अक्षर पटेल स्पिन डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी संभालेंगे. लेकिन मुकाबला शुरू होते ही तस्वीर बदल गई. अक्षर पटेल ने अपने पूरे चार ओवर फेंके, जबकि सुंदर को सिर्फ एक ओवर मिला. सुंदर ने आयरलैंड की पारी का 16वां ओवर फेंका. यानी जिस खिलाड़ी को विशेषज्ञ स्पिनर के तौर पर खिलाया गया, उसे कप्तान ने गेंद थमाने में लंबा वक्त लगा दिया.
तो सुंदर को क्यों खिलाया गया?
बेलफास्ट की पिच पर तेज गेंदबाजों को मदद मिल रही थी. हर्षित राणा, अर्शदीप सिंह, प्रसिद्ध कृष्णा और शिवम दुबे को ज्यादा ओवर मिलना स्वाभाविक था. लेकिन सवाल यह है कि अगर परिस्थितियां पूरी तरह तेज गेंदबाजों के पक्ष में थीं और वॉशिंगटन सुंदर को सिर्फ एक ओवर ही देना था, तो फिर उन्हें प्लेइंग-11 में शामिल करने का तर्क क्या था?
क्या भारतीय टीम एक अतिरिक्त बल्लेबाज के साथ उतरना चाहती थी? अगर ऐसा था तो फिर 15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी जैसे खिलाड़ी को मौका क्यों नहीं मिला? वॉशिंगटन सुंदर का रिकॉर्ड किसी साधारण गेंदबाज जैसा नहीं है. 61 टी20 इंटरनेशनल मैचों में उन्होंने 51 विकेट लिए हैं. इस दौरान उनकी गेंदबाजी औसत 24.17 और इकोनॉमी रेट 7.05 रही है. आधुनिक टी20 क्रिकेट में यह आंकड़े किसी भी स्पिनर के लिए शानदार माने जाते हैं. इसके बावजूद उनके इस्तेमाल का तरीका बेहद अस्थिर रहा है.
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साल 2024 में वॉशिंगटन सुंदर ने 12 टी20I मैच खेले, जिसमें उन्होंने कुल 35 ओवर्स की गेंदबाजी की और 16 विकेट झटके. वहीं पिछले साल सुंदर को सिर्फ 6 टी20I मुकाबले खेलने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने 7.2 ओवर्स फेंके और 4 विकेट चटकाए. इस साल सुंदर ने कुल 3 टी20I मैचों में 7 ओवर्स की बॉलिंग की है, लेकिन विकेट नहीं ले पाए हैं.
दिलचस्प बात यह है कि यह कहानी सिर्फ श्रेयस अय्यर की कप्तानी तक सीमित नहीं है. सूर्यकुमार यादव के नेतृत्व में भी वॉशिंगटन सुंदर को कभी चार ओवर का पूरा स्पेल मिला, तो कभी पूरे मैच में एक से दो ओवर. लगातार बदलती भूमिका ने उन्हें कभी अपनी लय बनाने का मौका ही नहीं दिया. किसी भी गेंदबाज के लिए सबसे जरूरी चीज भरोसा और निरंतरता होती है. लेकिन सुंदर को दोनों ही चीजें कम ही मिली हैं.
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क्या वॉशिंगटन सुंदर टीम के मुख्य स्पिनर हैं? क्या वह बल्लेबाजी ऑलराउंडर हैं या फिर सिर्फ जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किए जाने वाले यूटिलिटी प्लेयर हैं? भारतीय टीम मैनेजमेंट को अब इस सवाल का स्पष्ट जवाब ढूंढना होगा. अगर किसी खिलाड़ी को प्लेइंग इलेवन में जगह मिल रही है, लेकिन उसे उसकी मुख्य भूमिका निभाने का मौका ही नहीं मिल रहा, तो यह नE खिलाड़ी के लिए अच्छा है और ना टीम के लिए.
भारत की हार का सबसे बड़ा कारण बल्लेबाजी रही, इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन बेलफास्ट ने एक और सवाल छोड़ दिया है, जिसका जवाब टीम मैनेजमेंट को देना होगा. जब आपके पास 51 टी20I विकेट लेने वाला अनुभवी स्पिनर मौजूद है, तो उसे सिर्फ एक ओवर गेंदबाजी कराने का क्या मतलब है. अगर वॉशिंगटन सुंदर भारत की टी20 योजनाओं का हिस्सा हैं, तो उन्हें जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए.