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भारत के खिलाफ सीरीज से करोड़ों की कमाई, वेस्टइंडीज खाली हाथ! ICC पर भड़के बोर्ड के CEO

रेवेन्यू मॉडल में बदलाव के लिए ICC और सदस्य देशों के बीच सहमति जरूरी होगी. फिलहाल, क्रिस डेहरिंग के बयान ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आर्थिक असमानता और छोटे बोर्डों के भविष्य पर एक नई बहस छेड़ दी है.

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भारत-वेस्टइंडीज के बीच इस समय टी20 सीरीज चल रही है. (Photo: PTI)
भारत-वेस्टइंडीज के बीच इस समय टी20 सीरीज चल रही है. (Photo: PTI)

भारत के खिलाफ द्विपक्षीय सीरीज से होने वाली कमाई को लेकर क्रिकेट वेस्टइंडीज (CWI) के CEO क्रिस डेहरिंग ने बड़ा सवाल उठाया है. उनका आरोप है कि मौजूदा वित्तीय व्यवस्था में भारत के खिलाफ मैचों से करोड़ों डॉलर का राजस्व पैदा होता है, लेकिन क्रिकेट वेस्टइंडीज को इसमें कोई हिस्सा नहीं मिलता. उन्होंने इस व्यवस्था को विश्व क्रिकेट की बड़ी विसंगति बताते हुए कहा कि मौजूदा मॉडल ने छोटे क्रिकेट बोर्डों के लिए आर्थिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

विजडन क्रिकेट के कार्यक्रम इनसाइड स्कूप में बातचीत के दौरान क्रिस डेहरिंग ने कहा कि भारत और वेस्टइंडीज के बीच होने वाली सीरीज का व्यावसायिक मूल्य काफी अधिक है, लेकिन इससे होने वाली कमाई का लाभ क्रिकेट वेस्टइंडीज को नहीं मिलता. उनके मुताबिक, भारत में आयोजित ऐसी सीरीज से करीब 2 से 3 करोड़ डॉलर तक का राजस्व पैदा हो सकता है, फिर भी कैरेबियाई बोर्ड को इससे कुछ हासिल नहीं होता.

क्रिस डेहरिंग कहते हैं, 'यह विश्व क्रिकेट की सबसे बड़ी विसंगतियों में से एक है. हम भारत के खिलाफ कहीं भी खेलें, वेस्टइंडीज क्रिकेट को कुछ नहीं मिलता. इस मामले में सीरीज भारत में खेली जा रही है. भारत में एक सीरीज से करीब 2 से 3 करोड़ डॉलर का राजस्व पैदा हो सकता है, लेकिन हमें कुछ भी नहीं मिलता.'

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छोटे बोर्ड को नहीं होता ज्यादा मुनाफा?
क्रिस डेहरिंग के इस बयान ने इंटरनेशनल क्रिकेट में कमाई के बंटवारे को लेकर बहस तेज करने का मुद्दा दिया है. क्रिस डेहरिंग का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में बड़े क्रिकेट बोर्ड अपने विशाल घरेलू बाजार के दम पर मोटी कमाई करते हैं, जबकि छोटे बोर्डों को उसी अनुपात में आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता. डेहरिंग ने मौजूदा व्यवस्था की जड़ें 1997 में हुए ICC (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल) के एक फैसले में बताईं. उन्होंने बताया कि उस समय सदस्य देशों ने मतदान के जरिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के रेवेन्यू मॉडल को बदलने का निर्णय लिया था. इससे पहले वेस्टइंडीज की टीम विदेशी दौरों पर जाती थी, तो उसे दौरा शुल्क मिलता था. यह कमाई बोर्ड के लिए बेहद अहम थी और क्रिकेट के संचालन में मदद करती थी.
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उन्होंने कहा कि उस दौर में वेस्टइंडीज की टीम दुनिया की सबसे आकर्षक टीमों में गिनी जाती थी. ऑस्ट्रेलिया, भारत और इंग्लैंड जैसे देशों के दौरे से मिलने वाली रकम कैरेबियाई क्रिकेट को आर्थिक रूप से सहारा देती थी. लेकिन वित्तीय मॉडल बदलने के बाद देशों ने अपने घरेलू टीवी प्रसारण अधिकारों से होने वाली कमाई खुद रखने का फैसला किया.

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क्रिस डेहरिंग के अनुसार, सदस्य देशों को अंदाजा हो गया था कि टीवी राइट्स से भविष्य में कितनी बड़ी कमाई हो सकती है. इसके बाद उन्होंने अपने घरेलू बाजार से मिलने वाले राजस्व को दूसरे बोर्डों के साथ साझा करने से दूरी बना ली. डेहरिंग ने भारत और वेस्टइंडीज के बीच आर्थिक अंतर को भी रेखांकित किया.

एंटीगा-सेंट किट्स का दिया उदाहरण
क्रिस डेहरिंग ने कहा कि भारत को लगभग डेढ़ अरब की आबादी वाले बाजार से कमाई करने का मौका मिलता है, जबकि कैरेबियाई क्षेत्र के कई देशों की आबादी बेहद कम है. डेहरिंग ने एंटीगा का उदाहरण दिया, जहां करीब एक लाख लोग रहते हैं, जबकि सेंट किट्स की आबादी लगभग 30 हजार है. ऐसे छोटे बाजारों से होने वाली कमाई की तुलना भारत जैसे विशाल बाजार से नहीं की जा सकती. यही वजह है कि डेहरिंग मौजूदा मॉडल को छोटे क्रिकेट बोर्डों के लिए नुकसानदायक मानते हैं. उनके मुताबिक, बड़े बोर्ड अपने घरेलू प्रसारण अधिकारों और व्यावसायिक बाजार से भारी कमाई कर सकते हैं, लेकिन छोटे बोर्डों के पास राजस्व जुटाने के उतने अवसर नहीं हैं.

क्रिस डेहरिंग ने दावा किया कि 1997 में रेवेन्यू मॉडल बदलने के फैसले के दौरान सदस्य देशों ने नौ के मुकाबले एक वोट से प्रस्ताव पारित किया था. डेहरिंग ने कहा कि उन्होंने उसी समय चेतावनी दी थी कि यह फैसला वेस्टइंडीज क्रिकेट की आर्थिक स्थिति को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि विदेशी दौरों से मिलने वाली आय उसके लिए कमाई का प्रमुख स्रोत थी.

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क्रिस डेहरिंग के मुताबिक, उस व्यवस्था में बदलाव के बाद वेस्टइंडीज जैसे बोर्डों के लिए अपने क्रिकेट कार्यक्रमों और संचालन का खर्च जुटाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया. डेहरिंग की मांग के केंद्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की कमाई का अधिक न्यायसंगत बंटवारा है. उनका बयान इस सवाल को सामने लाता है कि क्या मौजूदा रेवेन्यू मॉडल बड़े बाजार वाले देशों को जरूरत से ज्यादा फायदा पहुंचाता है और छोटे क्रिकेट बोर्डों को पीछे छोड़ देता है.

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