हिमाचल प्रदेश के चंबा के छोटे से गांव से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंची सीमा की कहानी जितनी संघर्ष भरी है, उतनी ही भावुक भी. 10,000 मीटर में कांस्य जीतकर इतिहास रचने वाली 25 साल की इस धाविका ने नागोया जाने की बात अपनी 78 साल की मां तक को नहीं बताई थी. वजह थी मां की चिंता.
सीमा जानती थीं कि अगर मां को पता चल गया कि बेटी जापान में एशियन गेम्स खेलने जा रही है, तो वह पूरी रात सो नहीं पाएंगी. इसलिए सीमा ने एक छोटा सा 'राज' रखा और मां को यही समझने दिया कि वह हमेशा की तरह बेंगलुरु के ट्रेनिंग कैंप में हैं.
'मां को बताया तो एक दिन सो नहीं पाएंगी'
सीमा ने पदक जीतने के बाद अपनी मां के बारे में बताया, 'मेरे पिता नहीं हैं. मेरी मां काफी बुजुर्ग हैं, उनकी उम्र करीब 78 साल है. मेरा जन्म तब हुआ था, जब वह 45 साल की थीं. जब भी मैं बाहर जाती हूं, वह बहुत तनाव में आ जाती हैं. इसलिए मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैं एशियन गेम्स के लिए जापान जा रही हूं.'
उन्होंने बताया कि मां को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी है. ऐसे में ट्रेनिंग कैंप या प्रतियोगिता के लिए बाहर जाते समय सीमा उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं देतीं. परिवार में सिर्फ बड़ी बहन को सब पता रहता है.
सीमा नागोया रवाना होने से पहले अपनी बड़ी बहन को पूरी जानकारी देकर गई थीं. अब ऐतिहासिक कांस्य जीतने के बाद उम्मीद है कि यह खबर मां तक भी पहुंच गई होगी.
सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हो सकता है मेरी बहन ने उन्हें बता दिया हो. शायद वे टीवी पर मुझे देख रही हों. वरना मां यही सोच रही होंगी कि मैं अभी बेंगलुरु में हूं.'
16-YEAR WAIT ENDS 🥹
— Sony Sports Network (@SonySportsNetwk) September 24, 2026
A relentless sprint and Seema Kumari brings home a historic Bronze in Women’s 10,000m, a first podium for Team India since the 2010 Asian Games🔥
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12 साल की उम्र में पिता को खोया, नंगे पैर दौड़ीं
सीमा का सफर किसी आसान रास्ते की कहानी नहीं है. चंबा जिले के रेटा गांव की रहने वाली सीमा ने महज 12 साल की उम्र में पिता को खो दिया था. बचपन में वह नंगे पैर दौड़ती थीं और मवेशी चराती थीं. गांव में जब उन्होंने एथलेटिक्स को करियर बनाने की कोशिश की तो लोगों ने भी सवाल उठाए, लेकिन मां ने बेटी का साथ नहीं छोड़ा.
आज उसी बेटी ने एशियन गेम्स में भारत के लिए 10,000 मीटर का कांस्य जीतकर अपना नाम इतिहास में दर्ज करा दिया.
सीमा ने कांस्य पदक (32:50.05) जीता. वह एशियन गेम्स में महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने वाली सिर्फ तीसरी भारतीय हैं. उनसे पहले 2010 के एशियन गेम्स में प्रीजा श्रीधरन ने स्वर्ण और कविता राउत ने रजत पदक जीता था.
सीमा के लिए यह सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि एक सपना पूरा होने जैसा है.
उन्होंने कहा, 'यह मेरा पहला एशियन गेम्स है. मुझे गर्व है कि मैंने कांस्य पदक जीता और अपना सपना पूरा किया.'
सोना जीतने निकली थीं, कांसे से नहीं मानीं
10,000 मीटर की रेस को सीमा ने बेहद रणनीतिक बताया. उनके मुताबिक खिलाड़ियों की नजर समय पर नहीं, बल्कि पदक पर थी.
उन्होंने कहा, 'रेस काफी रणनीतिक थी. हर कोई पदक के लिए दौड़ रहा था. मैंने भी सोचा कि मुझे पदक के लिए लड़ना है, क्योंकि यह मेरा पहला एशियन गेम्स है. हर खिलाड़ी अपने देश के लिए गोल्ड जीतना चाहता है.'
सीमा भी सोना जीतने के इरादे से उतरी थीं, लेकिन कांस्य से उन्हें संतोष करना पड़ा. हालांकि उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई है.
28 सितंबर को फिर ट्रैक पर उतरेंगी सीमा
सीमा अब 28 सितंबर को महिलाओं की 5000 मीटर स्पर्धा में उतरेंगी. 10,000 मीटर का कांस्य जीतने के बाद उनका लक्ष्य साफ है- पदक का रंग बदलना.
उन्होंने कहा, 'मैंने गोल्ड जीतने के लिए लड़ाई की, लेकिन कांस्य जीता. मैं खुश हूं. अब मेरा अगला इवेंट 28 सितंबर को 5000 मीटर है. मैं अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करूंगी और पदक का रंग बदलना चाहूंगी.'
पिछले साल वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में रजत जीत चुकीं सीमा ने अपनी तैयारी का श्रेय कोच स्कॉट साइमन को भी दिया. उनके मुताबिक ओलंपिक चैम्पियनों के साथ ट्रेनिंग ने सिर्फ प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती भी बढ़ाई है.
और शायद यही सीमा की कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है- जिस बेटी को मां की चिंता से बचाने के लिए अपना ठिकाना छिपाना पड़ा, वही बेटी अब देश के लिए मेडल जीतकर मां तक अपनी खबर पहुंचा रही है.