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सूखा, बेतरतीब मौसम और डरावनी गर्मी... इस साल ही नहीं अगले साल भी मौसम पर कहर गिराएगा अल-नीनो

2026 में इतिहास का सबसे शक्तिशाली अल नीनो आ चुका है. इसके कारण भारत सहित कई देशों में भीषण सूखा, हीटवेव और अफ्रीका में भारी बाढ़ आएगी, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ेंगी. बेतरतीब मौसम होगा. डरावनी गर्मी होगी.

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ये अल-नीनो इतिहास का सबसे खतरनाक मौसमी सिस्टम है. इससे काफी ज्यादा मौसमी बदलाव होंगे. (Photo: ITG)
ये अल-नीनो इतिहास का सबसे खतरनाक मौसमी सिस्टम है. इससे काफी ज्यादा मौसमी बदलाव होंगे. (Photo: ITG)

जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के इस दौर में दुनिया एक प्राकृतिक संकट के मुहाने पर खड़ी है. अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA, जापान मौसम विज्ञान एजेंसी और यूरोपीय संघ की 'कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' के नए वैज्ञानिक विश्लेषणों और सैटेलाइट डेटा ने पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में 'अल-नीनो' का दौर शुरू हो चुका है. यह कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है; मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि 2026-27 में आने वाला यह अल-नीनो एक सुपर अल-नीनो का रूप ले सकता है, जो इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा.

लेकिन सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि इस बार का अल नीनो सिर्फ एक सामान्य मौसमी चक्र नहीं होगा, बल्कि इसके इतिहास का सबसे विनाशकारी महा-अल नीनो बनने की पूरी आशंका है. इस ऐतिहासिक अल नीनो के कारण साल 2026 और 2027 के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में भयानक सूखा, मूसलाधार बाढ़, जानलेवा हीटवेव और विनाशकारी तूफानी स्थितियां पैदा होने वाली हैं, जो पहले से ही संकट झेल रहे गरीब देशों में भुखमरी और इंसानी त्रासदियों का नया सैलाब ला सकती हैं.

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क्या होता है अल-नीनो और क्यों इस बार का पूर्वानुमान है बेहद खौफनाक?

मौसम विज्ञान की भाषा में समझें तो हर कुछ सालों में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान दो विपरीत कंडीशन के बीच बदलता रहता है. जब समुद्र की सतह का एक बहुत बड़ा हिस्सा सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है, तो उसे अल-नीनो कहा जाता है. जब यही क्षेत्र असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है, तो उसे ला-नीना कहा जाता है. ये दोनों स्थितियां पूरी दुनिया के मौसमी सिस्टम चलाती और प्रभावित करती हैं.

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जेआरसी (JRC) की नई विशेष रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 का यह अल नीनो जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण इतना तेज हो सकता है कि यह पिछले सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स को तोड़ देगा. कंप्यूटर मॉडल्स और सिमुलेशन के जरिए जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे इतने चरम हैं कि वैज्ञानिकों के पास उनका विश्लेषण करने के लिए कोई पुराना ऐतिहासिक उदाहरण तक मौजूद नहीं है. यह अल-नीनो मुख्य रूप से सितंबर 2026 से अपनी ताकत दिखाना शुरू करेगा और दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच अपने चरम पर होगा, जिसका असर मध्य 2027 तक बना रहेगा.

El Nino Climate Phenomenon
इस नक्शे में दिखाया गया है कि कहां-कहां अल-नीनो का असर किस तरह से और कब तक रहेगा. (Photo: JRC)

वैश्विक मौसम पर असर: कहीं सूखे की आग तो कहीं बाढ़ का कहर

इस अल-नीनो का प्रभाव पूरी दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों पर अलग-अलग रूपों में देखने को मिलेगा. जेआरसी की रिपोर्ट में इसके संभावित भौगोलिक प्रभावों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है...

1. भयंकर सूखा और हीटवेव के शिकार होने वाले क्षेत्र

जैसे-जैसे सितंबर 2026 से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय (Tropics and Subtropics) क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी बढ़ना शुरू होगी, दुनिया के कई बड़े देश सूखे की चपेट में आ जाएंगे.

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  • ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया: इन क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी होगी, जिससे जंगलों में आग और पानी का गंभीर संकट पैदा होगा.
  • भारतीय उपमहाद्वीप: अल-नीनो का सीधा और सबसे घातक असर भारत के मॉनसून और कृषि पर पड़ता है. इस बार भारत में सूखे का जोखिम बहुत अधिक बढ़ जाएगा, जिससे देश के जलाशयों और फसलों पर विपरीत असर पड़ेगा.
  • अफ्रीका का साहेल क्षेत्र और मध्य अमेरिका: यहां भी बारिश न होने से अकाल जैसी स्थितियां बन सकती हैं.

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2. अत्यधिक बारिश और बाढ़ का सामना करने वाले क्षेत्र

इसके विपरीत, दुनिया के कुछ हिस्सों में अल-नीनो के कारण सामान्य से बहुत ज्यादा और मूसलाधार बारिश होगी.

  • पूर्वी अफ्रीका: केन्या और सोमालिया जैसे देशों में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा.
  • उत्तर और दक्षिण अमेरिका: ब्राजील के कुछ हिस्सों और अमेरिका के बड़े क्षेत्रों में भारी बारिश होगी. हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक बारिश का मतलब यह नहीं है कि इससे खेती को फायदा होगा. यदि मिट्टी पहले से खराब है या अत्यधिक गीली है, तो भारी बारिश से मिट्टी का कटाव, पोषक तत्वों का नुकसान और फसलों का सड़ना शुरू हो जाता है.

यूरोप में इस बार का अल-नीनो एक अनोखा बदलाव ला रहा है. आमतौर पर अल-नीनो के दौरान यूरोप में पतझड़ के महीने ठंडे होते हैं, लेकिन इस बार का अल-नीनो इतना शक्तिशाली है कि यह इस पैटर्न को उलट देगा. यूरोप में साल 2027 की वसंत ऋतु तक असामान्य रूप से गर्म मौसम बना रहेगा.

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मानवीय संकट और इन्फॉर्म वॉर्निंग: कहां मचेगी सबसे ज्यादा तबाही?

अल-नीनो के कारण होने वाले इस मौसमी बदलाव का सबसे दर्दनाक पहलू इसका 'मानवीय टोल' यानी इंसानी जिंदगियों पर पड़ने वाला असर है. JRC ने इस खतरे का सटीक आकलन करने के लिए एक नए और आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण इन्फॉर्म वॉर्निंग का उपयोग किया है. 

यह टूल मौसम के पूर्वानुमानों को किसी देश में चल रहे युद्ध/संघर्ष, खाद्य असुरक्षा, गरीबी और आर्थिक स्थितियों के आंकड़ों के साथ मिलाकर एक रिस्क स्कोर तैयार करता है.

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इंफॉर्म वॉर्निंग के अनुसार, अगले छह महीनों में मध्य और पूर्वी अफ्रीका के कई देशों में इसके कारण महा-मानवीय संकट पैदा हो सकता है. सूडान, सोमालिया, दक्षिण सूडान और चाड जैसे देश इस समय दुनिया में सबसे उच्चतम चेतावनी स्तर पर हैं. ये देश पहले से ही गृहयुद्ध, जातीय हिंसा, लाखों शरणार्थियों के विस्थापन और चरम भुखमरी से जूझ रहे हैं. 

अब अल नीनो का सूखा और बाढ़ इनके बचे-कुचे संसाधनों को भी नष्ट कर देगी. इसके अलावा, लैटिन अमेरिका के तीन देशों- इक्वाडोर, वेनेजुएला और हैती में भी पहले से जारी आर्थिक और राजनीतिक संकट के ऊपर अल नीनो का सूखा कोढ़ में खाज का काम करेगा, जिससे वहां कानून-व्यवस्था और इंसानी जीवन पूरी तरह पटरी से उतर सकता है.

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El Nino Climate Phenomenon

वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर प्रहार: अनाजों की कीमतों में भारी उछाल की आशंका

अल-नीनो पूरी दुनिया के कृषि चक्र को तहस-बहस करने की क्षमता रखता है. उप-सहारा अफ्रीका, भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे वैश्विक कृषि केंद्रों में फसलों की उत्पादकता में भारी गिरावट आने का अनुमान है.  

अपनी ही जमीन पर बंधक बनने को मजबूर होंगे लाखों लोग

इस रिपोर्ट का एक और बेहद चिंताजनक पहलू 'सूखे के कारण होने वाला अदृश्य विस्थापन' है. जब बाढ़ या चक्रवात आता है, तो लोग तुरंत घर छोड़कर भागते हैं, जो आंकड़ों में दर्ज हो जाता है. लेकिन सूखे का संकट धीरे-धीरे आता है. पानी और भोजन की कमी के कारण लोग मजबूरन अपने घरों को छोड़ते हैं.

डेटा की कमी के कारण यह विस्थापन अक्सर दुनिया की नजरों से छिपा रहता है. सबसे बड़ा खतरा उन लोगों पर है जो अत्यधिक गरीब हैं और संकट के बावजूद कहीं आने-जाने में असमर्थ हैं. पूर्वी अफ्रीका, मध्य अफ्रीका, मध्य अमेरिकी गलियारे और दक्षिण-पूर्व एशिया (जिसमें भारत के कुछ हिस्से भी शामिल हो सकते हैं) में पहले से ही विस्थापित और शरणार्थी जीवन जी रहे लाखों लोगों के सामने दोबारा विस्थापित होने का भयानक दुष्चक्र पैदा होने वाला है.

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विज्ञान और तकनीक की मदद: 'ओशनआई' से समय रहते तैयारी

चूंकि अल-नीनो दुनिया की सबसे पहले से अनुमान लगाने योग्य जलवायु घटनाओं में से एक है, इसलिए यह सरकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय संगठनों को तैयारी करने का एक कीमती मौका भी देता है. यदि समय रहते शुरुआती चेतावनियों के आधार पर फंड रिलीज कर दिए जाएं और अनाज व दवाओं का स्टोरेज कर लिया जाए, तो लाखों जिंदगियों को बचाया जा सकता है.

इस पूरे विश्लेषण के पीछे यूरोपीय संघ की नई पहल ओशनआई की बड़ी भूमिका है. ओशनआई का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के समुद्रों की निगरानी सिस्टम को मजबूत करना है. इसके वैश्विक नेटवर्क समुद्र के भीतर तापमान और धाराओं में होने वाले उन छोटे बदलावों को भी पकड़ लेते हैं जो अल-नीनो को जन्म देते हैं. 

इसी डेटा की मदद से वैश्विक सूखा वेधशाला और वैश्विक बाढ़ जागरूकता प्रणाली जैसी संस्थाएं दुनिया को महीनों पहले सचेत करने में सक्षम हो पाई हैं. अब यह पूरी तरह से दुनिया भर की सरकारों पर निर्भर करता है कि वे विज्ञान की इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती हैं. आने वाले इस महा-संकट से अपने नागरिकों को बचाने के लिए क्या कदम उठाती हैं.

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