इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होने वाला है. यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का है. पितृपक्ष में लोग अपने दिवंगत परिजनों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे धार्मिक कार्य करते हैं. श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति एवं समृद्धि बनी रहती है. इस समय धार्मिक कार्यों के साथ वास्तु में दिशा का भी विशेष महत्व बताया गया है. खासतौर पर पितरों के नाम पर भोजन कराने और उनकी तस्वीर रखने के लिए एक निश्चित दिशा को उपयुक्त माना गया है.
पितृपक्ष में कई परिवार घर पर ब्राह्मणों को आमंत्रित कर उनका पूजन करते हैं. इसके बाद श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है और वस्त्र, दक्षिणा तथा अन्य सामग्री भेंट की जाती है. इस पूरी व्यवस्था के लिए घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा को प्राथमिकता देनी चाहिए. माना जाता है कि सही दिशा में पितरों से जुड़े कार्य करने से पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना और मजबूत होती है और उनका आर्शीवाद भी प्राप्त होता है.
दक्षिण-पश्चिम दिशा पितरों का स्थान
घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा यानी नैऋत्य कोण को पितरों का स्थान माना गया है. यह दिशा पृथ्वी तत्व से संबंधित मानी जाती है. पृथ्वी तत्व स्थिरता, मजबूती और आधार का प्रतीक माना जाता है. इसी कारण पूर्वजों से जुड़े विषयों के लिए नैऋत्य दिशा को विशेष महत्व दिया जाता है. यदि घर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में पर्याप्त जगह उपलब्ध हो तो पितृपक्ष के दौरान ब्राह्मण भोज की व्यवस्था यहां की जा सकती है. पितरों के नाम पर भोजन कराने के साथ श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा देने की परंपरा भी निभाई जा सकती है. इस दौरान घर की स्वच्छता और वातावरण की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए.
पितरों की तस्वीर भी रखें उचित दिशा में
पितरों की तस्वीर के लिए भी दक्षिण-पश्चिम दिशा को उपयुक्त बताया गया है. घर में पूर्वजों की तस्वीर इस दिशा में लगाने से उन्हें सम्मानपूर्वक स्मरण करने की परंपरा निभाई जा सकती है. उचित स्थान पर पितरों की तस्वीर होने से परिवार को पूर्वजों का सहयोग और आशीर्वाद मिलता रहता है. हालांकि पितरों की तस्वीर लगाते समय एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसे घर के मंदिर में देवी-देवताओं के साथ न रखा जाए. देव स्थान और पितृ स्थान को अलग रखना वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उचित माना जाता है.
जगह न हो तो दक्षिण से पश्चिम तक कर सकते हैं व्यवस्था
आजकल कई घरों में स्थान सीमित होता है. ऐसे में यदि दक्षिण-पश्चिम दिशा में ब्राह्मण भोज कराने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है तो दक्षिण दिशा से लेकर पश्चिम दिशा के प्रारंभिक हिस्से तक उपलब्ध स्थान का उपयोग किया जा सकता है. इस प्रकार घर की परिस्थिति के अनुसार व्यवस्था करते हुए पितरों के नाम पर भोजन कराया जा सकता है.
ईशान कोण में पितरों से जुड़े कार्य से बचें
वास्तु में उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को देव स्थान माना गया है. यह दिशा पूजा-पाठ और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है. घर के ईशान कोण में मंदिर होना शुभ माना जाता है. इसलिए इस स्थान की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है. ईशान कोण में पितरों की तस्वीर लगाना अथवा पितरों के नाम पर भोज कराना उचित नहीं माना जाता है. देव स्थान और पितृ स्थान अलग हैं. इसलिए पितरों से जुड़े कार्यों के लिए नैऋत्य दिशा को प्राथमिकता देना बेहतर माना गया है.