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सस्ती शराब का लालच और मौत का मंजर: सागर के बंडा से आंखों-देखी

सागर के बंडा में जहरीली शराब से 11 मौतों के बाद आजतक की ग्राउंड पड़ताल में नौराज गांव का दर्द, सस्ती शराब बेचने वाले कथित ढाबे और मेथेनॉल मिलावट का खुलासा सामने आया...

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सागर के बंडा से ग्राउंड रिपोर्ट.(Photo:ITG)
सागर के बंडा से ग्राउंड रिपोर्ट.(Photo:ITG)

रविवार का दिन था. भोपाल में बारिश हो रही थी. मैं दफ्तर जाने की तैयारी कर ही रहा था कि सागर से हमारे संवाददाता हिमांशु का फोन आया. उन्होंने बताया कि रात में जहरीली शराब पीने के बाद कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 9 लोगों की मौत हो चुकी है.

खबर सुनते ही साफ हो गया था अब दफ्तर से इस कहानी को कवर करना मुमकिन नहीं होगा. सागर जाना पड़ेगा. सुबह करीब 9 बजे मैं भोपाल से सागर के लिए निकल पड़ा. रास्ते भर बारिश थी. भोपाल-कानपुर कॉरिडोर का निर्माण भी जारी था, इसलिए सफर उम्मीद से लंबा हो गया. करीब दोपहर ढाई बजे सागर पहुंचा. लेकिन शहर में रुकने का वक्त नहीं था. जिस इलाके में मौतें हुई थीं, वहां पहुंचना जरूरी था.

सागर से करीब 35 किलोमीटर दूर बंडा पहुंचा तो हालात तनावपूर्ण थे. सड़क पर शव रखकर लोगों ने रास्ता जाम कर दिया था. भारी पुलिस बल तैनात था. गुस्सा था, आक्रोश था और सबसे ज्यादा था अपने लोगों को खोने का दर्द. लेकिन बंडा की असली तस्वीर इसके बाद सामने आई. मैं नौराज गांव की तरफ बढ़ा. यह वही गांव था जहां एक ही गांव के चार लोगों की मौत हुई थी.

नौराज: जहां हर घर में मातम था

गांव में दाखिल होते ही ऐसा लगा जैसे पूरा गांव अपनी आवाज खो चुका हो. चार घरों में मौत थी. मृतकों में ज्यादातर युवा थे. उम्र करीब 25 से 35 साल के बीच. ऐसे युवा, जो मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे थे. आजतक की टीम जब नौराज पहुंची तो करतार सिंह लोधी और राजेंद्र लोधी के शव गांव लाए जा चुके थे. शव देखकर परिवार वालों का दर्द चीख बनकर बाहर आ गया. कहीं महिलाएं रो रही थीं. कहीं बुजुर्ग पिता की आंखें पथरा गई थीं. कहीं भाई सिर पकड़कर बैठा था और इन सबके बीच गांव के छोटे-छोटे बच्चे शायद अभी यह समझ भी नहीं पा रहे थे कि घर का वह शख्स, जो कल तक उनके साथ था, अब कभी वापस नहीं आएगा.

30 साल का करतार…दो बच्चों का पिता

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करतार सिंह लोधी सिर्फ 30 साल का था. उसके दो छोटे बच्चे हैं. शनिवार दोपहर करीब 3 बजे उसने शराब पी थी. इसके बाद वह सोने चला गया. शाम करीब 6 बजे उसकी तबीयत बिगड़ी. परिवार उसे अस्पताल लेकर पहुंचा. लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.करतार के घर में उस वक्त सिर्फ एक मौत नहीं थी. एक परिवार का सहारा चला गया था. दो छोटे बच्चों का पिता चला गया था. एक पत्नी का जीवन उजड़ गया था और एक भाई अपने भाई की मौत को समझने की कोशिश कर रहा था.

राजेंद्र की बहन की चीख…जिसने पूरे गांव को रुला दिया

इसी गांव का 32 साल का राजेंद्र लोधी. राजेंद्र को मजदूरी के लिए इंदौर जाना था. लेकिन राखी पर बहन गांव आई थी. राजेंद्र ने सोचा पहले बहन के साथ त्योहार मना लेता हूं, फिर इंदौर चला जाऊंगा. बहन ने राखी बांधी होगी. भाई की लंबी उम्र और सुरक्षा की प्रार्थना की होगी लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि राखी के कुछ ही दिन बाद यही बहन अपने भाई के हाथ पर बांधी राखी के साथ उसका शव देखेगी. जब राजेंद्र का शव गांव पहुंचा तो उसकी बहन खुद को संभाल नहीं सकी. वह दहाड़ मारकर रोने लगी. बीच-बीच में बेहोश होती रही. गांव की महिलाएं उसे संभालने की कोशिश करती रहीं. लेकिन आखिरकार वह बेहोश हो गई. राजेंद्र के पिता भी बेटे का शव देखकर खुद को संभाल नहीं सके और बेहोश हो गए. एक राखी… और कुछ ही दिनों बाद वही कलाई हमेशा के लिए खामोश.

कीचड़ भरे रास्तों में छिपी एक बड़ी कहानी

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नौराज की गलियों और कीचड़ भरे रास्तों पर घूमते हुए एक बात लगातार सामने आती रही. यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं थी. यहां मरने वाले ज्यादातर लोग युवा थे. गरीब परिवारों से थे. मजदूरी करके परिवार चलाते थे और गांव में शराब का सेवन कोई छिपी हुई बात नहीं थी. लेकिन सवाल यह था जिस शराब का सेवन इतने बड़े पैमाने पर हो रहा था, वह आखिर आ कहां से रही थी? इसी सवाल का जवाब तलाशते हुए हमें एक और चौंकाने वाली तस्वीर मिली.

बंडा का वो ढाबा…जहां सस्ती शराब मौत का सौदा बन गई?

अगले दिन हमने उस रास्ते का रुख किया जहां से इस अवैध शराब के नेटवर्क की एक कड़ी सामने आती दिखी. बंडा से थोड़ी दूरी पर एक ऐसा ढाबा मिला, जिसके बारे में स्थानीय लोगों ने दावा किया कि यहां ठेके से कम कीमत में शराब बेची जाती थी. हमने जब ढाबे की पड़ताल की तो वहां की तस्वीरें चौंकाने वाली थीं. ढाबे के आसपास शराब की खाली बोतलें और पानी के पाउच पड़े थे. पीछे की तरफ खाली शराब की बोतलों को जलाए जाने के निशान थे. जली हुई बोतलों के ढेर में हमें सागर गोल्ड की बोतल भी मिली वही ब्रांड जिस पर पुलिस भी जांच के दौरान सवाल उठा रही थी.

हालांकि, सिर्फ बोतल मिलना यह साबित नहीं करता कि इसी ढाबे से जहरीली शराब बेची गई थी. इसकी पुष्टि जांच में ही होगी. लेकिन सवाल जरूर खड़ा होता है अगर यहां लंबे समय से शराब की बिक्री हो रही थी, तो प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ी?

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स्थानीय ग्रामीणों ने हमें बताया कि सरकारी ठेके पर करीब 200 रुपये में जितनी शराब मिलती थी, उससे कहीं ज्यादा शराब इस तरह के ढाबों पर उसी कीमत में उपलब्ध थी. ग्रामीणों के मुताबिक ठेके पर 200 रुपये में करीब डेढ़ बोतल, जबकि इस ढाबे पर 200 रुपये में चार क्वार्टर तक मिल जाते थे. यही सस्ता सौदा मजदूरों और ग्रामीणों को अपनी तरफ खींचता था. ग्रामीणों ने दावा किया कि शाम होते ही यहां इतनी भीड़ लगती थी जैसे कोई मेला लगा हो.

नौराज में सैकड़ों खाली क्वार्टर और एक डरावना सच

ढाबे की पड़ताल के बाद हम वापस नौराज पहुंचे. गांव में घूमते हुए कई जगहों पर शराब के खाली क्वार्टर दिखाई दिए. सागर गोल्ड और बॉम्बे व्हिस्की के खाली क्वार्टर. कई घरों के बाहर भी इनके ढेर दिखाई दिए.यह तस्वीर बताती है कि इलाके में इन ब्रांड की शराब की खपत कितनी ज्यादा थी. स्थानीय लोगों का कहना था कि उन्होंने कई बार अवैध शराब की बिक्री को लेकर शिकायत की थी. लेकिन अगर शिकायतें हुई थीं तो कार्रवाई कहां थी? और अगर कार्रवाई हुई थी तो अवैध शराब का कारोबार इतने बड़े पैमाने पर चलता कैसे रहा?

पुलिस का दावा: यूपी से आती थी शराब

सागर के एसपी अनुराग सुजानिया ने 'आजतक' को बताया कि पुलिस ने करीब 8 लोगों को हिरासत में लिया है और शुरुआती जांच में शराब के यूपी से लाए जाने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि पूर्व में ललितपुर में एक फैक्ट्री भी पकड़ी गई थी और उसी एंगल से जांच आगे बढ़ाई जा रही है. पुलिस ने करीब 20 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने और आगे और गिरफ्तारियां होने की बात कही.

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एसपी के मुताबिक, पीड़ितों ने गांव के कुछ लोगों द्वारा शराब लाकर बेचने की जानकारी भी दी है. यानी जांच अब सिर्फ शराब पीने वालों तक सीमित नहीं है. शराब कहां बनी, किसने पहुंचाई, किसने बेची और किसकी निगरानी में यह कारोबार चलता रहाइन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं.

इसके बाद हम सागर सर्किट हाउस पहुंचे. वहां स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला से मुलाकात हुई. और आजतक पर उन्होंने इस त्रासदी को लेकर बड़ा खुलासा किया. उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम में मृतकों के शरीर में बड़ी मात्रा में मेथेनॉल पाया गया है. यही वह जानकारी थी जिसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया. शराब में सामान्यतः एथेनॉल होता है, लेकिन मेथेनॉल बेहद जहरीला होता है और इसका सेवन जानलेवा हो सकता है.

राजेंद्र शुक्ला के मुताबिक लालच में शराब में मेथेनॉल मिलाया गया, जिससे सस्ती शराब तैयार की गई. उन्होंने बताया कि करीब 2200 रुपये कीमत की शराब की पेटी को लगभग 700 रुपये में तैयार करने का लालच इस मिलावट के पीछे हो सकता है. यानी कुछ सौ रुपये बचाने की लालच में किसी ने इंसानी जिंदगी की कीमत ही खत्म कर दी.

सरकार ने की अफसरों पर कार्रवाई

घटना के बाद सरकार ने आबकारी और पुलिस विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई की. उपायुक्त एवं संभागीय फ्लाइंग स्क्वाड प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को मुख्यालय ग्वालियर अटैच किया गया. सहायक आयुक्त आबकारी सागर कीर्ति दुबे, सहायक जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और आबकारी उप निरीक्षक बंडा प्रोशनी उरेती को निलंबित किया गया. इसके अलावा बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा और गुगरा चौकी प्रभारी एसआई पूरन लाल लाड़िया को भी निलंबित किया गया.

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सरकार का संदेश साफ था 'लापरवाही हुई तो जिम्मेदारी भी तय होगी'

बंडा सिविल अस्पताल में भर्ती कुछ मरीजों से हमने बात की. यहीं कहानी में एक और विरोधाभास सामने आया. कुछ मरीजों ने बताया कि उन्होंने शराब स्थानीय दुकानदारों या ढाबों से खरीदी थी. वहीं कुछ मरीजों ने दावा किया कि उन्होंने शराब सरकारी शराब ठेके से खरीदी थी. अगर यह दावा सही है तो जांच का दायरा और बड़ा हो जाता है.क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अवैध शराब कहां बिक रही थी.सवाल यह भी है क्या जहरीली शराब अवैध चैनल से आई थी या लाइसेंसी शराब की सप्लाई चेन में भी कोई गड़बड़ी हुई? इसका जवाब जांच और फोरेंसिक रिपोर्ट से ही सामने आएगा.

दो दिन की पड़ताल और कई सवाल

करीब दो दिनों तक बंडा और उसके आसपास घूमने के बाद एक तस्वीर साफ दिखाई देती है. नौराज जैसे गांवों में शराब की खपत थी. स्थानीय लोग सस्ती शराब की उपलब्धता की बात कर रहे हैं. ढाबों पर शराब बिक्री के आरोप हैं. खाली क्वार्टरों के ढेर हैं. पुलिस यूपी कनेक्शन तलाश रही है. पोस्टमार्टम में मेथेनॉल मिलने की बात सामने आई है.

और घटना के बाद आबकारी तथा पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई है. लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल अभी भी जिंदा है जब गांव वाले लंबे समय से अवैध शराब की शिकायत कर रहे थे, तो कार्रवाई समय रहते क्यों नहीं हुई? क्या सिस्टम को पता नहीं था? या सिस्टम ने आंखें बंद कर रखी थीं और अगर किसी स्तर पर लापरवाही हुई थी तो सिर्फ निलंबन काफी है या उस पूरे नेटवर्क की जिम्मेदारी तय होगी? क्योंकि अब यह सिर्फ शराब की बोतल का मामला नहीं है.

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यह उन परिवारों का सवाल है जिनके घरों से कमाने वाले बेटे चले गए. उन बच्चों का सवाल है जिनके पिता अब कभी घर नहीं लौटेंगे. उन बहनों का सवाल है जिन्होंने राखी बांधकर भाई की सलामती मांगी थी. उन माताओं का सवाल है जिनकी आंखों के सामने जवान बेटे का शव पड़ा था. और उस पूरे सिस्टम का सवाल है जिसने जहरीली शराब को लोगों के गले तक पहुंचने से पहले क्यों नहीं रोका?

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