Sarva Pitru Amavasya 2026 Katha: पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है. हिंदू धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है. यह तिथि उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिन्हें अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि मालूम नहीं है या किसी वजह से निर्धारित दिन पर श्राद्ध नहीं कर पाए हैं. इसके अलावा, अमावस्या तिथि पर दिवंगत हुए परिजनों का श्राद्ध भी इसी दिन किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या पर पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है.
वहीं, हिंदू धर्म में सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. इस दिन की महिमा का वर्णन मत्स्य पुराण के 14वें अध्याय में भी मिलता है. इसमें बताया गया है कि किस तरह पितरों की मानसी पुत्री अच्छोदा को अपने कर्मों के कारण स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आना पड़ा. तो आइए, सर्वपितृ अमावस्या पर जानते हैं इस कथा के बारे में.
सर्वपितृ अमावस्या 2026 आज
द्रिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की अमावस्या तिथि की शुरुआत 9 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 35 मिनट पर होगी, जिसका समापन 10 अक्टूबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर होगा. ऐसे में उदया तिथि के हिसाब से सर्वपितृ अमावस्या आज यानि 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को मनाई जाएगी. बता दें कि इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने के साथ-साथ जरूरतमंदों को दान देना भी शुभ माना जाता है.
सर्वपितृ अमावस्या की पौराणिक कथा
मत्स्य पुराण में वर्णित प्रसंग के अनुसार, प्राचीन काल में मरीचि के वंश से जुड़े पितृगण सोमपथ नामक लोक में निवास करते थे. अग्निष्वात्त नाम से प्रसिद्ध इन पितरों की उपासना देवता भी करते थे. इसी लोक में अच्छोदा नाम की एक नदी बहती थी, जिसे पितरों की मानस पुत्री बताया गया है. पितरों ने वहां अच्छोद नाम का एक सरोवर भी बनवाया था.
कथा के मुताबिक, अच्छोदा ने एक हजार दिव्य वर्षों तक कठिन तपस्या की. उसकी साधना से प्रसन्न होकर पितृगण उसे वरदान देने के लिए पहुंचे. सभी पितर दिव्य स्वरूप में थे. उनके रूप और तेज को देखकर अच्छोदा उनके प्रति आकर्षित हो गई. उसने पितरों के साथ रहने की इच्छा भी जाहिर कर दी.
इस वजह से स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आई अच्छोदा
पितरों के प्रति अनुचित आसक्ति के कारण अच्छोदा की तपस्या का प्रभाव समाप्त हो गया और उसे स्वर्गलोक से पृथ्वी पर गिरना पड़ा. इससे वह बेहद दुखी और लज्जित हुई. कथा के अनुसार, जिस दिन अमावसु नामक पितर ने अच्छोदा के साथ रहने की उसकी इच्छा स्वीकार नहीं की, उस तिथि को अमावस्या कहा जाने लगा. इसी प्रसंग के कारण अमावस्या को पितरों के लिए अत्यंत प्रिय तिथि माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए श्राद्ध और अन्य पितृ कर्मों का फल कभी समाप्त नहीं होता.
स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के बाद अच्छोदा को अपनी तपस्या नष्ट होने का गहरा दुख हुआ. वह दोबारा पितृलोक में अपना स्थान पाने की कामना करने लगी और पितरों से प्रार्थना की. उसकी व्यथा देखकर पितरों ने उसे समझाया कि देवयोनि में किए गए शुभ और अशुभ कर्मों का फल उसी दिव्य अवस्था में मिल जाता है, जबकि मनुष्य जन्म में कर्मों का परिणाम मृत्यु के बाद अगले जन्म में भी प्राप्त हो सकता है.
अच्छोदा को मिला अगले जन्म में विशेष स्थान पाने का वरदान
पितरों ने अच्छोदा को बताया कि द्वापर युग के 28वें चक्र में उसका जन्म मछली के रूप में होगा. पितृ मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण उसे यह योनि प्राप्त होगी. हालांकि, इसके बाद वह इस अवस्था से मुक्त होकर राजा उपरिचर वसु की पुत्री बनेगी.
आगे चलकर उसका संबंध महर्षि पराशर से होगा और उसके गर्भ से एक महान पुत्र जन्म लेगा. यह पुत्र बादरायण के नाम से प्रसिद्ध होगा, जिन्हें महर्षि वेदव्यास के रूप में जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में व्यवस्थित किया था. पुराण के अनुसार, अच्छोदा का जन्म सत्यवती के रूप में होगा. राजा शांतनु से विवाह के बाद उसके दो पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य होंगे. आगे चलकर उसकी वंश परंपरा का संबंध धृतराष्ट्र और पांडु से भी जुड़ेगा, जिनके पुत्रों की कथा महाभारत में प्रमुख स्थान रखती है.
पितरों ने अच्छोदा को यह भी बताया कि भविष्य में वह पवित्र नदी के रूप में जन्म लेगी और अच्छोदा नाम से प्रसिद्ध होगी. इस प्रकार उसे अपने कर्मों के परिणाम के साथ-साथ भविष्य में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने का अवसर भी मिलेगा. वरदान देने के बाद पितृगण अंतर्धान हो गए और अच्छोदा को उन कर्मों के फल प्राप्त हुए, जिनका उल्लेख उन्होंने पहले किया था.