Dussehra 2026: देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है. लेकिन झारखंड के देवघर में रावण दहन नहीं किया जाता है. इसके पीछे भगवान शिव से जुड़ी एक खास मान्यता है. देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि रावण भगवान शिव का बड़ा भक्त था. उसने प्रभु श्री राम को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी.
बता दें, देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कहानी रावण से जुड़ी है. तो आइए जानते हैं कि आखिर देवघर में दशहरे पर रावण दहन क्यों नहीं किया जाता है. यहां जानें धार्मिक मान्यता..
रावण की शिवभक्ति से जुड़ी है परंपरा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण भगवान शिव का बड़ा भक्त था. कहा जाता है कि वह बाबा बैद्यनाथ के ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाना चाहता था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और ज्योतिर्लिंग देवघर में ही स्थापित हो गया. मान्यता है कि रावण की वजह से ही बाबा बैद्यनाथ का ज्योतिर्लिंग यहां स्थापित हुआ.
इसलिए कारण देवघर में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता. यहां के लोग रावण के बुरे कामों को सही नहीं मानते, लेकिन भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति का सम्मान करते हैं.
रावण के प्रति सम्मान की वजह
बाबाधाम के तीर्थ पुरोहित के अनुसार, भारतीय संस्कृति में किसी की मदद को भूलना अच्छा नहीं माना जाता है. मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव की भक्ति की थी और बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना में उसकी अहम भूमिका रही थी. इसी वजह से देवघर में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है. देश के दूसरे जगहों पर रावण दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है, लेकिन देवघर में लोग रावण की शिवभक्ति को याद करते हैं.
बाबा बैद्यनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक
झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. यह जगह माता सती से जुड़ी मान्यता के लिए भी जानी जाती है. धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का हृदय गिरा था. इसलिए इसे शक्तिपीठ भी माना जाता है. यहां भगवान शिव और माता सती, दोनों के प्रति लोगों की गहरी आस्था है. मान्यता है कि सच्चे मन से बाबा बैद्यनाथ से मांगी गई मुराद पूरी होती है.