Devshayani Ekadashi 2026: जुलाई के आखिरी हफ्ते से भगवान श्रीहरि विष्णु से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक काल शुरू होने जा रहा है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है. इस दिन से भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसी के साथ चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो पूरे चार महीनों तक चलता है. तो आइए पंडित श्रीपति त्रिपाठी जी से जानते हैं कि देवशयनी एकादशी और चातुर्मास कब से शुरू होगा.
देवशयनी एकादशी तिथि और शुभ मुहूर्त (Devshayani Ekadashi 2026 Date & Shubh Muhurat)
साल 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा.
एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई सुबह 10 बजकर 09 मिनट से
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई सुबह 11 बजकर 57 मिनट तक
देवशयनी एकादशी 2026 व्रत पारण (Devshayani Ekadashi 2026 Vrat Paran Timings)
देवशयनी एकादशी का पारण 26 जुलाई को द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने पर किया जाएगा. जिसका मुहूर्त सुबह 5 बजकर 39 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा.
हिंदू धर्म में इस एकादशी को हरिशयनी या आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है. इसी दिन से चातुर्मास आरंभ होता है. इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य आमतौर पर नहीं किए जाते.
चातुर्मास का महत्व
चातुर्मास को अशुभ समय नहीं माना जाता, बल्कि यह साधना, संयम और आत्मचिंतन का विशेष काल है. वर्षा ऋतु के इन महीनों में प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनि एक स्थान पर रहकर जप, तप, स्वाध्याय और प्रवचन करते थे. भगवान विष्णु का योगनिद्रा में जाना हमें भी यह संदेश देता है कि जीवन की भागदौड़ से कुछ समय निकालकर अपने भीतर झांकें और आध्यात्मिक उन्नति पर ध्यान दें.
शास्त्रों में महत्व
पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करने पर अनेक यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है. भगवान श्रीकृष्ण ने भी धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताते हुए इसे मोक्षदायी बताया है.
पूजा विधि
देवशयनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ या पीले वस्त्र पहनें. इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें. उन्हें पीले फूल, धूप-दीप और तुलसी दल अर्पित करें. इस दिन ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना बहुत शुभ माना जाता है. साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ या श्रवण करने से विशेष पुण्य फल मिलता है.
आध्यात्मिक महत्व
देवशयनी एकादशी हमें यह सिखाती है कि जीवन केवल भौतिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और साधना के लिए भी है. जब भगवान स्वयं योगनिद्रा में जाते हैं, तो यह संकेत होता है कि इंसान भी कुछ समय अपने भीतर झांककर अपने विचारों और कर्मों को सुधारने का प्रयास करें. सच्चा व्रत केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि मन में दया, वाणी में मधुरता और कर्मों में ईमानदारी लाना है. यही भगवान विष्णु की सच्ची उपासना मानी जाती है.