नदी के पानी में एक पल के लिए हलचल होती है. फिर सतह पर कुछ दिखाई देता है और अगले ही पल पानी शांत हो जाता है. रिवर डॉल्फिन यानी सूंस को देखना कई बार इतना ही मुश्किल होता है. अब सोचिए, ऐसी डॉल्फिन की गिनती करनी हो, जो नदी में रहती हैं और जिन्हें हर वक्त आंखों से देख पाना आसान नहीं. यही काम इन दिनों चंबल नदी में चल रहा है.
राजस्थान के धौलपुर से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक फैली चंबल नदी में रिवर डॉल्फिन की नई गणना शुरू हो गई है. इस बार सर्वे में आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों की मदद ली जा रही है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन विभागों के कर्मचारी इस काम में जुटे हैं. उनके साथ देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के 15 विशेषज्ञ भी हैं.

सवाल सिर्फ ये नहीं कि चंबल में कितनी डॉल्फिन हैं. सवाल यह भी है कि वे नदी के किन हिस्सों में मौजूद हैं, उनकी संख्या में क्या बदलाव आया है और उनके संरक्षण के लिए आगे क्या किया जाना चाहिए.
फरवरी में 155 डॉल्फिन मिली थीं
धौलपुर के डीएफओ वी. चेतन कुमार के मुताबिक, फरवरी 2026 में हुई जलीय जीव गणना के दौरान चंबल नदी के 435 किलोमीटर लंबे प्रतिबंधित एरिया में कुल 155 रिवर डॉल्फिन दर्ज की गई थीं. अब नए सर्वे में उनकी संख्या का दोबारा आकलन किया जा रहा है. नई गणना पूरी होने के बाद ही पता चलेगा कि डॉल्फिन की संख्या में कोई बदलाव हुआ है या नहीं.
चंबल में डॉल्फिन की मौजूदगी इस नदी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिहाज से अहम है. रिवर डॉल्फिन मीठे पानी में रहने वाला एक दुर्लभ जलीय स्तनधारी जीव है. इसे बचाने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि इसकी आबादी कहां और कितनी है.
चंबल नदी का एक हिस्सा राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से जुड़ा है. इसलिए यहां जलीय जीवों की गणना किसी एक राज्य के वन विभाग का काम नहीं है. इस अभियान में तीनों राज्यों के वनकर्मी और विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं.

मुख्य सर्वे शुरू होने से पहले वनकर्मियों को देवरी घड़ियाल केंद्र पर एक दिन की स्पेशल ट्रेनिंग दी गई. इस दौरान उन्हें जलीय जीवों के व्यवहार, उनकी आदतों और वैज्ञानिक तरीके से गणना करने की जानकारी दी गई.
ट्रेनिंग के बाद टीमें अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वे के लिए निकलीं. अभियान आगे बढ़ते हुए उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के अंतिम छोर इटावा के पचनदा तक पहुंचेगा. यहां आधुनिक उपकरणों की मदद से सर्वे किया जा रहा है,
देशभर में चल रही है डॉल्फिन की गिनती
चंबल में हो रही यह कवायद किसी एक नदी तक नहीं है. देश की प्रमुख नदियों में रिवर डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चल रहा है.
देश की प्रमुख नदियों में डॉल्फिन की गणना का पहला चरण 2021 से 2024 के बीच पूरा हुआ था. इस दौरान देशभर में कुल 6,227 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं. इनमें 6,224 गंगा डॉल्फिन और पंजाब की ब्यास नदी में मिली तीन सिंधु डॉल्फिन शामिल थीं.
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गणना का दूसरा फेज जनवरी 2026 से शुरू हुआ. इसके शुरुआती सर्वे में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से गंगा सागर तक करीब 2,400 किलोमीटर का क्षेत्र कवर किया जा चुका है. अब इसी अभियान के तहत चंबल और ब्रह्मपुत्र नदी में भी डॉल्फिन की गणना की जा रही है.
गिनती से संरक्षण का रास्ता कैसे निकलेगा?
किसी जीव को बचाने के लिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि वह दुर्लभ है. यह भी समझना पड़ता है कि उसकी आबादी कितनी है, वह किन इलाकों में रह रहा है और समय के साथ उसकी संख्या में क्या बदलाव आ रहा है. डॉल्फिन की गणना से मिलने वाले आंकड़े इसी काम में मदद कर सकते हैं. अगर सर्वे से डॉल्फिन की मौजूदगी वाले अहम इलाकों की पहचान होती है, तो उनके संरक्षण की प्लानिंग में मदद मिल सकती है.
चंबल की लहरों में कितनी डॉल्फिन हैं, इसका जवाब नई गणना पूरी होने के बाद सामने आएगा. फिलहाल तीन राज्यों की टीम नदी के अलग-अलग हिस्सों में यह पता लगाने में जुटी है कि सूंस की आबादी कहां मौजूद है और उसके संरक्षण के लिए किन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है.