नीट पेपर लीक विवाद को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन ने मोदी सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा जंतर-मंतर पर चलाए गए मजबूत आंदोलन के बाद मोदी सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई दो बैठकों की तस्वीरों ने बातचीत का माहौल पूरी तरह बदल दिया.
पहली बैठक में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह आरामदायक सोफे पर बैठे थे, जबकि सीजेपी प्रतिनिधि सौरभ दास और आशुतोष रांका को क्लासरूम जैसी सीधी बैक वाली कुर्सियों पर बैठाया गया था.
हालांकि, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद हुई अगली बैठक में सीजेपी प्रतिनिधियों को भी बराबर का सम्मान देते हुए सोफे पर बैठाया गया. इस बार CJP प्रतिनिधिमंडल की बॉडी लैंग्वेज भी बदल गई थी. सौरभ दास और रांका ज़्यादा सहज दिख रहे थे. पहली बार ऐसा लगा जैसे दो बराबरी के लोग चर्चा कर रहे हों.
इस बीच क्या बदला? बहुत कुछ. इसकी शुरुआत जंतर-मंतर से हुई थी. CJP आंदोलन के बाद ये 5 चीजें बदलीं.
नैरेटिव बदल से काम नहीं चलेगा
इस आंदोलन में सरकार सबसे बड़ा और साफ बदलाव जो सरकार ने मुश्किल अनुभव से सीखा, वह ये था कि नैरेटिव बदलने का पुराना तरीका इस बार काम नहीं आया. पिछले आंदोलनों को अक्सर बातचीत का रुख बदलकर भटका दिया जाता था- "न पाकिस्तान की बात होगी, न मुसलमान की बात होगी, अब सनातन की बात होगी." वही आम ध्यान भटकाने वाली बातें, वही समाज को बांटने वाले मुद्दे.
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इस बार आंदोलन अलग था. पेपर मुश्किल था और विरोध प्रदर्शन अपने मूल मकसद से नहीं भटका. ये दबाव में नहीं झुका. मांग साफ थी. पेपर लीक के लिए जवाबदेही और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा. इसका नेतृत्व करने वाले लोगों का कोई और हित या छिपा हुआ एजेंडा नहीं था. उनकी बातचीत तीखी, सीधी और अपने मुद्दे पर केंद्रित थी.
ये आंदोलन भविष्य के लिए संदेश साफ है. सरकारें अब ये नहीं मान सकतीं कि विरोध करने वालों के चरित्र पर हमला करके विरोध को संभाला जा सकता है. भविष्य के आंदोलन शायद इसी तरीके को अपनाएंगे- जो फोकस्ड हों, मुद्दे पर आधारित हों और जिन्हें पटरी से उतारना मुश्किल हो.
नेतृत्व करने वाले व्यक्ति से ज्यादा मुद्दा क्यों मायने रखता है?
भारत में हर बड़े विरोध का एक चेहरा रहा है. ये विरोध सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल पर बैठने से शुरू हुआ. हमेशा की तरह, वह जल्द ही मुख्य चेहरा बन गए. मीडिया, सरकार और यहां तक कि जनता भी आंदोलनों को एक नेता के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की प्रवृत्ति रखती है.
इसलिए हिसाब-किताब सीधा था, अगर मुख्य चेहरा पीछे हट जाता है तो आंदोलन खत्म हो जाएगा. वांगचुक ने अपनी मूल मांग- शिक्षा मंत्री का इस्तीफा के पूरी तरह से माने जाने पर जोर दिए बिना अपना अनशन तोड़ दिया. ये माना गया था कि उनके बिना, आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा और उस पर कार्रवाई करना आसान होगा. ऐसा नहीं हुआ.
सरकार ने जिस बात को कम आंका, वह ये थी कि इस बार मुद्दा नेता से बड़ा था. पेपर लीक, रद्द हुई परीक्षाएं और करियर की टूटी हुई योजनाओं ने लाखों छात्रों और अभिभावकों को सीधे तौर पर प्रभावित किया था. गुस्सा किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं था. ये पूरे सिस्टम के खिलाफ था. आखिरकार, मंत्री को जाना ही पड़ा.
रील्स ने प्राइम-टाइम को पीछे छोड़ा
इस प्रदर्शन की तुलना में 2011-2013 के 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन से करें. वह 24x7 चलने वाला टेलीविजन इवेंट था. अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने स्टूडियो के चक्कर लगाए. "देश बदलने" के बारे में लंबे भाषण दिए गए. मीडिया ने चर्चा पैदा की, और चर्चा ने दबाव बनाया.
इस बार मामला अलग था. कोई लंबे टीवी इंटरव्यू नहीं हुए. भारी-भरकम राजनीतिक भाषण जैसा लगने की कोई कोशिश नहीं की गई.
इसके बजाय विरोध प्रदर्शन इंस्टाग्राम रील्स से आगे बढ़े. एक लाइन के नारों से. फोन के लिए बनाए गए क्रिएटिव, छोटे और शेयर करने लायक कंटेंट से आयोजकों ने जानबूझकर उस वर्ग तक पहुंच बनाई जिसे आमतौर पर "राजनीति से दूर" (apolitical) कहा जाता है . वो छात्र जो स्क्रॉल करते हैं, न कि वे जो धरने पर बैठते हैं. उन्होंने जंतर-मंतर पर मौजूद रहने को मजेदार बनाया. उन्होंने सिर्फ 60 सेकंड का वीडियो शेयर करके इसमें शामिल होना आसान बना दिया.
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ये प्रदर्शन उन लाखों भारतीयों तक पहुंचा जो पहले केवल बिना पुष्टि वाले व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर प्रतिक्रिया देते थे. अब वह अपने फीड पर असली चेहरे और असली मांगें देख रहे थे. इसमें शामिल होने के लिए आपको अच्छी तरह बोलने वाला या राजनीतिक बैकग्राउंड वाला होने की जरूरत नहीं थी. बस प्रदर्शन से जुड़े वीडियो शेयर करना काफी था. यही विरोध का नया तरीका है और ये किसी भी न्यूज डिबेट से ज्यादा तेजी से काम करता है.
सड़क पर उतरा विपक्ष
छात्रों के इस प्रदर्शन से ठीक एक महीने पहले विपक्ष थका हुआ लग रहा था. वो चुनाव हार रहे थे. सांसद "डेवलपमेंट फंड की कमी" और "चुनाव क्षेत्र के काम" का हवाला देकर अपनी वफादारी बदल रहे थे. दिल्ली में बातचीत डीलिमिटेशन (परिसीमन) के बारे में हो रही थी. माहौल था कि विरोध क्यों करें? किसी को परवाह नहीं है. हालांकि, जंतर-मंतर पर जुटी युवाओं की भारी भीड़ और ऑनलाइन बने इकोसिस्ट ने विपक्षी दलों को अपने आरामदेह सोफों से उठकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया. राजनीतिक दलों को ये एहसास हुआ कि पहले से तय प्रेस कॉन्फ्रेंस और संसद से वॉकआउट का अब कोई असर नहीं हो रहा है. इस प्रदर्शन ने राजनीतिक दलों को याद दिला दिया कि राजनीतिक अभी-भी सड़क से शुरू होती है, न कि सिर्फ संसद से.
रोजगार और भरोसे के संकट को समझा
ऊपर से देखने पर ये विरोध पेपर लीक और एक मंत्री के इस्तीफे को लेकर था. लेकिन सरकार के जवाब से पता चला कि वह समझ गई थी कि दांव पर इससे कहीं ज्यादा चीजें लगी हैं. NEET और CBSE को लेकर गुस्से के पीछे युवाओं और रोजगार को लेकर गहरी निराशा छिपी थी.
साथ ही सरकार को इस प्रोटेस्ट से मैसेज मिला है कि हम जो शिक्षा दे रहे हैं, वह नई पीढ़ी की चाहत के मुताबिक नौकरियां नहीं मिल रहीं. आप सिर्फ बेरोजगारी दर, स्टार्टअप की संख्या या PF अकाउंट डेटा बताकर लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकते, क्योंकि सालों तक तैयारी करने वाले 20 साल के युवाओं के लिए जमीनी हकीकत बहुत अलग होती है. जिस युवा ने परीक्षा की तैयारी में दो साल बिताए हों और फिर पेपर लीक होने की वजह से उस पेपर को रद्द होते देखा हो तो उनकी बुनियादी उम्मीद बस इतनी होती है कि सरकार हमारी बात सुनें.
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कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई दो मीटिंग्स इसलिए याद नहीं रखी जाएंगी कि उनमें क्या कहा गया, बल्कि इसलिए कि किसी के कुछ बोलने से पहले ही कुर्सियों ने क्या कहा.
पहली मीटिंग से स्पष्ट था कि हम सत्ता में हैं. आप फरियादी हैं. जबकि दूसरी मीटिंग में स्थिति पहली मीटिंग से बिल्कुल अलग थी, जिसमें दोनों पक्ष बातचीत के लिए बराबरी के स्तर पर थे. हालांकि, सरकार के रवैए में ये बदलाव शिष्टाचार की वजह से नहीं हुआ. इस दबाव की वजह जंतर-मंतर, इंस्टाग्राम और लाखों छात्र हैं, जिन्होंने अपनी मांग और मुद्दे को कमजोर नहीं पड़ने दिया.