scorecardresearch
 

आ गए MLC चुनाव के नतीजे, पर ये झमेला है क्या?

विधान सभा जिंदाबाद. लेकिन विधान परिषद? बस, किसी तरह 'जिंदा' है. और यही तो समस्या है. यह इसलिए नहीं टिकी है क्योंकि किसी को इसकी जरूरत है, बल्कि इसलिए टिकी है क्योंकि यह उन लोगों के लिए सुविधाजनक है जिनके पास पहले से सत्ता है.

Advertisement
X
बिहार MLC चुनावों में RJD के संजीव कुमार ने पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की. ​​(Photo: PTI)
बिहार MLC चुनावों में RJD के संजीव कुमार ने पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की. ​​(Photo: PTI)

विधान परिषद चुनाव के ताजा नतीजे आ गए हैं. हर कोई इनके बारे में ऐसे चर्चा कर रहा है मानो ये बहुत मायने रखते हों. यही तो जादू है. कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला, जबकि BJP-JD(S) अलायंस ने चारों सीटें जीत लीं. बिहार में तो और भी दिलचस्प तमाशा देखने को मिला. विधान परिषद में 'जन सुराज' का खाता खुल गया है. RJD ने BJP के पांच बार के दिग्गज को उखाड़ फेंका, वहीं दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीत गए. उत्तर प्रदेश में लगभग 41 प्रतिशत ग्रेजुएट मतदाताओं के मतदान के बीच बीजेपी समाजवादी पार्टी पर हावी रही; हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी आगे रही. महाराष्ट्र में प्रिफ्रेंस वोटों की गिनती के दौरान महायुति और एमवीए के बीच खींचतान जारी रही. कल पूरे दिन यही सब खबरों में छाया रहा. हैरानी होती है कि ऐसा क्यों?

हर राज्य में एक विधानसभा होती है, इसके सदस्यों को राज्य की जनता चुनती है. यह हमारे लोकतंत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है. लेकिन फिर यह विधान परिषद क्या बला है?

देखिए, विधान परिषद भारतीय लोकतंत्र का 'अपेंडिक्स' है. 'अपेंडिक्स' समझा आपने? किसी को नहीं पता इसका काम क्या है? लेकिन इसकी कीमत सबको अदा करनी पड़ती है. इसकी चर्चा भी तभी होती है, जब चुनाव होने को होते हैं.

जब भी कोई 'MLC' का जिक्र करता है, तो हमारे दिमाग में 'मेडिको-लीगल केस' (Medico-Legal Case) आता है, न कि 'विधान परिषद का सदस्य' (Member of Legislative Council). ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें जिंदगी में 'मेडिको-लीगल केस' तो अक्सर देखने को मिल जाते हैं, लेकिन 'विधान परिषद के सदस्य' शायद ही कभी नजर आ जाएं.

छह राज्यों ने अभी भी इसे संभाल कर रखा है, ठीक उसी रिश्तेदार की तरह जो सिमुलतला में अपनी पुश्तैनी कोठी बेचने से इनकार कर देता है, भले ही वहां रहने वाला इकलौता व्यक्ति केयरटेकर ही क्यों न हो. बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने इसे अभी भी अपने पास बनाए रखा है.

Advertisement

बाकी के 22 राज्य केवल एक ही सदन के सहारे ही किसी तरह ठीकठाक नुकसान करने वाले कानून पास कर लेते हैं, जाति की लड़ाइयां लड़ लेते हैं, और सदन से शोर-शराबे के साथ वॉकआउट कर जाते हैं. हमारा गणतंत्र नहीं ढह गया है. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब ने तो दशकों पहले ही अपने यहां से इसे खत्म कर दिया था. असम ने तो और भी पहले इसे हटा दिया था. इन राज्यों में किसी को भी इस पुरानी सिस्टम की कमी महसूस नहीं होती.

विधान परिषद की यह पुरानी व्यवस्था कुछ इस तरह से बनती है. इसके एक-तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाते हैं, यानी वही लोग जो चुनाव जीतकर आए हैं, वे ही दूसरे सदन के सदस्यों को चुनते हैं. छठवां हिस्सा हिस्सा राज्यपाल की ओर से नॉमिनेट किया जाता है, जिसका मतलब है कि राज्यपाल को जिसे भी चुनने कहा गया है, उसे चुन लिया जाता है. बाकी सदस्य लोकल बॉडीज, शिक्षकों और ग्रेजुएट्स के बीच से आते हैं.

स्नातक. 2026 में जब एक बैचलर डिग्री आपको जॉब मार्केट में जगह नहीं दिला सकती और न ही आपको 'बैचलर' (अविवाहित/कुंवारे) होने के ठप्पे से बाहर निकाल सकती है, तो बिहार के स्नातक वोटर्स ने इस 'पवित्र अधिकार' को लेकर ऐसी दिलचस्पी दिखाई कि रजिस्टर्ड लोगों में से आधे भी वोट डालने नहीं आए. शिक्षकों का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा. बाकी लोगों ने इसे किसी ऐसे विषय के 'ऑप्शनल पेपर' की तरह लिया, जिसे अब कोई नहीं पढ़ता.

Advertisement

तो फिर यह काउंसिल करती क्या है? ठीक है, समझ लीजिए. संक्षेप में कहें तो: "कृपया प्रतीक्षा करें." यह किसी सामान्य बिल को कुछ महीनों के लिए और 'मनी बिल' (धन विधेयक) को 14 दिनों के लिए रोक सकती है. इसकी कुल संवैधानिक ताकत बस इतनी ही है. यह 'संयुक्त बैठक' (Joint sitting) के लिए मजबूर नहीं कर सकती. यह उस तरह से कार्यपालिका पर अंकुश लगाने का दिखावा भी नहीं कर सकती, जैसा कि इसके समर्थक दावा करते हैं.  बाकी सब तो बस एक नाटक है. जो बिल महत्वपूर्ण होते हैं, वे आखिरकार पास हो ही जाते हैं; अक्सर दोनों सदनों में एक ही पार्टी के लोग एक ही पैटर्न में वोट देते हैं.

विधान परिषद सदा चलने वाला सदन है. हर दो साल में इसके एक-तिहाई सदस्य छह साल का कार्यकाल पूरा करके रिटायर होते हैं. इससे मजमा जारी रहता है. इसे भंग नहीं किया जा सकता, इसलिए जब विधानसभा में सत्ता बदलती है, तब भी यह 'संरक्षण तंत्र' चलता रहता है. जनता की असली प्रतिनिधि संस्था तो भंग हो जाता है, लेकिन ये 'दिखावटी' प्रतिनिधि हमेशा बने रहते हैं.

इसका असली काम एक 'बैक डोर' की तरह है. मुख्यमंत्री तब इसका इस्तेमाल करते हैं जब विधानसभा का मुख्य दरवाजा भीड़ से भरा हो, या जब उपचुनाव रिस्की सौदा हो, या फिर जब किसी हारे हुए वफादार नेता को कहीं 'सेट' करना हो.

Advertisement

अखिलेश यादव ने MLC के तौर पर ही उत्तर प्रदेश की सरकार चलाई. योगी आदित्यनाथ ने भी 2022 तक ऐसा ही किया. उद्धव ठाकरे 2020 में निर्विरोध चुने गए, ताकि मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली न हो जाए. नीतीश कुमार ने अपने लंबे मुख्यमंत्रित्व काल का एक बड़ा हिस्सा बिहार विधान परिषद में बिताया, इसलिए अगर इसे 'नीतीश निवास' कह दिया जाए तो शायद गलत नहीं होगा.  उन्होंने आखिरी बार 1985 में विधानसभा का सीधा चुनाव लड़ा था; उसके बाद दशकों तक उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना.  उन्होंने इस फैसले का बचाव करते हुए उच्च सदन को "एक सम्मानजनक संस्था" बताया. यह संस्था इतनी 'सम्मानजनक' थी कि बाद में उनके बेटे निशांत भी यहां से निर्विरोध चुन लिए गए. जब ​​नीतीश कुमार 2026 में राज्यसभा चले गए तब उन्होंने विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया. सिर्फ इसलिए क्योंकि नियमों के अनुसार उन्हें एक ही सदन चुनना था; तब तक विधान परिषद अपना काम कर चुकी थी.

जब कोई विधान परिषद असहमति जताने की हिम्मत दिखाती है, तो सरकार बस उसका 'स्विच' बंद कर देती है.  1985 में जब कांग्रेस के दबदबे वाली परिषद ने एन.टी. रामाराव के एक कानून को रोक दिया, तो उन्होंने आंध्र प्रदेश के विधान परिषद को ही खत्म कर दिया; उन्होंने इसे एक 'बेकार का बोझ' और 'बेरोजगार नेताओं का पार्किंग स्पेस' करार दिया. 2007 में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी ने इसे फिर से बहाल कर दिया. 2020 में जब उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी की 'तीन राजधानियों' वाली योजना के मामले में विधान परिषद ने अड़ंगा डाला, तो विधानसभा के जरिये इसे फिर से खत्म कर दिया गया .खत्म होना, फिर से पैदा होना, फिर खत्म होना. यही चलता रहता है. तेलंगाना को बंटवारे के समय विधान परिषद  विरासत में मिली और उन्होंने इसे संभाल कर रखा है. कर्नाटक की विधान परिषद का सबसे 'यादगार' पल 2020 में आया, जब सदस्यों ने उप-सभापति को उनकी कुर्सी से खींच लिया. आखिरकार, एक ऐसी बहस देखने को मिली जिसमें 'शारीरिक ताकत' का भी इस्तेमाल हुआ! जो पार्टियां एक राज्य में विधान परिषद का विरोध करती हैं, वे दूसरे राज्य में चुपचाप इसका समर्थन भी कर लेती हैं. खासकर तब जब इसकी यहां की सीटें गुटबाजी को संभालने या सहयोगियों को जगह देने के काम आती हैं.

Advertisement

और इन सबका खर्च आप उठाते हैं. वेतन, पेंशन, सरकारी गाड़ियां, निजी स्टाफ, कैंटीन और बाकी तमाम स्थायी इंतजाम. इन सबके लिए आप ही पैसा देते हैं. यह एक ऐसा 'समीक्षा सदन' है जो असल में किसी चीज की समीक्षा नहीं करता.  यह 'वरिष्ठों का सदन' भी उन्हीं पार्टियों द्वारा चलाया जाता है, जिनका पहले से ही विधानसभा पर कंट्रोल होता है.

इनकी सदस्य संख्या विधानसभा की कुल सीटों के एक-तिहाई तक सीमित होती है और कम से कम 40 सदस्य होने चाहिए. यानी, यह पक्का है कि यहां संसाधनों की बर्बादी तो होनी ही है. यह एक ऐसी 'सेकंड ओपिनियन' है जिसे न तो कोई मांगता है और न ही कोई इस पर ध्यान देता है. यह एक ऐसा चेक है जो हमेशा 'क्लियर' हो जाता है, क्योंकि चेक काटने वाला और उसे भुनाने वाला दोनों एक ही इंसान होते हैं.

ग्रेजुएट और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों को कभी इस तरह पेश किया गया था कि इनसे कानून बनाने की प्रक्रिया में विशेषज्ञता आएगी, क्योंकि एक्सपर्ट चुनकर आने थे. लेकिन अब ये संगठित समूहों और बहुत कम मतदान वाले पेट्रोनेज सिस्टम का अड्डा बनकर रह गए हैं. आज के दौर में, जब उच्च शिक्षा आम हो गई है और डिजिटल पहुंच बढ़ गई है, यह सोचना कि तीन साल की डिग्री या टीचिंग सर्टिफिकेट किसी व्यक्ति को कानून बनाने के लिए विशेष समझ दे देता है, एक पुरानी और बेमानी सोच है. खुद ग्रेजुएट भी मतदान केंद्र पर इस विचार का बचाव करने के इच्छुक नहीं दिखते.

Advertisement

विधान सभा जिंदाबाद. लेकिन विधान परिषद? बस, किसी तरह 'ज़िंदा' है. और यही तो समस्या है. यह इसलिए नहीं टिकी है क्योंकि किसी को इसकी ज़रूरत है, बल्कि इसलिए टिकी है क्योंकि यह उन लोगों के लिए सुविधाजनक है जिनके पास पहले से सत्ता है. यानी 'वे' लोग. और जिनके पास सत्ता नहीं है- यानी 'आप', उनके लिए यह एक खर्चीला बोझ है. लेकिन छह राज्यों में यह ड्रामा चलता रहेगा, क्योंकि राजनेताओं को दांव चलने का मौका मिलता है, जबकि इसका खर्च आप जैसे करदाताओं को उठाना पड़ता है. अगर देश के 22 राज्य इसके बिना काम चला सकते हैं, तो बाकी छह राज्य भी ऐसा कर सकते हैं. क्या वे ऐसा करेंगे?

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement