जब दो पड़ोसी एक ही दीवार साझा करते हों, तो उनके बीच का रिश्ता समय के साथ नया रूप लेता है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन में हिस्सा लेने नई दिल्ली आ रहे हैं. यह दौरा बेहद खास है, क्योंकि गलवान घाटी के संघर्ष के सात साल बाद शी जिनपिंग पहली बार भारतीय सरज़मीं पर कदम रख रहे हैं. इससे पहले, पिछले साल सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन की यात्रा की थी, जब वे तियानजिन में आयोजित एससीओ (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे.
आज की तारीख में सबसे बड़ी हकीकत यह है कि भारत-चीन संबंधों के पुराने नियम पूरी तरह बदल चुके हैं. अब यह रिश्ता केवल स्वीट कूटनीतिक बातों पर नहीं, बल्कि कठोर जमीनी वास्तविकताओं पर टिका है. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के चश्मे को उतारकर अगर इसे एक आम मोहल्ले की भाषा में समझें, तो यह दो ऐसे पड़ोसियों की कहानी है जिनके बीच अब पुरानी सहूलियत खत्म हो चुकी है और एक नया 'रियलिज्म' (यथार्थवाद) आ गया है. ऐसे में कल जब मोदी और शी जिनपिंग द्विपक्षीय वार्ता के लिए आमने-सामने बैठेंगे, और प्रैक्टिकल जरूरतों पर बात हो रही होगी, तब बहुत से कड़वे यथार्थ मेज के नीचे रेंग रहे होंगे.
दो पड़ोसियों का नया मिजाज
पहले भारत का स्वभाव उस सीधे और शांतिप्रिय पड़ोसी की तरह था जो मानता था कि सिर्फ बातचीत से हर मसले का हल निकल सकता है. भारत शांति की पहल करता था और भरोसे की उम्मीद रखता था. लेकिन अब नियम बदल चुके हैं. भारत अब शांति की बात तो करता है, लेकिन सीमा पर अपनी ताकत और तैयारी में रत्ती भर भी ढील नहीं देता.
दूसरी तरफ चीन की फितरत अपनी जगह कायम है. चीन को उस महत्वाकांक्षी पड़ोसी की तरह देखा जाता है जो हर वक्त अपनी बाड़ आगे खिसकाने की फिराक में रहता है. विदेश नीति विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली कहते हैं, "चीन की विदेश नीति में 'सलामी स्लाइसिंग' (धीरे-धीरे जमीन हड़पना) और 'रणनीतिक झांसा' शामिल रहा है. लेकिन अब भारत का रुख साफ है- चीन की हर चाल का बराबरी से जवाब दिया जाएगा."
जब चीन शांति की आड़ में बढ़त बनाने की कोशिश करता है, तो भारत तुरंत कड़ा रुख अपना लेता है. अब भारत सीधे और दो टूक शब्दों में अपनी शर्तें तय करता है.
भरोसा शून्य, लेकिन मजबूरी भरपूर
भारत और चीन के रिश्ते की सबसे बड़ी पेचीदगी यह है कि दोनों के बीच पुराना भरोसा खत्म हो चुका है, लेकिन आर्थिक जरूरतें अभी भी कायम हैं. गलवान घाटी जैसी घटनाओं के बावजूद, दोनों देशों के बीच व्यापार का आंकड़ा लगातार बना रहा है.
इसे ऐसे समझिए कि दो पड़ोसियों के बीच जमीन का कड़ा मुकदमा चल रहा है, लेकिन मजबूरी में दोनों एक ही दुकान से लेन-देन कर रहे हैं. और एक ही गाड़ी पर बैठकर कोर्ट जा रहे हैं. भारत के स्मार्टफोन, दवाइयों के कच्चे माल (API), इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा उद्योग के लिए चीन का सामान जरूरी है. वहीं चीन के लिए भारत का विशाल बाजार ऐसा खजाना है जिसे वह छोड़ नहीं सकता.
पूर्व राजनयिक और सामरिक विश्लेषक श्याम सरन का मानना है, "अब भारत-चीन रिश्ते का नया नियम 'सशर्त जुड़ाव' है. भारत ने साफ कर दिया है कि सीमा पर शांति के बिना बाकी रिश्तों को सामान्य नहीं माना जा सकता. सहयोग और प्रतिस्पर्धा अब नए संतुलन के साथ चलेंगे."
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल एक पखवाड़ा पहले ही बीजिंग में थे. वे वहां 3488 किमी लंबी भारत-चीन सीमा से जुड़े विवाद के निपटारे के लिए 25वें राउंड की बातचीत में शामिल होने गए थे. यह दुनिया का ऐसा अनूठा सीमा विवाद है, जहां सैनिकों के बीच कई बार झड़प होती है, लेकिन दोनों ओर से गोली नहीं चलती.
मीठी बातें और पीठ में खंजर
भारत के साथ धोखा देने के मामले में चीन और पाकिस्तान दोनों का ट्रैक रिकॉर्ड खराब रहा है. इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, चीन ने सही मौका देखकर अपनी चाल चलने में परहेज नहीं किया.
लेकिन इसके बावजूद, पाकिस्तान के मुकाबले चीन से बातचीत की गुंजाइश हमेशा ज्यादा रहती है, और नए नियमों के तहत भारत इस बात को अच्छी तरह समझता है.
पाकिस्तान की फितरत है कि वह धोखा देने के लिए कथित 'नॉन-स्टेट एक्टर्स' यानी आतंकी संगठनों और नकाबपोश गुर्गों के पीछे छिपता है. जब कारगिल या मुंबई हमला होता है, तो पाकिस्तान सीधा मुकर जाता है कि "यह हमने नहीं किया, यह तो आजाद लड़ाके हैं." ऐसे गैर-जिम्मेदार पड़ोसी से बात करना बेकार हो जाता है.
चीन की बात अलग है. चीन सीमा पर तनाव पैदा करता है, लेकिन वह किसी आतंकी संगठन की आड़ नहीं लेता. चीन अपनी सेना PLA को खुद आगे भेजता है और सीधे अपनी बात रखता है. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के अनुसार, "चीन की सरकार का अपनी सेना और नीतियों पर पूरा नियंत्रण है. जब आप शी जिनपिंग से बात करते हैं, तो एक अधिकृत सत्ता से बात कर रहे होते हैं. इसीलिए नए दौर में भी चीन के साथ सीधी और सख्त बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रहता है."
ट्रंप कार्ड और जिओ-पॉलिटिकल भूकंप
ग्लोबल पॉलिटिक्स में जब-जब बड़े भूचाल आते हैं, तो रिश्तों के नियम अपने आप बदलने लगते हैं. पिछले कुछ समय में अमेरिका में 'ट्रंप फिनोमेनन' ने दुनिया की राजनीति में एक बड़ा मोड़ ला दिया. ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति, भारी-भरकम टैरिफ लगाने की धमकियों और ग्लोबल ट्रेड रूल्स को दरकिनार करने के रवैये ने दुनिया भर के समीकरण बदल दिए.
जब मोहल्ले में कोई तीसरा बड़ा और दबंग व्यक्ति सब पर एक जैसा दबाव बनाने लगे, तो पुराने प्रतिद्वंद्वी भी पल भर के लिए प्रैक्टिकल रुख अपना लेते हैं.
अमेरिका के व्यापारिक दबाव ने चीन की अर्थव्यवस्था पर असर डाला, तो वहीं भारत को भी अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा करनी थी. इसी परिस्थिति ने भारत और चीन को फिर से एक मेज पर ला खड़ा किया. यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अब पुरानी दुश्मनी या दोस्ती के बजाय 'वक्त की जरूरत' के हिसाब से नियम तय होते हैं.
एक आदर्श मेजबान की आवभगत, लेकिन गलवान का साया
जब शी जिनपिंग दिल्ली में होंगे, तो भारत 'अतिथि देवो भव' वाली परंपरा पूरी निष्ठा से निभाएगा. एक आदर्श मेजबान की तरह भारत उनकी आवभगत, खातिरदारी और कूटनीतिक आदर-सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ेगा. लाल कालीन बिछाया जाएगा और ब्रिक्स के मंच पर सम्मानजनक माहौल रहेगा.
लेकिन इस भव्य आवभगत के बीच रिश्तों की कड़वी सच्चाई छिप नहीं सकती. भारत-चीन संबंधों के नियम बदल गए हैं. शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान गलवान घाटी के संघर्ष का दर्द और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीन की हरकतों और दावों का साया पूरी तरह बरकरार रहेगा.