मुझे कांस्पिरेसी थ्योरी बहुत पसंद हैं. हर बात पर शक कीजिए. लेकिन यह भी जानिए कि कब रुकना है. खासकर तब, जब सच आपके सामने हो और आप उन कड़ियों को जोड़ने में लगे हों जो आपस में जुड़ ही नहीं सकते. मोसाद बहुत ताकतवर और बेहद शातिर है. लेकिन हमारे पास डेटा हैं, वीडियो और वॉइस रिकॉर्डर हैं, फ्लाईदुबई का क्रू है, कॉकपिट के दोनों पायलट (एक हीरो और एक विलेन) हैं, वे दो अन्य पायलट हैं जो प्लेन को ताबुक ले गए, गवाह के रूप में 174 यात्री हैं, और एटीसी का बहुत सारा डेटा है. एक बड़ी तबाही से बचने के लिए यहूदियों या इजरायल को कसूरवार ठहराना ठीक वैसा ही है जैसे कॉकपिट में एक सिरफिरे ओमानी पायलट की जानलेवा और फिदायीन हरकत के लिए दुनिया के सारे ओमानियों या मुसलमानों को कसूरवार ठहराना.
वैसे मैं आपकी फॉल्स-फ्लैग थ्योरी की दाद देता हूं, क्योंकि इसमें दिमाग की जो कसरत लगती है और तर्क को जिस तरह दरकिनार करना पड़ता है, वह कमाल है. सबसे कहानी को सुनकर तो ऐसा लगता है जैसे यह जासूसी इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे बेवकूफाना करतूत हो.
24 घंटे तक इन कांस्पिरेसी थ्योरीज़ पर नजर रखने के बाद मुझे पूरी कहानी समझ आ गई है. प्लॉट शुरू होता है ओमान से. जिसके इजरायल के साथ कोई राजनयिक रिश्ते नहीं हैं. यहां के एक फर्स्ट ऑफिसर को मोसाद चुपके से अपने साथ मिलाता है. फिर उसे यूएई की एक एयरलाइन में नौकरी दिलवाता है जो सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र से होकर गुजरती है. मोसाद उस पायलट से हवा में चाकूबाजी करवाता है. इसके बाद वह विमान में रिजर्व बैठे पायलटों को यात्रियों की तरह केबिन में पहुंचा देता है. सऊदी अरब से कहता है कि ताबुक का रनवे खाली रखे, और प्लेन को क्रैश कराना ही भूल जाता है. भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मछार ने अपनी बची-कुची ताकत लगाकर कॉकपिट का दरवाजा खोला ताकि यात्री हमलावर को दबोच सकें. अगर यह सब पहले से तयशुदा ड्रामा था, तो वहां फैला खून पक्का एयरलाइन के खाने का टोमैटो सॉस रहा होगा.
इस थ्योरी के हिसाब से मोसाद को इतना सर्वशक्तिमान होना पड़ेगा कि वह तीन देशों के ऊपर विमान अपहरण का नाटक रच सके, और साथ ही इतना भावुक भी होना पड़ेगा कि वह काम को अंजाम तक न पहुंचा पाए. इस तरह के झूठे ड्रामे का मकसद लाशों का ढेर लगाना होता है. लेकिन इसमें तो प्लेन की सऊदी अरब में लैंडिंग हो गई, जहां डॉक्टर घायलों का इलाज करने और उस सिरफिरे पायलट को गिरफ्तार करने के लिए तैयार खड़े थे.
विमान से पहला इमरजेंसी सिग्नल मिलने के लगभग एक घंटे बाद ही पहली फॉल्स-फ्लैग पोस्ट इंटरनेट पर आ गई. तब किसी को नहीं पता था कि किसने किसको चाकू मारा है, या किसी रूसी पायलट की किसी यूक्रेनी पायलट से झड़प हुई है. लेकिन कहानी पहले से ही तैयार थी. शाम तक एक्स (ट्विटर) पर करीब 3,000 पोस्ट तैरने लगीं जिनमें इजरायल, मोसाद, नेतन्याहू, ज़ायनिस्ट या यहूदियों को कसूरवार ठहराया जा रहा था. यह कोई सोच-समझकर बनाई गई कहानी नहीं थी, बस एक आदत थी.
अमेरिकी एक्टिविस्ट जैक्सन हिंकल ने पूरी घटना की टाइमलाइन पोस्ट की: नेतन्याहू की चुनावी परेशानी, आपराधिक मामले, यूएई की यात्रा, एक आतंकी चेतावनी और फिर FZ1073 (FZ1073). ये सभी ऐसे सच हैं जिनसे इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन जब इन्हें एक साथ जोड़कर कहानी बनाई गई तो उस पर यकीन करना नामुमकिन था, फिर भी 20 लाख लोगों के देखने के साथ यह ट्रेंड करने लगा. इसके बाद किम इवर्सन ने एक वीडियो डाला जिसका कुल मिलाकर तर्क था "मुझे तो यह बात हजम नहीं हो रही", और जब मैंने इसे आखिरी बार देखा तो इसे 1 लाख से ज्यादा लोग देख चुके थे. ईरान की फार्स न्यूज ने सुरक्षा अधिकारियों का हवाला देते हुए इस फ्लाइट का जिक्र उस दावे के साथ किया कि इजरायल किसी विमान या हवाई अड्डे पर हमले की योजना बना रहा था ताकि इसका ठीकरा तेहरान के सिर फोड़ा जा सके. शफाक न्यूज ने भी इस दावे को और हवा दी.
मेरी पसंदीदा तो यह "बस सवाल पूछने वाली" टोली है. इजरायली नागरिक उस फ्लाइट में क्यों सवार थे? क्योंकि वह फ्लाइट तेल अवीव ही जा रही थी. इजरायल ने अपने फाइटर जेट्स क्यों भेजे? क्योंकि एक प्लेन हाईजैक का सिग्नल दे रहा था और उसकी तरफ ही आ रहा था. ताबुक में ही लैंडिंग क्यों? क्योंकि प्लेन का रडर खराब हो गया था और इमरजेंसी में वही सबसे नजदीकी एयरपोर्ट था. सवाल पूछना बहुत अच्छी बात है. लेकिन जो सवाल अपने साथ जवाब चिपका कर लाता है, वह सवाल नहीं बल्कि सवाल के नकाब में छुपा हुआ फैसला होता है.
भारतीय भी इसमें कूद पड़े. नाम में तिरंगा लगाए @tekzilver ने इवर्सन की बात को आगे बढ़ाते हुए लिखा: फ्लाईदुबई वाली घटना नेतन्याहू की कुर्सी बचाने के लिए रचा गया एक ड्रामा था. एक और यूजर श्रीनिवास, जो खुद को देशभक्त दिखा रहे थे, उन्होंने तो और साफ कह दिया कि मुझे पूरा यकीन है कि जल्द ही यह ऐलान होगा कि दूसरा पायलट इजरायली था और यह सब रचा हुआ ड्रामा था. "हो सकता है" नहीं, बल्कि "जल्द ही ऐसा होगा". बेंगलुरु के वैमोस ने एजेंसी को छोड़ सीधे सेट डिजाइनिंग पर उंगली उठाई. उसने लिखा कि केबिन की तस्वीरें देखकर नहीं लगता कि प्लेन तेजी से नीचे आया है. कोई ऑक्सीजन मास्क नहीं गिरे, केबिन नॉर्मल है, फर्श पर कोई कचरा नहीं है. हैशटैग: स्टेज्ड (रचा हुआ ड्रामा). अरे भाई, बोइंग 737 में ऑक्सीजन मास्क तब गिरते हैं जब केबिन के अंदर हवा का दबाव कम होता है, न कि तब जब हवा का दबाव सही हो और प्लेन तेजी से नीचे आ रहा हो.
इसी से जुड़ी एक और कहानी अहमद नाम के यूजर ने बनाई जिसमें भारत को भी इसका पार्टनर बना दिया गया: यह मोसाद और रॉ (RAW) का मिला-जुला काम था, और सबूत के तौर पर भारतीय पायलट की लिंक्डइन प्रोफाइल ढूंढ निकाली गई. जो हीरो था उसे ही हैंडलर बना दिया गया. जिस इंसान ने कई बार चाकू के वार सहे, दरवाजा खोला और प्लेन तथा यात्रियों की जान बचाई, उस पर फैसला यह सुनाया गया कि वह भाड़े का एक्टर था.
इसके बाद एक दूसरी किस्म के लोग आते हैं जो ध्यान भटकाने में उस्ताद हैं. उनका ट्वीट कुछ ऐसा होता है: यह फॉल्स-फ्लैग हो या न हो, बॉलीवुड के पास अब इस्लामोफोबिया फैलाने के लिए एकदम सही कहानी मिल गई है. या फिर: इससे पहले कि कोई इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए करे, आइए गाजा पर बात करते हैं. या फिर सदाबहार बात: हर चीज नफरत नहीं होती, लेकिन यह तो पक्का वही है. और अब एक नया मोड़: भारतीय नेतन्याहू को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वह गाजा में तबाही मचा रहे हैं. तरीका हमेशा एक जैसा रहता है. ध्यान भटकाने वाली बात कभी-कभी आरोप से भी पहले आ जाती है, जैसे कोई महिला उस गुनाह के लिए पहले ही माफी मांगने लगे जो किसी ने बोला भी न हो. गाजा का सच अपनी जगह है. और कॉकपिट में खून से लथपथ कैप्टन का सच अपनी जगह. आप एक ही समय में दो बातों को अपने दिमाग में रख सकते हैं. इसे ही दिमाग होना कहते हैं.
अगर कॉकपिट में एक आदमी की करतूत की वजह से आप सभी मुसलमानों या सभी ओमानियों पर शक करने लगते हैं, तो आप एक घटिया इंसान हैं. और जो लोग इन झूठी कहानियों का ढिंढोरा पीटते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसा क्यों है. यही बात दूसरी तरफ भी लागू होती है. अगर एक आदमी की हरकत की वजह से आप जिंदा बच जाने के लिए यहूदियों को ही कसूरवार ठहराते हैं, तो आप भी ठीक वही हैं जिसका आरोप आप दूसरों पर लगाते हैं, बस आपका झंडा और रूमाल अलग है. यहूदियों को इसलिए कसूरवार ठहराना क्योंकि वे जिंदा बच गए, ठीक वैसी ही घटिया सोच है जैसी किसी एक के हमला करने पर पूरे मुस्लिम समुदाय को कसूरवार ठहराना.
हर हाल में शक कीजिए. चल रही जांच पर शक कीजिए, और उस मकसद पर शक कीजिए जो अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है. उन नेताओं पर शक कीजिए जो इस हादसे से अपना फायदा निकालने की कोशिश करेंगे. यह सही मायने में शक करना है. लेकिन जिस शक का कोई अंत ही न हो, भले ही सामने सारे सबूत क्यों न आ जाएं, और जो हमेशा एक खास समुदाय के खिलाफ ही एक नतीजे पर पहुंचे, वह शक नहीं है. वह अंधविश्वास है. पूरी तरह से अंधा.