दो राज्यों में वोट अभी डाले जाने हैं. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल. दो राज्यों असम और केरलम में वोटिंग हो चुकी है - एक केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के लोग भी वोट देकर फैसला सुना चुके हैं कि अगले पांच साल तक सत्ता की कमान किसके हाथ में होगी.
मुख्य रूप से चार मुख्यमंत्री एक जैसी लड़ाई अलग अलग हालात में लड़ रहे हैं. बहुत सारी चीजें बिल्कुल अलग हैं, लेकिन एक चीज कॉमन - ममता बनर्जी, हिमंता बिस्वा सरमा, पिनाराई विजयन और एमके स्टालिन - सब के सब सत्ता में वापसी के लिए जूझ रहे हैं.
सत्ता विरोधी लहर भी सभी के खिलाफ है. किसी के खिलाफ कम, किसी के खिलाफ थोड़ा ज्यादा. पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा और एमके स्टालिन सत्ता की दूसरी पारी के लिए कोशिश कर रहे हैं. दूसरी पारी तो पिनाराई विजयन 2021 में ही हासिल कर चुके थे, इस बार हैट्रिक की लड़ाई है. हैट्रिक तो ममता बनर्जी ने 2021 में ही पूरा कर लिया था - अब तो चौथी बार सत्ता पर काबिज होने का संघर्ष चल रहा है.
ममता बनर्जी
ममता बनर्जी के लिए पश्चिम बंगाल की लड़ाई इस बार सबसे मुश्किल साबित हो रही है. सिर्फ इसलिए नहीं कि 15 साल मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बनर्जी नई पारी के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं, इसलिए भी क्योंकि चौथी पारी के सामने चुनौतियां भी चौतरफा हैं.
मुश्किल तो ममता बनर्जी के लिए 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भी था, और जिस नंदीग्राम के आंदोलन ने ममता बनर्जी की छवि निखार दी थी, उसी चुनावी मैदान में ममता बनर्जी को अपने ही सहयोगी के हाथों हार का मुंह भी देखना पड़ा था. शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव से पहले टीएमसी छोड़ दी थी, और बीजेपी के टिकट पर ममता बनर्जी को अपने खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए चैलेंज किया. ममता बनर्जी ने चैलेंज स्वीकार किया, और महज 1956 वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं.
अपने पूर्ववर्ती बुद्धदेब भट्टाचार्य की बराबरी तो ममता बनर्जी कर ही चुकी हैं, अगर ममता बनर्जी आने वाला चुनाव जीत लेती हैं, तो बंगाल में लंबे लेफ्ट शासन वाले ज्योति बसु से बराबरी की रेस में लग जाएंगी. ज्योति बसु ने पांचवें कार्यकाल के आखिर में सत्ता छोड़ी थी. और, बुद्धदेब भट्टाचार्य को तो ममता बनर्जी ने चौथी बार सत्ता में आने से ही रोक दिया था.
तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल चुनाव को ममता बनर्जी बनाम चुनाव आयोग के रूप में प्रोजेक्ट किया है. कुछ कुछ वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते चुनावों के दौरान मोदी बनाम सीबीआई की लड़ाई बताया करते थे. तब केंद्र में यूपीए की सरकार हुआ करती थी.
चुनाव आयोग के SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर केस की पैरवी तक कर चुकी हैं. फिर भी, 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं. चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल की करीब एक तिहाई प्रशासनिक व्यवस्था को चुनाव से पहले ही बदल चुका है.
कांग्रेस को तो बंगाल से खत्म ही कर दिया है, बीते पांच चुनावों (विधानसभा और लोकसभा) में बीजेपी को भी एक निश्चित दायरे से कभी आगे नहीं बढ़ने दिया है. यह चुनाव ममता बनर्जी के लिए करो या मरो जैसी लड़ाई है. चुनावी हार उनकी राजनीति को काफी हद तक कमजोर कर सकती है, लेकिन एक और जीत ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की ताकतवर नेता बना सकती है.
फिर तो ममता बनर्जी कांग्रेस के लिए भी नई चुनौती बन जाएंगी - INDIA ब्लॉक के नेतृत्व के लिए तृणमूल कांग्रेस नेता की दावेदारी रोक पाना बहुत मुश्किल होगा.
ममता बनर्जी के सामने 23 अप्रैल के मतदान से पहले बीजेपी की तरफ से एक और चुनौती पेश की जाने वाली है, महिला आरक्षण संशोधन और परीसीमन बिल. पश्चिम बंगाल में M-फैक्टर को अपने पक्ष में कायम रख पाना ममता बनर्जी के लिए पहले की तरह आसान नहीं होगा.
हिमंता बिस्वा सरमा
हिमंता बिस्वा सरमा की लड़ाई ममता बनर्जी से बिल्कुल अलग है. जैसे तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का प्रतिनिधित्व करती है, असम में हिमंता बिस्वा सरमा बीजेपी का प्रतिनिधित्व करते हैं. बेशक बीजेपी असम चुनाव हिमंता बिस्वा सरमा के चेहरे पर लड़ रही है, लेकिन ममता बनर्जी की तरह असम में सब कुछ हिमंता बिस्वा सरमा का ही नहीं है, सब कुछ बीजेपी के साथ साझेदारी में है. ममता बनर्जी की ही तरह एमके स्टालिन का भी मामला है. पिनाराई विजयन, डीएमके और टीएमसी की तरह नहीं बल्कि हिमंता बिस्वा सरमा की तरह अपनी पार्टी के एक नेता हैं.
असम का मुख्यमंत्री होने के साथ साथ हिमंता बिस्वा सरमा बीजेपी के लिए पूरे नॉर्थ ईस्ट का मोर्चा संभालते हैं. और, बीजेपी भी हिमंता बिस्वा सरमा खुलकर खेलने की पूरी आजादी देती है. अगर यूपी में योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस को छोड़ दें, तो बीजेपी के बाकी किसी मुख्यमंत्री की हैसियत हिमंता बिस्वा सरमा जैसी तो बिल्कुल नहीं है - और जिस तरह से नॉर्थ ईस्ट में बीजेपी का विस्तार किया है, हिमंता बिस्वा सरमा पर आरएसएस की भी खास नजर और दिलचस्पी रहती है.
हिमंता बिस्वा सरमा ने ब्रांड बीजेपी को असम में अपने तरीके से लागू किया है. घुसपैठियों के मुद्दे पर हिमंता बिस्वा सरमा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से आगे बढ़कर असम के मुख्यमंत्री कहते हैं कि उनके राज्य की समस्या बिल्कुल अलग है. हिमंता बिस्वा सरमा बताते हैं कि उनको मुसलमानों से कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत सिर्फ 'मियां' यानी बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों से है.
कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने भी पूरी ताकत झोंकी है, लेकिन पार्टी की अंदरूनी कलह, चुनावों से ठीक पहले नेताओं का पार्टी छोड़कर चले जाना और संगठन की कमजोरी उनके लिए कदम कदम पर चुनौती साबित हुई है. 9 अप्रैल को हुई वोटिंग से पहले कांग्रेस ने गौरव गोगोई की तरफ से हिमंता बिस्वा सरमा पर बड़ा हमला बोला था. जैसे गौरव गोगोई की पत्नी के पाकिस्तान कनेक्शन होने का दावा करते हुए हिमंता बिस्वा सरमा घेरते आ रहे थे, कांग्रेस ने हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी के पास तीन पासपोर्ट होने का दावा किया - और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के पीछे असम पुलिस पड़ गई.
देखा जाए तो राजनीति के बाकी मौजूदा प्रतियोगियों के मुकाबले हिमंता बिस्वा सरमा की लड़ाई थोड़ी आसान लग रही है.
पिनाराई विजयन
पिनाराई विजयन के लिए चुनाव निजी तौर पर जितना अहम है, उनकी पार्टी सीपीएम के लिए कहीं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है. ये तो पिनाराई विजयन ही हैं, जिन्होंने एक छोर पर न लेफ्ट का किला बचा रखा है. यह किला तो पांच साल पहले ही ढह गया होता, अगर पिनाराई विजयन ने परंपरा को तोड़ते हुए सत्ता में वापसी नहीं की होती.
पिनाराई विजयन के सामने चुनौती तो बीजेपी भी है, लेकिन कांग्रेस कहीं बड़ी चुनौती बन रही है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी का खाता जरूर खुला है, लेकिन कांग्रेस तो उम्दा प्रदर्शन करती रही है. राहुल गांधी का भी पूरा जोर केरलम पर ही रहा है.
2021 में पिनाराई विजयन की सत्ता में वापसी अगर परंपरा के लिए अपवाद बनी थी, तो संभावित हैट्रिक तो चमत्कार ही मानी जाएगी. वैसे कुछ सर्वे रिपोर्ट की मानें तो चुनाव मैदान में खड़े देश के चार मुख्यमंत्रियों में सत्ता में वापसी पर संदेह सिर्फ पिनाराई विजयन के मामले में ही जताया गया है.
पिनाराई विजयन राजनीति के साथ देश में ही कूटनीति का सहारा भी लेते हैं, जिसके लिए उनकी आलोचना भी होती है. क्योंकि, पिनाराई विजयन की राजनीति में कई बार कट्टर आइडियोलॉजी पीछे छूटती भी नजर आती है. केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के साथ जरूरत के हिसाब से व्यवहार करते हैं.
सामने से तो पिनाराई विजयन सत्ता पक्ष से बराबर दूरी बनकर चलते दिखाई देते हैं, लेकिन ऐसे भी मौके देखे गए हैं जब वो वाया बायपास सत्ता पक्ष का साथ भी दे देते हैं. जैसे राज्यसभा के उपचुनाव में एक बार देखने को मिला था. राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव जब हरिवंश लड़ रहे थे, तो नीतीश कुमार से दोस्ती के कारण पिनाराई विजयन ने सपोर्ट किया था.
कुछ समय से जरूर पिनाराई विजयन विपक्ष के मुख्यमंत्रियों के साथ देखे जाने लगे थे, लेकिन उससे पहले तो वो पूरी तरह दूरी बनाए हुए दिखाने की कोशिश करते थे - और, विपक्षी खेमे का साथ न देकर एक तरीके से पिनाराई विजयन केंद्र के सत्ता पक्ष के साथ मान लिए जाते थे.
80+ पिनाराई विजयन के हिसाब से देखें तो बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ हैय. पिनाराई विजयन से ज्यादा तो लेफ्ट का सब कुछ दांव पर लगा हुआ है. हार गए तो लेफ्ट का क्या हाल होगा - क्या बीजेपी नेतृत्व बीएसपी की तरह लेफ्ट की भी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करेगा?
एमके स्टालिन
तमिलनाडु में परंपरा केरलम जैसी ही रही है, लेकिन वो दौर बीत चुका है. मैदान में न डीएमके नेता करुणानिधि हैं, न ही AIADMK का चेहरा जयललिता ही हैं. जयललिता ने तो 2026 में वापसी करके परंपरा भी तोड़ डाली थी. उस लिहाज से देखें तो मुकाबला बराबरी का नहीं लगता.
डीएमके के एमके स्टालिन को चैलेंज करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी को बीजेपी की मदद लेनी पड़ रही है. मुकाबले के लिए गठबंधन तो स्टालिन ने भी कर रखा है. और, स्टालिन ने जितनी सीटें कांग्रेस को दी हैं, पलानीस्वामी ने भी बीजेपी को करीब उतनी ही सीटें दी हैं - लेकिन खेल बिगाड़ने के लिए टीवीके बनाकर थलपति विजय भी मैदान में कूद पड़े हैं.
विजय को लेकर एक बात तो पक्के तौर पर मानी जा रही है कि नौजवानों और महिलाओं के बीच लोकप्रिय विजय डीएमके को काफी नुकसान पहुंचाने वाले हैं - लेकिन डैमेज का लेवल अगर 15 फीसदी (वोट शेयर) से ऊपर पहुंच जाता है तो त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति भी पैदा हो सकती है - और वैसी सूरत में विजय तमिलनाडु की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं.
देखा जाए तो स्टालिन के लिए पलानीस्वामी और बीजेपी गठबंधन से कहीं बड़ी चुनौती अभिनेता से नेता बने थलपति विजय साबित हो सकते हैं.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चार राज्यों के चुनाव नतीजे विपक्ष की भी दशा और दिशा तय करेंगे - साथ ही, बीजेपी और ताकतवर होकर उभरती है या केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के लिए चुनौतियां और ज्यादा बढ़ने वाली हैं, 4 मई को देश की नई राजनीतिक तस्वीर देखने को मिलने वाली है.