हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज पर एक गंभीर बहस छेड़ दी. रिपोर्ट में दावा किया गया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान देश भर में ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए, और इसी अवधि में आयोग के दो सदस्यों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. ये आपत्तियां ECINet सॉफ्टवेयर के कथित सेंट्रलाइजेशन, फॉर्म 6 में बदलाव, पश्चिम बंगाल में अपीलों और प्रशासनिक आदेशों जैसे मुद्दों पर थीं. रिपोर्ट का मूल मैसेज यह था कि बहुमत वाले दो आयुक्त कई फैसलों से अनजान रखे गए, जिससे संस्था की प्रकृति और वैधानिक अधिकारों पर सवाल उठे.
इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा प्रहार किया. वह भी ऐसे वक्त में जब पिछले कुछ अरसे से विपक्ष लगातार उन्हें ‘वोट चोरी’ का आरोप बता रहा है. इस रिपोर्ट के छपने के बाद सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर आरोपों की बौछार हो गई. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और गिरफ्तारी तक की मांग हुई. उनके कार्यकाल में हुए चुनावों को रद्द कर दोबारा चुनाव कराने की भी आवाजें उठीं. राहुल गांधी ने तो बकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके कहा कि वे ज्ञानेश कुमार ही नहीं, लोकतंत्र के साथ धोखा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की भी जांच कराएंगे. बेहतर हो कि वे ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बन जाएं.
लेकिन चुनाव आयोग की सफाई के बाद खुलासे से उठी आग पर धीरे-धीरे पानी पड़ता चला गया. प्रेस नोट और अतिरिक्त स्पष्टीकरण में आयोग ने कई दावों को सीधे नकारा या उन्हें सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बता दिया. नतीजा यह हुआ कि एक संभावित संस्थागत बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनकर रह गई. यह कहानी बताती है कि कैसे एक गंभीर खुलासा, राजनीतिक स्वार्थों के खेल में फंसकर, महज एक खिलवाड़ बन जाता है.
चुनाव आयोग की सफाई के बाद जो बातें धराशायी हुईं
चुनाव आयुक्तों के ऐतराज पर चुनाव आयोग ने सबसे पहले यह साफ किया कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है. लिखित नोट्स, सुझाव, तकनीकी राय और आंतरिक मतभेद उसकी सामान्य कार्यशैली का हिस्सा हैं. 'भिन्न मत और अवलोकन किसी भी संस्था में विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं' और 'अंतिम निर्णय पूरे आयोग की सर्वसम्मत या बहुमत से लिए गए.' आयोग ने इनकार नहीं किया कि आयुक्तों के बीच मतभेद रहे. बल्कि उसने इन्हें 'सुझाव' और 'प्रक्रिया सुधार के प्रयास' करार दिया. यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है. और यह चुनाव आयोग की आंतरित अच्छी सेहत का भी इशारा करती है.
चिंता तब होती, यदि खुलासा ये कहता कि तीन चुनाव आयुक्तों ने पांच मिनट बैठक की, चाय-बिस्किट खाया, और पांच अहम फैसलों को बिना डिस्कशन के पास कर दिया.
ECINet को लेकर आरोप था कि मतदाता सूची का नियंत्रण दिल्ली के IT डिवीजन के पास सेंट्रलाइज्ड हो गया और स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) की पहुंच सीमित हो गई. आयोग ने जवाब दिया कि डेटाबेस विकेंद्रीकृत ही है, EROs को इस पर पूरा एक्सेस है. ECINET महज एक सर्विस प्लेटफॉर्म है. जिस पर ERO किसी मतदाता का नाम जोड़ने या डिलीट करने की प्रक्रिया को प्रोसेस करते हैं.
फॉर्म 6 को लेकर दावा था कि उसमें माता-पिता/दादा-दादी की जानकारी अनिवार्य कर दी गई, जो कानूनी संशोधन के बिना अवैध है. आयोग ने कहा कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं हुआ. अतिरिक्त घोषणा (Annexure D) SIR निर्देशों के तहत है, जो ऑफलाइन में अलग और ऑनलाइन में सुविधा के लिए एक साथ भरी जाती है.
हालांकि, इस विषय के फैसले पर यदि दो चुनाव आयुक्तों को ऐतराज था और फिर भी यह फैसला उनकी मर्जी के बिना लिया गया तो उनके पास अधिकार था कि वे इसकी शिकायत राष्ट्रपति से करते. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ.
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला बहुत दिलचस्प निकला. खुलासा ये था कि गोवा के पात्र वोटरों को मतदाता सूची से हटा दिया गया, और स्टेट इलेक्शन कमीशन के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद चुनाव आयोग ने इस पर कोई सुनवाई नहीं की. जबकि, चुनाव आयोग ने इस बारे में स्पष्ट किया कि किसी वोटर का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए ECINET पर ERO को फॉर्म 7 सबमिट करना होता है. यदि इस फॉर्म 7 पर एक बार क्लिक कर दिया तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता. ताकि, नाम जोड़ने और डिलीट करने की प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो. फॉर्म 7 पर क्लिक करने के साथ वोटर का नाम डिलीट ही हो जाता है. गोवा में ERO ने गलती से 97 वोटरों के मामले में ऐसा किया, और फिर इस बारे में प्रक्रिया का पता चलने पर उन वोटरों से अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरने के लिए कहा गया.
चुनाव आयोग ने व्यापक रूप से कहा कि सभी फैसले वैधानिक प्रक्रियाओं और सर्वसम्मति के तहत हुए. इन स्पष्टीकरणों ने रिपोर्ट के कुछ सबसे तीखे दावों, जैसे 'बहुमत को अंधेरे में रखना' या 'अवैध बदलाव' की धार को काफी हद तक कुंद कर दिया. रिपोर्ट में उठाए गए सवाल बाकी रह गए, लेकिन वे अब 'आंतरिक नोट्स' की श्रेणी में चले गए, जिन्हें आयोग ने सामान्य विमर्श बता दिया.
मतभेद : एक स्वस्थ संस्था की निशानी
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव आयोग ने मतभेदों से इनकार नहीं किया. यह एक स्वस्थ संस्था की निशानी है. किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में, खासकर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में, आंतरिक बहस और लिखित आपत्तियां कमजोरी नहीं बल्कि मजबूती का संकेत हैं. अगर तीन सदस्यीय निकाय में दो सदस्य बार-बार सवाल उठा रहे हैं, तो यह दिखाता है कि संस्था पूरी तरह से एक व्यक्ति या एक विचारधारा के अधीन नहीं है.
यह तथ्य विपक्ष के पुराने आरोपों से टकराता है. विपक्ष लंबे समय से आरोप लगा रहा था कि मोदी सरकार ने चुनाव आयोग में अपनी पसंद के आयुक्त बिठा दिए हैं, जो भाजपा के पक्ष में फैसले लेते हैं. 'कब्जाई गई संस्था' का यह नैरेटिव SIR के दौरान और तेज हुआ, जब बड़े पैमाने पर नाम हटने के आंकड़े सामने आए. लेकिन अब आयोग खुद मान रहा है कि आयुक्तों के बीच ऐतराज था. अगर आयुक्त सचमुच सरकार के 'फेवरेट' होते, तो क्या वे लिखित रूप में 14 बार आपत्ति दर्ज करते? क्या वे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखते? क्या वे प्रशासनिक आदेश को रद्द करते?
विपक्ष ने फिर भी CEC के इस्तीफे की मांग की और इसे 'ज्ञानेशगेट' करार दिया. सत्ता पक्ष ने रिपोर्ट को 'नैरेटिव' बताकर खारिज किया. नतीजा यह हुआ कि संस्थागत सवाल पीछे छूट गए कि क्या सॉफ्टवेयर वाकई ERO की शक्तियों को सीमित कर रहा है? क्या अतिरिक्त घोषणा कानूनी रूप से सही है?
अनसुलझा सवाल: राष्ट्रपति को शिकायत क्यों नहीं?
रिपोर्ट और सफाई के बाद एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गया. अगर दो आयुक्त किसी फैसले के खिलाफ थे, और फिर भी वह फैसला लिया गया, तो उन्होंने राष्ट्रपति से शिकायत क्यों नहीं की? पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत का स्पष्ट कहना है कि ऐसे मामलों में चुनाव आयुक्तों के पास राष्ट्रपति को शिकायत करने का अधिकार मौजूद है. चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स (अपॉइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट, 2023 के तहत आयुक्तों को कुछ सुरक्षाएं मिली हैं, और गंभीर असहमति की स्थिति में संवैधानिक उपाय उपलब्ध हैं.
अगर संधू और जोशी सचमुच मानते थे कि फैसले उनके ज्ञान के बिना या कानूनी सीमाओं के बाहर लिए जा रहे हैं, तो लिखित नोट्स के अलावा राष्ट्रपति के पास औपचारिक शिकायत एक मजबूत कदम होता. ऐसा न करना दो बातें दर्शा सकता है. एक, कि मतभेद इतने गंभीर नहीं थे कि संस्थागत टकराव की नौबत आ जाए. दो, कि आयुक्त खुद प्रक्रिया के अंदर रहकर सुधार चाहते थे, न कि बाहरी हस्तक्षेप. दोनों ही स्थितियां रिपोर्ट के 'अभूतपूर्व गिरावट' वाले दावे को कमजोर करती हैं. अगर असहमति इतनी गहरी थी कि कैबिनेट सचिव तक पत्र लिखे गए, तो राष्ट्रपति तक न जाना सवाल खड़ा करता है.
यह खामोशी खुलासे को और कमजोर करती है. मीडिया रिपोर्ट में दस्तावेजी सबूत और आंतरिक नोट्स का जिक्र है, लेकिन आयुक्तों द्वारा उपलब्ध संवैधानिक उपाय का इस्तेमाल न करने का कोई स्पष्टीकरण नहीं मिलता. इससे लगता है कि असहमति प्रक्रिया का हिस्सा थी, न कि संस्था के बिखराव का संकेत.
लोकतंत्र में मीडिया इनवेस्टिगेशन जरूरी है. संस्था की सफाई भी जरूरी है. लेकिन जब दोनों मिलकर सिर्फ राजनीतिक पॉइंट-स्कोरिंग का औजार बन जाएं, तो असल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, जैसे- मतदाता सूची की शुद्धता और संस्था की विश्वसनीयता. चुनाव आयोग जैसी संस्था को राजनीति के खेल से ऊपर रखना होगा. उसे उन सवालों का जवाब देने के लिए सामने आना होगा, जो इस खुलासे से अधूरे छूट गए. वरना हर खुलासा, चाहे कितना भी गंभीर हो, अंततः एक खिलवाड़ बनकर रह जाएगा.