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'छात्रों की गूंज' खुद कांग्रेस ने अनसुनी की, NSUI और कन्हैया का क्या दोष?

DUSU चुनाव 2026 में NSUI की करारी हार का ठीकरा भले ही कन्हैया कुमार पर फोड़ा जा रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस स्टूडेंट विंग ने सिर्फ कांग्रेस के पिछले 12 सालों के चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड को दोहराया है. जंतर-मंतर पर Gen-Z आंदोलन और सत्य निकेतन हॉस्टल हादसे जैसे बड़े मुद्दों के बावजूद, आपसी गुटबाजी और उदासीन संगठन के चलते कांग्रेस एक बनी-बनाई बाजी फिर से हार गई.

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एक तरफ राहुल गांधी देशभर में छात्रों का समर्थन जुटा रहे हैं, लेकिन दिल्ली में ही उनकी पार्टी DUSU चुनाव में नकार दी जा रही है. (फोटो- PTI)
एक तरफ राहुल गांधी देशभर में छात्रों का समर्थन जुटा रहे हैं, लेकिन दिल्ली में ही उनकी पार्टी DUSU चुनाव में नकार दी जा रही है. (फोटो- PTI)

दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस की सड़कों पर लगा चुनावी शोर-शराबा अब थम चुका है, लेकिन कोटला रोड वाले कांग्रेस हेडक्वार्टर के कमरों में जो सन्नाटा छाया है, उसकी गूंज काफी दूर तक जा रही है. DUSU यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के चुनाव नतीजे आ चुके हैं और कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI का पूरी तरह ‘सूपड़ा साफ’ हो चुका है. अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव की कुर्सी पर ABVP ने अपना झंडा गाड़ दिया, जबकि बची-कुची उपाध्यक्ष वाली सीट पर एक निर्दलीय उम्मीदवार कब्जा जमाकर निकल गया.

DUSU के इतिहास के पन्ने पलटने पर यह बात कोई रहस्य नहीं रह जाती कि NSUI का पुराना स्वर्णिम दबदबा तो बरसों पहले ही हवा हो चुका था. नब्बे के दशक के बाद से ही कैंपस में भगवा रंग का असर गहराने लगा था. 2000 के दशक में कभी-कभार कोई चमत्कार हो जाता, तो अलग बात थी, वरना पिछले एक-डेढ़ दशक से तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र ABVP के नारों पर ही तालियां बजाते आए हैं. पिछले 15 DUSU प्रेसिडेंट चुनावों में से ABVP ने 11 बार जीत हासिल की है. लेकिन 2026 के इस चुनाव को आम कैंपस चुनाव मान लेना भारी भूल होगी. यह चुनाव NSUI से ज्यादा कांग्रेस के लिए अहम था. थाली में सजा-सजाया वो केक था, जिसे उसने खुद अपने हाथों से जमीन पर गिरा दिया.

राजनीतिक पटकथा लिखने वाले भी हैरान हैं कि आखिर कोई पार्टी इतनी मुफीद परिस्थितियां मिलने के बाद भी इतनी शर्मनाक हार कैसे हासिल कर सकती है!

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जरा माहौल की टाइमिंग पर गौर फरमाइए. दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस से बस दो-चार किलोमीटर दूर जंतर-मंतर पर देश का ‘Gen-Z’ यानी आज का युवा जमा था. एक ऐतिहासिक छात्र आंदोलन चल रहा था, जो सीधे केंद्र सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा कर रहा था. सड़कों पर उतरे इस नए दौर के युवाओं का गुस्सा सिर्फ मोदी सरकार ही नहीं, बल्कि बीजेपी और उसकी लाडली छात्र शाखा ABVP के लिए भी एक तगड़ी सिरदर्दी बना हुआ था.

कैंपस के भीतर भी नाराजगी का पारा चढ़ा हुआ था. चुनाव से ठीक पहले साउथ कैंपस के करीब सत्य निकेतन में एक जर्जर बॉयज हॉस्टल भरभराकर गिर गया, जिसमें यूनिवर्सिटी के निर्दोष छात्रों की मौत हुई. यह कोई ऐसी-वैसी घटना नहीं थी कि लीपापोती करके निकला जा सके. दिल्ली हाईकोर्ट के जजों ने भी व्यवस्था को आड़े हाथों लेते हुए तल्ख टिप्पणी कर दी कि छात्रों की इस मौत को कोई ‘सामान्य हादसा’ कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता.

अब जरा खुद सोचिए. एक तरफ सरकार से नाराज जंतर-मंतर पर बैठा Gen-Z, दूसरी तरफ बदहाल इंफ्रास्ट्रक्चर से जलता-सुलगता कैंपस, और उस पर हाईकोर्ट की करारी फटकार. किसी भी विपक्षी पार्टी की स्टूडेंट विंग के लिए तो यह चुनाव जीतने का बना-बनाया गोल्डन टिकट था. लेकिन NSUI ने साबित कर दिया कि जब हारने की जिद ठान ली जाए, तो माहौल कितना भी अनुकूल क्यों न हो, गोल अपने ही नेट में दागा जाएगा.

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ऐसे में अगर कोई सारा ठीकरा NSUI के मासूम कार्यकर्ताओं के सिर फोड़कर मुकर जाना चाहे, तो यह सरासर अन्याय होगा. इस महा-फ्लॉप शो की असली प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और स्क्रिप्ट राइटर तो खुद कांग्रेस पार्टी और उसकी आलाकमान है.

एक तरफ पार्टी के सबसे बड़े स्टार नेता राहुल गांधी देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर ‘छात्रों की गूंज’ नाम के मेगा शो कर रहे हैं. मैदानों, ऑडिटोरियम से लेकर टीवी स्क्रीन तक युवाओं की आवाज बनने का दम भरा जा रहा है. लेकिन जब उसी दिल्ली में, जहां पार्टी मुख्यालय भी है, Gen-Z के वोटों की फसल काटने का वक्त आया, तो कांग्रेस के बड़े सूरमा गायब मिले. DUSU चुनाव के लिए NSUI की पूरी की पूरी कमान पूर्व JNU दिग्गज और वर्तमान इंचार्ज कन्हैया कुमार और उनकी कोर टीम के भरोसे छोड़कर बड़े नेता आराम फरमाते रहे. और नतीजे आने के बाद उन्हीं पर पूरा ठीकरा फोड़ दिया.

यह कोई नई बात नहीं है. देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जिस अद्भुत महारत के साथ अपने बने-बनाए मुद्दों को गंवाती आई है, उसी की एक छोटी सी ‘माइक्रो-बायोपिक’ DUSU चुनाव में भी देखने को मिली. राष्ट्रीय स्तर पर सरकार विरोधी माहौल हो, जनता के पास मुद्दों का अंबर हो, लेकिन कांग्रेस का चुनावी मैनेजमेंट उस पूरे माहौल को वोट में बदलने के बजाय सेल्फ डिस्ट्रक्शन मोड में चला जाता है.

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अगर DUSU चुनाव के बैकस्टेज का ड्रामा देखें, तो समझ आएगा कि हार की पटकथा तो वोटों की गिनती से बहुत पहले, टिकट बांटते वक्त ही लिख दी गई थी.

पार्टी के भीतर गुटबाजी का आलम यह था कि सालों से सड़कों पर पसीना बहा रहे और छात्रों के बीच पैठ रखने वाले दो मजबूत चेहरों दीपांशु शौकीन और विशेश यादव का पत्ता काट दिया गया. वजह? वही पुरानी कांग्रेसी बीमारी- 'पसंद-नापसंद' और किसी बड़े नेता के नजदीकी को सेट करने की मजबूरी. जिताऊ घोड़ों को अस्तबल से बाहर खदेड़ दिया गया और ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया, जिन्हें देखकर कैंपस के छात्र भी पूछ रहे थे कि ‘भाई, तुम किस क्लास के हो?’

नतीजा वही हुआ, जो अक्सर अति-आत्मविश्वास का होता है. दरकिनार किए गए दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय पर्चा भरा और उपाध्यक्ष पद पर 13 हजार से ज्यादा वोटों का ऐतिहासिक गड्ढा खोदकर ABVP और NSUI दोनों को हैरान कर दिया. उधर विशेष यादव ने भी समाजवादी छात्र सभा के सिंबल पर ABVP के पसीने छुड़ा दिए. अगर गणित के हिसाब से NSUI के आधिकारिक उम्मीदवारों और इन दोनों बागियों को मिले वोटों को जोड़ दें, तो साफ दिखता है कि छात्र तो ABVP से पीछा छुड़ाना ही चाहते थे. लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों के ईगो ने यह थाली सजाकर खुद ABVP के सामने परोस दी.

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इलेक्शन मैनेजमेंट और ग्राउंड कनेक्ट का तो पूछिए ही मत. ABVP वाले जहां साल के बारह महीने हॉस्टल की कैंटीनों में चाय पीते हुए, एक-एक छात्र का रोल नंबर नोट करके पोलिंग बूथ तक खींच लाने का 'असाइनमेंट' पूरा करते हैं, वहीं NSUI का चुनाव प्रबंधन आखिरी हफ्ते में दो-चार रील बनाने, पर्चे उड़ाने और फोटो खिंचवाने तक सिमट कर रह जाता है.

उदासीनता का स्तर यह था कि जब पार्टी के पुराने दिग्गजों और पूर्व DUSU अध्यक्षों ने बड़े प्रभारियों को आगाह किया था कि 'गलत टिकट बांट रहे हो, पूरा पैनल डूबेगा', तब भी आलाकमान ने उस चेतावनी को अनसुना कर दिया.

अब जब नतीजे आ चुके हैं और सूपड़ा पूरी तरह साफ हो चुका है, तो अकबर रोड पर बैठकों का दौर जारी है. खबरें आ रही हैं कि राहुल गांधी बेहद खफा हैं और प्रभारियों पर गाज गिरने वाली है. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक-दो बलि के बकरे ढूंढ लेने से वो 'राजनीतिक आलस' दूर हो जाएगा जो पार्टी की रगों में बह रहा है?

DUSU का यह चुनाव एक बात बहुत साफ-साफ कह गया है. राजनीति में सिर्फ माहौल के भरोसे पतंग नहीं उड़ाई जा सकती, उसके लिए डोर थामने और हवा को भांपने का हुनर भी चाहिए. Gen-Z बदलाव तो चाहता है, लेकिन जब उसे विकल्प के नाम पर एक आपस में लड़ता और जमीन से कटा हुआ संगठन दिखता है, तो वह भी कह देता है- 'नो थैंक्स!'

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