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क्या होता है प्रिविलेज मोशन? पीएम मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश कैसे सीमा लांघ गया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन को लेकर कांग्रेस ने लोकसभा स्पीकर को विशेषाधिकार हनन का नोटिस सौंपा है. कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री के भाषण में सांसदों के लोकसभा में मतदान व्यवहार और उनकी नीयत पर सवाल उठाया गया. कांग्रेस का आरोप है कि यह सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन और अवमानना का मामला है.

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कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (Photo: PTI)
कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (Photo: PTI)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस की तरफ से लोकसभा स्पीकर को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया है. कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने स्पीकर ओम बिरला को दिए नोटिस में कहा है, सदन में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक के पास न होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में विपक्षी सदस्यों के मतदान के तरीके पर सीधे टिप्पणी की, और उनके इरादों पर शक जताया. यह सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन और अवमानना का गंभीर मामला है.

केसी वेणुगोपाल ने नोटिस में स्पीकर से आग्रह किया है कि संसद की गरिमा और सदस्यों को दी गई संवैधानिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए तत्काल और निर्णायक कदम उठाया जाना चाहिए, ताकि ऐसे उल्लंघन को न तो नजरअंदाज किया जाए, और न ही दोहराया जाए.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन आमतौर पर देश को जोड़ने और भरोसा बढ़ाने के लिए होता है, लेकिन इस बार खुलकर राजनीतिक बात हुई. जयराम रमेश का कहना है कि कांग्रेस पर 59 बार निशाना साधा गया. 

प्रधानमंत्री मोदी पर क्‍या हैं आरोप

21 अप्रैल के नोटिस का विषय लिखा है, 18 अप्रैल 2026 को राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित भाषण के दौरान संसद सदस्यों पर आक्षेप लगाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस. नोटिस में कहीं भी प्रधानमंत्री का नाम नरेंद्र मोदी नहीं लिखा है, भारत के प्रधानमंत्री कहकर जिक्र किया गया है. 

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1. राष्ट्र के नाम 29 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने विधेयक को रोकने के लिए विपक्षी दलों की आलोचना की और विपक्षी सदस्यों के मतदान के तरीके पर सीधे टिप्पणी की तथा उनके इरादों पर सवाल उठाए.

2. देश का प्रधानमंत्री केवल किसी गंभीर राष्ट्रीय महत्व के ऐसे मुद्दे पर राष्ट्र को संबोधित करता है, जिसमें देरी की गुंजाइश न हो. प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन बहुत कम होते हैं. संसद में सरकार के अपेक्षित बहुमत न जुटा पाने और विपक्षी दलों की आलोचना करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र को संबोधित करना अभूतपूर्व है, जो अनैतिक और सत्ता का खुला दुरुपयोग है. देश के सर्वोच्च कार्यपालिका पद पर बैठे व्यक्ति के ऐसे बयान सदन के विशेषाधिकार का गंभीर उल्लंघन और अवमानना हैं.

3. 16 और 17 अप्रैल को विपक्षी दलों के प्रत्येक सदस्य ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण का सर्वसम्मति से समर्थन करते हैं. जहां तक संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 का सवाल है, लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू करने के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 82 में चुपचाप संशोधन करने की कोशिश की गई, जिससे परिसीमन से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा प्रावधान हट जाते और मामला सत्तारूढ़ दल की मर्जी और दुर्भावनापूर्ण इरादों पर छोड़ दिया जाता. विपक्षी सदस्य लोकसभा में इसी बात का विरोध कर रहे थे. 

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4. यह स्थापित संसदीय सिद्धांत है कि संसद में सदस्यों द्वारा दिए गए भाषणों के संबंध में उन पर टिप्पणी करना, आक्षेप लगाना या उनके इरादों पर सवाल उठाना, विशेषाधिकार का गंभीर उल्लंघन और सदन की अवमानना माना जाता है.

5. 16 और 17 अप्रैल, 2026 को विपक्षी दलों से जुड़े सांसद अपनी वास्तविक चिंताएं व्यक्त कर रहे थे, और उसके बाद उन्होंने संविधान संशोधन विधेयक के खिलाफ संसद में मतदान किया.

6. संविधान (संशोधन) विधेयक, 2026, जो भारत के संविधान की मूल संरचना की जड़ों पर प्रहार करने वाला था, गिर गया और सही तरीके से गिरा. यह अत्यंत दुखद है कि प्रधानमंत्री इतने नाराज हुए कि उन्होंने राष्ट्र को संबोधित कर उन सांसदों पर आक्षेप लगाए, जो ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहे थे और इस मामले में संविधान की रक्षा कर रहे थे.

7. प्रधानमंत्री की टिप्पणियां निर्वाचित सांसदों की स्वतंत्रता और ईमानदारी पर आक्षेप लगाती हैं. विपक्षी सदस्यों द्वारा अपने संसदीय कर्तव्यों के निर्वहन के तरीके पर सवाल उठाती हैं, और उनके मतदान व्यवहार के पीछे नीयत जोड़ती हैं.

8. यह लंबे समय से चली आ रही संसदीय परंपरा और प्रत्येक सदस्य का मूल विशेषाधिकार है (जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संरक्षण प्राप्त है) कि प्रधानमंत्री सहित कोई भी व्यक्ति सदन में किसी सदस्य के आचरण या मतदान पर टिप्पणी नहीं करेगा और न ही उसके पीछे कोई नीयत जोड़ेगा. 

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9. यह विशेषाधिकार हनन नोटिस मैं आपके माननीय कार्यालय को सौंपता हूं, ताकि इस गंभीर घटना को विशेषाधिकार के स्पष्ट, जानबूझकर किए गए उल्लंघन और सदन की अवमानना के रूप में संज्ञान में लिया जाए, और विस्तृत जांच के लिए मामले को लोकसभा की विशेषाधिकार समिति को भेजा जाए, ताकि प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार कार्यवाही शुरू की जा सके.

10. यह मामला अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि अपना कर्तव्य निभा रहे किसी निर्वाचित प्रतिनिधि पर सवाल उठाना केवल व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि संसद के अधिकार और भारत की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा आघात है.

क्‍या होता है प्र‍िव‍िलेज मोशन

प्र‍िव‍िलेज मोशन (Privilege Motion) या विशेषाधिकार प्रस्ताव को आसान भाषा में समझने की कोशिश करें, तो इसे औपचारिक शिकायत या प्रस्ताव के रूप में देखना चाहिए. ऐसी शिकायत या प्रस्ताव जिसे संसद (लोकसभा या राज्यसभा या विधानमंडल) के किसी सदस्य द्वारा लाया जाता है. 

जब किसी सदस्य को लगता है कि किसी मंत्री, किसी अन्य सदस्य, या किसी व्यक्ति ने सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन किया है, तो वह विशेषाधिकार यानी प्रिविलेज नोटिस दे सकता है. लोकसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव नियम 222 के तहत स्पीकर को दिया जाता है. 

नोटिस मिलने पर स्पीकर को तय करना होता है कि प्रिविलेज मोशन स्वीकार करने लायक है या नहीं. अगर प्रस्ताव स्वीकार करने लायक होता है, तो स्पीकर उसे विशेषाधिकार समिति को भेज देते हैं. 

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विशेषाधिकार समिति ही जांच करती है, और अपनी रिपोर्ट सदन को देती है. सदन ही अंतिम फैसला लेता है. रिपोर्ट के आधार पर विशेषाधिकार हनन के मामले में चेतावनी दी जा सकती है, माफी मांगने को कहा जा सकता है, निलंबित किया जा सकता है - और गंभीर मामलों में निष्कासन तक हो सकता है.

क्‍या है व‍िशेषाध‍िकार हनन

सांसदों और समितियों को कुछ खास अधिकार दिए गए हैं, ताकि वे बिना दबाव के अपना काम कर सकें. अगर इन अधिकारों में दखल दिया जाता है, तो इसे विशेषाधिकार हनन माना जाता है. ऐसी स्थिति में कोई भी सांसद सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव ला सकता है और कार्रवाई की मांग कर सकता है।

विशेषाधिकार हनन यानी ब्रीच ऑफ प्रिविलेज (Breach of Privilege) तब होता है, जब संसद (या विधानमंडल के सदस्यों) को दिए गए किसी विशेषाधिकार (व्यक्तिगत रूप से) या सदन (सामूहिक रूप से) उल्लंघन या अवहेलना की जाए. 

मसलन, सदन में किसी सदस्य के भाषण या उसके दिए वोट पर बाहर (बयान, सोशल मीडिया पोस्ट/कमेंट) से आक्षेप करना या उसकी आलोचना करना जो सदन की गरिमा को प्रभावित करता हो. सदन को गुमराह करने की कोशिश होती हो. सदस्यों की स्वतंत्रता में बाधा पहुंचती हो. और, सदन की कार्यवाही या सदस्यों की मानहानि होती हो. 

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सदन में कही गई बात को क्‍या इम्‍युन‍िटी हासिल है

संविधान के आर्टिकल 105 (2) के मुताबिक, संसद के किसी भी सदस्य को संसद या उसकी किसी समिति में उसकी कही हुई किसी बात या उसके दिए किसी वोट के संबंध में किसी भी अदालत में किसी कार्यवाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा.

मतलब, सदन या संसदीय समिति में सांसद ( राज्यों में विधायक) जो कुछ भी कहे या जो वोट दे, उसके खिलाफ सिविल या क्रिमिनल किसी भी कोर्ट में कोई मुकदमा नहीं चल सकता. 

यह इम्यूनिटी इसलिए दी गई है ताकि सदस्य बिना किसी बाहरी डर या दबाव के स्वतंत्र रूप से बोल सकें, और अपना कर्तव्य निभा सकें. यह संपूर्ण इम्यूनिटी मानी जाती है, लेकिन तभी तक जब तक बात सदन की कार्यवाही के दौरान कही गई हो. सदन के बाहर दिए गए बयानों पर यह इम्यूनिटी नहीं मिलती.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों के व्यवहार पर कई बार तीखी टिप्पणियां की हैं. देश के विकास में बाधा डालने का आरोप भी लगाया है. लेकिन, चुनावी माहौल के कारण कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकारी प्रस्ताव जैसा कदम बढ़ाया है - बस मौके की बात है, बहती गंगा में हर कोई हाथ धो लेना चाहता है. 

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