बांग्लादेश की राजनीति में राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन एक अनोखी मिसाल बन गए हैं. शेख हसीना सरकार के भरोसेमंद चहेते रहे वे, यूनुस अंतरिम सरकार के लिए मजबूरी बन गए और अब तारिक रहमान की बीएनपी सरकार में चतुराई से टिके हुए हैं. उनकी कहानी बांग्लादेश की सियासत की गहराई और दांव-पेच को साफ दिखाती है. जिस पर वहां की जमात-ए-इस्लामी पार्टी तुरंत विराम लगाना चाहती है.
मोहम्मद शहाबुद्दीन की गिनती 1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में होती है. तब वे छात्र नेता के रूप में सक्रिय रहे. अपने जन्म स्थान पबना में स्वाधीन बांग्ला छात्र संघर्ष परिषद के संयोजक थे. शेख मुजीबुर रहमान ने उन्हें कृषक श्रमिक अवामी लीग का जिला संयुक्त सचिव बनाया. मुजीब की हत्या के बाद उन्हें तीन साल जेल भी जाना पड़ा.
जेल से रिहा होने पर उन्होंने राजनीति से कुछ समय के लिए किनारा कर लिया. वे वकील बने, जिला न्यायाधीश रहे और फिर एंटी-करप्शन कमीशन में कमिश्नर की भूमिका निभाई. अवामी लीग के पुराने कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं पर अत्याचार की जांच भी की. 2020 में वे अवामी लीग की सलाहकार परिषद के सदस्य बने. उनकी पूरी पृष्ठभूमि अवामी लीग की विचारधारा और हसीना परिवार से गहराई से जुड़ी रही.
शेख हसीना के चहेते
अप्रैल 2023 में शेख हसीना सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति पद पर नामित किया. बिना विरोध के वे 22वें राष्ट्रपति बने. यह फैसला शेख हसीना और उनकी बहन शेख रेहाना की विशेष पसंद माना जाता है. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनसे अनजान थे. शहाबुद्दीन हसीना सरकार के लिए आदर्श व्यक्ति थे. वफादार, अनुभवी और कम विवादास्पद. उनकी नियुक्ति ने हसीना सरकार को संवैधानिक स्तर पर मजबूती दी. वे हसीना के चहेते साबित हुए.
यूनुस सरकार की मजबूरी
अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन के बाद हसीना भारत पलायन कर गईं. मुहम्मद यूनुस अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार बने. इस दौर में शहाबुद्दीन देश के एकमात्र संवैधानिक प्रमुख बन गए. कई प्रदर्शनकारियों ने उनका इस्तीफा मांगा, लेकिन वे हटा नहीं सके.
यूनुस सरकार के अंतिम दौर में दिसंबर 2025 में शहाबुद्दीन ने रायटर्स को इंटरव्यू दिया. उन्होंने कहा कि वे फरवरी 2026 के संसदीय चुनाव के बाद इस्तीफा दे देंगे. यूनुस सरकार के दौरान उन्हें अपमानित महसूस हुआ. यूनुस ने सात महीने तक उनसे मुलाकात नहीं की, उनका प्रेस विभाग छीन लिया गया और सितंबर में रातोंरात विदेशी दूतावासों से उनके फोटो हटा दिए गए. फिर भी वे पद पर बने रहे क्योंकि राष्ट्रपति के बिना संवैधानिक खालीपन पैदा हो जाता. यूनुस सरकार उन्हें हटाने की कोशिश में नाकाम रही.
सेना प्रमुख से तालमेल और तारिक रहमान सरकार से बैलेंस
जब शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को गुस्सा सड़क पर फूटा था, तब उनके हर नजदीकी को निशाना बनाया जा रहा था. ऐसे वक्त में बांग्लादेश सेना प्रमुख वाकर-उज-जमान उनकी रक्षा में आगे आए. और फिर दोनों के बीच संपर्क नियमित हो गया. वाकर-उज-जमान ने स्पष्ट किया कि वे सत्ता हथियाने के इच्छुक नहीं हैं. शहाबुद्दीन सेना के समर्थन और संवैधानिक दबाव का फायदा उठाकर टिके रहे.
फरवरी 2026 के चुनाव में तारिक रहमान की बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने भारी जीत हासिल की. शहाबुद्दीन ने तारिक रहमान को शपथ दिलाई. अब भी वे राष्ट्रपति पद पर डटे हुए हैं. उनका यूनुस विरोधी रवैया देखते हुए बीएनपी सरकार ने उन्हें खतरा नहीं माना. शहाबुद्दीन ने चुनाव के बाद इस्तीफे की अपनी पूर्व घोषणा के साथ साफ संकेत दिया कि वे नई सरकार के साथ सहयोगी हैं. उनकी चतुराई इसी में है कि उन्होंने संवैधानिक निरंतरता बनाए रखी, सेना का समर्थन हासिल किया और नई सरकार के लिए कोई तत्काल खतरा नहीं बने.
जमात-ए-इस्लामी के सवाल
विपक्षी जमात-ए-इस्लामी शहाबुद्दीन को हटाने की कोशिश कर रही है. जमात का आरोप है कि तारिक रहमान सरकार जानबूझकर उन्हें नहीं हटा रही क्योंकि उन्हीं के जरिए बीएनपी अवामी लीग को मुख्यधारा में वापस लाना चाहती है. जमात शहाबुद्दीन को हसीना का प्रतीक मानती है.
मोहम्मद शहाबुद्दीन की यात्रा बांग्लादेश की राजनीति का आईना है. स्वतंत्रता सेनानी, हसीना के चहेते, यूनुस सरकार की मजबूरी और अब तारिक रहमान सरकार में चतुराई से टिके नेता. जैसा भारत की सियासत में कहा जाता है- एक 'परफेक्ट मौसम विज्ञानी'.