ईरान के सुप्रीम लीडर रहे अयातुल्लाह अली खामनेई के आखिरी सफर की तैयारियां अंतिम रूप ले रही हैं. 28 फरवरी 2026 को इजरायली एयर स्ट्राइक में मारे गए खामनेई का जनाजा चार महीने बाद, 4 जुलाई से 9 जुलाई 2026 के बीच निकाला जा रहा है. ईरान सरकार और वहां के मजहबी लीडरों ने इसे सिर्फ एक 'अंतिम संस्कार' नहीं, बल्कि 'तारीख का सबसे बड़ा और अनोखा आयोजन' बनाने के लिए कमर कस ली है. लगभग 3,000 किलोमीटर लंबी इस अंतिम यात्रा को ‘द सेंड-ऑफ टू ईरान्स लीडर ऑफ मार्टियर्स’ (शहीदों के रहनुमा की विदाई) का नाम दिया गया है.
आसान और बोलचाल की भाषा में कहें तो यह कोई मामूली जनाजा नहीं है, बल्कि एक ऐसा मजहबी, सियासी और डिप्लोमैटिक शक्ति-प्रदर्शन है जो आने वाले वक्त में मिडिल-ईस्ट की पूरी सियासत का रुख बदलने वाला है. आइए समझते हैं कि इस पूरे बड़े प्रोग्राम का खाका क्या है, शिया समाज के लिए इसके क्या मायने हैं, और दुनिया के सियासी हलकों में इसे किस नजरिए से देखा जा रहा है.
3,000 किलोमीटर लंबा अंतिम सफर: तेहरान से कर्बला और मशाद तक
इस्लामी तौर-तरीकों में आमतौर पर तदफीन (शव को दफनाने) का काम जल्द से जल्द करने का दस्तूर है, लेकिन जंग के हालात, सुरक्षा वजहों और खास रणनीतियों के चलते इसमें देरी हुई. अब ईरान ने जो रूट तैयार किया है, वह बेहद खास है. यह सफर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिया इस्लाम के सबसे मुकद्दस मुकामों को आपस में जोड़ता है.
3-5 जुलाई (तेहरान): प्रोग्राम की शुरुआत तेहरान के बहुत बड़े 'इमाम खुमैनी ग्रैंड मोसल्ला' से होगी. 3 जुलाई को विदेशी मेहमानों और राजनयिकों के लिए खास श्रद्धांजलि सभा (ताजीयती जलसा) होगा. इसके बाद 4 और 5 जुलाई को आम जनता को खामनेई के आखिरी दीदार का मौका मिलेगा.
6 जुलाई (मुख्य जुलूस): तेहरान में इमाम हुसैन स्क्वायर से आजादी स्क्वायर तक लगभग 10 किलोमीटर लंबा एक बहुत बड़ा मातमी जुलूस निकाला जाएगा.
7 जुलाई (कौम में): इसके बाद खामनेई के शव को ईरान के मजहबी शहर कौम (Qom) ले जाया जाएगा, जो शिया उलेमा और मदरसों का सबसे बड़ा केंद्र है.
8 जुलाई (इराक में नजफ और कर्बला): यह इस जनाजे का सबसे हैरान करने वाला और ऐतिहासिक हिस्सा है. पहली बार ईरान के किसी सुप्रीम लीडर का जनाजा सरहद पार करके इराक जाएगा. वहां शिया समुदाय के सबसे पाक मुकाम हैं. जनाजे को नजफ में हजरत अली और कर्बला में इमाम हुसैन की दरगाहों पर ले जाया जाएगा.
9 जुलाई (मशाद में सुपुर्द-ए-खाक): इराक से लौटने के बाद, आखिरी दौर में अयातुल्लाह खामनेई की देह को उनके जन्मस्थान वाले शहर मशाद (Mashhad) ले जाया जाएगा. यहां शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रजा की मजार में उनकी वसीयत के मुताबिक उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.

शिया समाज के लिए मायने: गम, मातम और 'शहादत' का जज्बा
शिया समुदाय में गम, मातम और शहादत का मुकाम बेहद नाजुक और गहरा है. कर्बला का वाकया और इमाम हुसैन की शहादत इस समुदाय के अकीदे और तहजीब की बुनियाद है. जब ईरान की लीडरशिप ने इस जनाजे को मुहर्रम के पाक महीने (19वें से 24वें मुहर्रम) के दौरान करने का फैसला किया, तो इसके पीछे बहुत सोची-समझी मजहबी भावनाएं थीं.
आम तौर पर मातम को सिर्फ दुख जाहिर करने का जरिया माना जाता है, लेकिन शिया संस्कृति में यह नाइंसाफी के खिलाफ खड़े होने, प्रतिरोध करने और हक के लिए जान कुर्बान करने का संकल्प भी है. ईरान की लीडरशिप दुख की इस घड़ी को एक 'प्रेरणादायी मौके' की तरह इस्तेमाल करना चाहती है.
अंतिम संस्कार के पोस्टरों पर लिखा नारा- ‘हमें उठना ही होगा’ (We Must Rise) साफ दिखाता है कि हुकूमत इस मातम के जरिए मुल्क के अंदर वतनपरस्ती और मजहबी जज्बे को एक नई ताकत देना चाहती है. ईरान यह पैगाम दे रहा है कि उनके सुप्रीम लीडर मरे नहीं हैं, बल्कि वे 'शहीद' हुए हैं, और उनकी शहादत मुल्क को और मजबूत बनाएगी. कौम, नजफ, कर्बला और मशाद जैसे मुकद्दस शहरों को जोड़कर, ईरान पूरे इलाके के शिया मुसलमानों को एकजुट कर रहा है.
डिप्लोमैटिक गलियारों में हलचल: ताकत और रसूख का अहसास
दुनिया के डिप्लोमैटिक हलके इस पूरे मामले को बहुत गौर से देख रहे हैं. जानकारों का मानना है कि इस आलीशान और बड़े आयोजन के जरिए ईरान दुनिया को कई सियासी पैगाम दे रहा है:
ताकत और मजबूती का मुजाहिरा: जंग के बाद अमेरिका और इजरायल के साथ हुए अस्थाई युद्धविराम के बीच, ईरान यह दिखाना चाहता है कि सुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी उसकी व्यवस्था कमजोर नहीं पड़ी है. तेहरान की सड़कों पर 1.5 से 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद है. अगर ऐसा होता है, तो यह 1989 में अयातुल्लाह खुमैनी के जनाजे का रिकॉर्ड तोड़ देगा और ईरान की अंदरूनी एकता को साबित करेगा.
अंतरराष्ट्रीय समर्थन: ईरान की नेशनल फ्यूनरल कमेटी के मुताबिक, 30 से ज्यादा मुल्कों के बड़े ऑफिशियल और करीब 90 देशों के मजहबी रहनुमाओं ने इस प्रोग्राम में शामिल होने की इच्छा जताई है. ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वैश्विक नेताओं को इस जनाजे में शरीक होने का न्योता भेजा है. इतने बड़े पैमाने पर कूटनीतिक भागीदारी ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला करने की पश्चिमी देशों की कोशिशों को करारा जवाब होगी.
इलाकाई दबदबा: जनाजे को इराक के नजफ और कर्बला ले जाना एक बहुत बड़ा जियो-पॉलिटिकल कदम है. यह दिखाता है कि सरहदों के पार भी ईरान और इराक के शिया समाज का आपस में कितना गहरा कूटनीतिक और मजहबी तालमेल है. यह इस इलाके में ईरान के 'एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस' को और मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है.
ईरान में एक नए दौर की शुरुआत और चुनौतियां
इस बड़ी विदाई के पीछे ईरान के भविष्य की सियासत भी छिपी है. अयातुल्लाह खामनेई ने 36 सालों तक ईरान की कमान संभाली. उनके जाने के बाद मार्च 2026 से उनके बेटे, 56 साला मोजतबा हुसैनी खामनेई को नया सुप्रीम लीडर नियुक्त किया गया है. हालांकि, कूटनीतिक हलकों में मोजतबा की सेहत और उनकी जनसभाओं को लेकर कई तरह की अफवाहें और कयासों का दौर जारी है.
ईरान की लीडरशिप इस जनाजे को नए सुप्रीम लीडर की स्वीकार्यता बढ़ाने और मुल्क के भीतर हाल के महीनों में महंगाई व अन्य मुद्दों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के असर को खत्म करने के लिए भी इस्तेमाल करना चाहती है.
अयातुल्लाह अली खामनेई का यह सरहद पार जनाजा मजहबी अकीदे, गहरे मातम और सियासी रणनीति का एक अनूठा संगम है. 3,000 किलोमीटर की यह आखिरी यात्रा जहां एक तरफ शिया समाज की मजहबी संवेदनाओं और इमामों के प्रति उनकी बेपनाह मोहब्बत को समेटे हुए है, वहीं दूसरी तरफ यह दुनिया के नक्शे पर ईरान की मजबूत सियासी इच्छाशक्ति का एलान भी है. ईरान की लीडरशिप अपने रहबर के जाने के गम को 'बदले' और 'प्रतिरोध' की एक ऐसी चिंगारी में बदलने की कोशिश कर रही है, जो आने वाले वक्त में पूरे मिडिल-ईस्ट की सियासत का रुख तय करेगी.