MP News: इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से कई लोगों की मौत का मामला लापरवाही की किसी एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि कई दशकों से विभिन्न स्तरों पर हुई चूकों का परिणाम था. इस मामले की जांच करने वाले आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में यह बात कही है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से गठित एक सदस्यीय आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट अदालत में सौंप दी है. मामले से जुड़े पक्षों ने बुधवार को इसकी जानकारी दी. पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग ने संबंधित सरकारी अधिकारियों और अन्य पक्षों की भूमिका की विस्तृत विभागीय जांच कराने की सिफारिश की है.
पानी के नमूनों में मिले ई. कोलाई और टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया
आयोग की 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट के मुताबिक, भागीरथपुरा से लिए गए पानी के नमूनों में ई. कोलाई और टोटल कोलीफॉर्म जैसे बैक्टीरिया मिले. इससे पेयजल के दूषित होने की पुष्टि हुई. रिपोर्ट में कहा गया है कि दूषित पानी के कारण गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी जलजनित बीमारियां फैलीं.
सीवर और पेयजल पाइपलाइन में खामियों का जिक्र
रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में 1990 से 1995 के बीच बिछाई गई सीवर लाइन और 1999 से 2004 के बीच बिछाई गई पेयजल पाइपलाइन केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग संगठन (CPHEEO) के मानकों के अनुरूप नहीं थीं.
आयोग ने कहा कि दोनों पाइपलाइनों को अनुचित तरीके से बिछाने, उनमें लीकेज और अन्य संभावित कारणों से सीवर का पानी पेयजल में मिल सकता था.
फरवरी तक होती रही दूषित पानी की सप्लाई
भागीरथपुरा में दूषित पेयजल की आपूर्ति से बीमारी फैलने का मामला दिसंबर 2025 में सामने आया था. स्थानीय निवासियों और कांग्रेस ने इस घटना में 36 लोगों की मौत होने का दावा किया है.
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, रिकॉर्ड बताते हैं कि भागीरथपुरा में दूषित पानी की आपूर्ति इस साल 6 फरवरी तक जारी रही. रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य विभाग को 12 फरवरी तक इलाके में 35 मौतों की जानकारी मिली थी. इनमें से 22 मौतों को दूषित पेयजल की आपूर्ति से जुड़ा संभावित मामला माना गया.
नगर निगम और विकास प्राधिकरण पर भी टिप्पणी
आयोग ने कहा कि यह घटना पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की योजना, रखरखाव, निगरानी और पर्यवेक्षण में व्यवस्थागत कमियों का परिणाम थी. रिपोर्ट में पाइपलाइन सुधार से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में प्रशासनिक देरी का भी उल्लेख किया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण ने पेयजल और सीवरेज से जुड़े कार्यों के सभी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए. आयोग ने मूल योजनाओं और अन्य तकनीकी दस्तावेजों की अनुपलब्धता की अलग से जांच कराने की सिफारिश की है.
मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपये मुआवजे की सिफारिश
आयोग ने प्रत्येक मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये और गंभीर रूप से बीमार प्रत्येक मरीज को 2 से 3 लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की है.
इसके अलावा, भविष्य में दूषित पेयजल की आपूर्ति रोकने के लिए आयोग ने स्वतंत्र राज्य शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण बनाने और जल आपूर्ति व्यवस्था में संस्थागत सुधार करने का सुझाव दिया है.