मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा बढ़ा दी है. इसकी वजह है आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के उम्मीदवार दामोदर यादव मंडल को मिले 22 हजार से ज्यादा वोट. अब सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्रशेखर आजाद की पार्टी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में नए समीकरण बना पाएगी और इन वोटों का असर किन दलों पर पड़ेगा.
दतिया में आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव मंडल को मिले वोटों ने बीजेपी की राह मुश्किल कर दी. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस नतीजे ने सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि बसपा, सपा और कांग्रेस जैसे दलों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है. खासकर बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की चंद्रशेखर की कोशिशों पर नजरें टिक गई हैं.
यादव-दलित समीकरण पर दांव
दतिया उपचुनाव में चंद्रशेखर ने यादव उम्मीदवार को मैदान में उतारकर नया समीकरण बनाने की कोशिश की. माना जा रहा है कि इस रणनीति से उन्हें यादव, दूसरे पिछड़े वर्गों और जाटव समाज के वोटों का फायदा मिला.
2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया सीट पर आजाद समाज पार्टी को करीब 700 वोट मिले थे, जबकि बसपा को लगभग 1100 वोट मिले थे. लेकिन इस बार आजाद समाज पार्टी ने अपने प्रदर्शन में बड़ा सुधार किया और 22 हजार से ज्यादा वोट हासिल कर लिए. इस उपचुनाव में दतिया सीट पर कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को हराया. बीजेपी की हार में आजाद समाज पार्टी के प्रदर्शन को भी एक अहम कारण माना जा रहा है, क्योंकि उसके उम्मीदवार ने बड़ी संख्या में वोट हासिल किए.
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यूपी में बढ़ेगी चंद्रशेखर की चुनौती?
दतिया के नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है. आजाद समाज पार्टी पहले ही यूपी की 45 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है. चंद्रशेखर की राजनीति अब सिर्फ दलित वोटों तक सीमित नहीं दिख रही है. वह पिछड़े वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. दतिया में यादव उम्मीदवार उतारना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
मध्य प्रदेश में बहुजन राजनीति का पुराना आधार रहा है. कांशीराम के दौर से ही यहां बसपा का मजबूत संगठन रहा है. यही वजह है कि आजाद समाज पार्टी के प्रदर्शन को कई लोग बसपा के पुराने वोट बैंक से जोड़कर देख रहे हैं.
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सपा-कांग्रेस के लिए भी बढ़ी चिंता
चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव से सिर्फ बीजेपी ही नहीं, विपक्षी दल भी सतर्क हो गए हैं. अगर 2027 के चुनाव में आजाद समाज पार्टी अकेले मैदान में उतरती है, तो कई सीटों पर वोटों का बंटवारा देखने को मिल सकता है.
चंद्रशेखर आजाद दलित और पिछड़े वर्गों को साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि यूपी में बसपा के सामने रहने पर दलित वोटर किस ओर जाएगा? क्या वह मायावती के साथ बना रहेगा या फिर चंद्रशेखर आजाद को भी विकल्प के तौर पर देखेगा. यही आने वाले चुनावों में यूपी की राजनीति का अहम मुद्दा बन सकता है.
फिलहाल दतिया का नतीजा चंद्रशेखर आजाद के लिए एक संकेत जरूर है कि उनकी पार्टी कुछ इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है. अब नजर इस बात पर होगी कि वह इस समर्थन को 2027 के यूपी चुनाव तक कितना मजबूत आधार बना पाते हैं.