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दादी-नानी आज क्यों नहीं सुनाती कहानी, बाल साहित्यकार ने बताई वजह

बाल पत्रिका नंदन की संपादक जयंती रंगनाथन ने कहा कि आज के बच्चे शायद सीखना ही नहीं चाहते. उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों में जिस तरह की रुचि डालने हैं बच्चा उसी ओर मुड़ जाता है. आप किताब देंगे तो वो पढ़ेंगे, अगर टैबलेट या टीवी के सामने बिठा देंगे तो वह उसी को देखेंगे.

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लेखिका क्षमा शर्मा (फोटो- आजतक)
लेखिका क्षमा शर्मा (फोटो- आजतक)

'साहित्य आजतक' के दूसरे दिन सीधी बात मंच पर सत्र 'आओ बच्चों तुम्हें सुनाएं' का आयोजन किया गया. इस सत्र में नामी कथाकार दिविक रमेश, पत्रकार और संपादक रहीं क्षमा शर्मा, लेखक जयंती रंगनाथन ने शिरकत की. कार्यक्रम में बच्चों के साहित्य और उसके असर पर चर्चा की गई साथ ही बाल साहित्य आज कहां खड़ा है जैसे मुद्दे पर भी बातचीत हुई.

लेखिका क्षमा शर्मा ने दादा-नानी की कहानियों के जिक्र पर कहा कि आज उस दौर की दादी-नानियां बची ही कहां हैं, आज की दादी का वक्त तो टीवी पर धारावाहिक देखकर बीत रहा है साथ ही संयुक्त परिवार भी अब खत्म होते जा रहे हैं, ऐसे में वो बच्चों को कहानियां कैसे सुनाएंगीं. उन्होंने कहा कि पहले के दौर में बुजुर्ग दादी या नानी अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर बच्चों के साथ वक्त बिताती थीं, लेकिन आज ऐसा नहीं है.

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आधुनिक तकनीक पर क्षमा ने कहा कि मोबाइल गलत नहीं है लेकिन हर ज्ञान की एक उम्र होती है, बच्चे किस उम्र में क्या देखे और क्या न देखे, इसका ध्यान परिजनों को जरूर रखना चाहिए.

परिजनों की भूमिका अहम

बाल पत्रिका नंदन की संपादक जयंती रंगनाथन ने कहा कि आज के बच्चे शायद सीखना ही नहीं चाहते. उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों में जिस तरह की रुचि डालने हैं बच्चा उसी ओर मुड़ जाता है. आप किताब देंगे तो वो पढ़ेंगे, अगर टैबलेट या टीवी के सामने बिठा देंगे तो वह उसी को देखेंगे. जयंती ने कहा कि बच्चों में पढ़ने की आदत डालना उनके परिजनों पर निर्भर करता है.

आज के बदलते दौर पर जयंती ने कहा कि बच्चों के लिए साहित्य लिखने वालों को भी इस दौर के बदलाव को ध्यान रखना पड़ेगा क्योंकि बहुत जल्दी-जल्दी सब कुछ बदल रहा है. हर तीन साल में जेनरेशन बदल रही है, दस साल पहले और आज के दौर में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है. तभी जरूरी है लेखक भी इस समझ के साथ लिखें तभी पाठकों से उनके तार जुड़े सकते हैं.

प्रसिद्ध कवि दिविक रमेश ने कहा कि बाल साहित्य जितना जरूरी बच्चों के लिए है उतना ही अहम बड़ों के लिए भी है. उन्होंने कहा कि बच्चे बड़ों का साहित्य नहीं पढ़ सकते क्योंकि उस उम्र में उनकी तैयारी कम होती है लेकिन बाल साहित्य मरते दम तक पढ़ा जा सकता है. उन्होंने कहा कि बाल साहित्य आज बड़ों को भी सिखा सकता है जैसे बच्चे बड़ों को बहुत कुछ सिखाते हैं.

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