संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के डॉक्टरों ने खाड़ी देशों में कजिन मैरिज (चाचा, मौसी, ताऊ और बुआ के बच्चों के साथ शादी) के बढ़ते चलन और इससे होने वाले हेल्थ रिस्क को लेकर आगाह किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही परिवार या करीबी रिश्तेदारी में शादी करने से जेनेटिक यानी आनुवंशिक बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है.
इस समस्या से बचाव के लिए डॉक्टरों ने जीनोम लिटरेसी पर खास जोर दिया है ताकि लोग शादी से पहले जेनेटिक टेस्टिंग और काउंसलिंग के महत्व को समझ सकें और भविष्य में होने वाले बच्चों को जन्मजात बीमारियों से बचा सकें.
डॉक्टरों ने 'जेनेटिक रिस्क इन द गल्फ: वॉट अवर डीएनए इज टेलिंग अस अबाउट इनहरिटेड डिसीस' विषय पर हुई चर्चा के दौरान कहा कि खाड़ी देशों की आबादी में एक खास आनुवंशिक पहचान पाई जाती है जो साझा पूर्वजों और शुरुआती जेनेटिक बदलावों (फाउंडर वेरिएंट्स) से बनी है. इसी वजह से यह इलाका जीनोमिक मेडिसिन के लिए एक बड़ा सेंटर बन चुका है.
शादी से पहले कराना होगा टेस्ट
कजिन मैरिज से होने वाले बच्चों में खतरनाक बीमारियां फैलने से रोकने के लिए यूएई में शादी से पहले जीन टेस्टिंग कंपल्सरी कर दी गई जो एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है.
करीबी रिश्तेदारों में DNA काफी हद तक एक जैसा होता है. अगर दोनों कजिन्स में किसी एक ही पूर्वज से मिला कोई छिपा हुआ (रिसेसिव) जीन म्यूटेशन हो, तो उनके बच्चे में उस खराब जीन की दो कॉपी आने का खतरा ज्यादा होता है जिससे उसमें बीमारी की संभावना बहुत ही ज्यादा हो सकती है.
किस-किस बीमारी से घिर सकती है संतान
कजिन मैरिज में होने वाली संतान में खून से जुड़ी बीमारियां जैसे थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया का खतरा बहुत ज्यादा होता है.
सिस्टिक फाइब्रोसिस, जन्म से दिल की खराबी और किडनी की समस्याएं जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं.
बौद्धिक क्षमता में कमी, जन्म से सुनने में दिक्कत और देखने में दिक्कत जैसी न्यूरोलॉजिकल और बॉडी डेवलपमेंट से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.
तेजी से बढ़ रहा जेनेटिक बीमारी का रिस्क
सेशन के दौरान SKMC/SEHA में कंसल्टेंट फिजिशियन मेडिकल जेनेटिसिस्ट और UAEU के कॉलेज ऑफ मेडिसिन में जीनोमिक मेडिसिन की एडजंक्ट असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मरियम अलशेही ने कहा कि गल्फ के इलाके में करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी की दर ज्यादा है जिससे रिसेसिव जेनेटिक बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं.
उन्होंने 'नेचर मेडिसिन' में छपी एक स्टडी का भी जिक्र किया जिसकी अगुवाई दुबई हेल्थ के जीनोमिक मेडिसिन सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अहमद अबू तयून ने की थी. इस स्टडी में पाया गया कि दुबई के प्री-मैरिटल स्क्रीनिंग प्रोग्राम के तहत टेस्ट किए गए शुरुआती 1,000 जोड़ों में से आठ प्रतिशत एक ही पैथोजेनिक वैरिएंट के कैरियर थे. यह दर इसी तरह की इंटरनेशनल स्टडीज की तुलना में ज्यादा है.
उन्होंने आगे कहा कि ओमान में हुई एक अलग स्टडी में पाया गया कि बच्चों में मेटाबोलिक बीमारी के 80 प्रतिशत मामलों में माता-पिता आपस में करीबी रिश्तेदार थे.
UAE में जनवरी 2025 से शादी से पहले जेनेटिक टेस्टिंग कंपल्सरी कर दी गई है जिसके तहत अबू धाबी में 570 से ज्यादा और दुबई में 782 जीन्स की स्क्रीनिंग की जाती हैं. डॉ. अलशेही ने बताया कि UAE दुनिया का पहला ऐसा प्री-मैरिटल जेनेटिक स्क्रीनिंग प्रोग्राम चला रहा है और इसके बाद बचाव के दूसरे चरण के तौर पर नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग भी शुरू की गई है.
तेजी से पहचान, जल्द इलाज
UAEU में OB/Gyn डिपार्टमेंट की चेयरपर्सन, एसोसिएट प्रोफेसर और कंसल्टेंट डॉ. शमसा अलावर के संचालन में हुई चर्चा के दौरान SSMC में मेडिकल एजुकेशन के डायरेक्टर और कंसल्टेंट नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. जुनैद मुहिब खान ने कहा कि नवजात शिशुओं की जेनेटिक स्क्रीनिंग से नतीजों में पहले ही बदलाव आ रहा है.
मई 2026 की दुबई की एक स्टडी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जांच किए गए 53 प्रतिशत बच्चों में जेनेटिक बीमारियां पाई गईं. इनमें से 47 प्रतिशत बच्चों के इलाज के तरीके में बदलाव किया गया और 36 प्रतिशत बच्चों को फार्माकोथेरेपी दी गई.
उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र 'एविडेंस-बेस्ड' (सबूतों पर आधारित) से 'प्रिसिजन मेडिसिन' (सटीक इलाज) की ओर बढ़ रहा है और 2030 तक पूरी तरह से इसमें बदलाव का लक्ष्य है. उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआती जेनेटिक जांच से गैर-जरूरी टेस्ट से बचा जा सकता है और बच्चे के बीमार होने पर परिवारों को स्पष्टता मिलती है.
सांस्कृतिक संवेदनशीलता और जानकारी का अंतर
दोनों डॉक्टरों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौतियां लैब के बाहर हैं. डॉ. अलशेही ने कहा कि डॉक्टर अक्सर ऐसे जोड़ों को देखते हैं जो पॉजिटिव नतीजों की वजह से परेशान होते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि UAE में स्क्रीनिंग का तरीका सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक होना चाहिए और दूसरी जगहों पर इस्तेमाल होने वाले 'पब्लिक कैरियर रजिस्ट्री' जैसे तरीकों को नहीं अपनाया जाना चाहिए.
डॉ. खान ने कहा कि जेनेटिक वैरिएंट होना 'कोई बीमारी नहीं है' और इसके कारण मरीजों या समुदायों को कोई खास लेबल नहीं दिया जाना चाहिए.
डॉ. अलशेही ने कहा, 'हम अब उस स्टेज पर पहुंच चुके हैं जहां लोग समझते हैं कि जीनोम सीक्वेंसिंग क्या है और इसके क्या फायदे हैं. लेकिन हम अभी भी जीनोमिक मेडिसिन की पूरी जानकारी से काफी दूर हैं और शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी बहुत काम करने की जरूरत है.'
उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में ऐसे खास जेनेटिक काउंसलर तैयार किए जाने चाहिए जो जेनेटिक डेटा को रोजमर्रा के क्लिनिकल फैसलों में बदलने में मदद कर सकें. साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले सालों में UAE के जीनोमिक हेल्थ प्रोग्राम को बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियानों और स्क्रीनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश करना बहुत जरूरी होगा.