बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को सोशल एक्टिविस्ट नरेंद्र दाभोलकर की 2013 में हुई हत्या के मामले में दोषी सचिन अंदुरे की उम्रकैद की सज़ा पर रोक लगा दी है और उसे ज़मानत दे दी. कोर्ट ने कहा कि उसके खिलाफ सबूत "बहुत कमज़ोर" हैं और आखिरकार उसे बरी भी किया जा सकता है.
जस्टिस सारंग कोटवाल और जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले की बेंच ने गौर किया कि चश्मदीद गवाहों ने आठ साल बाद अंदुरे की पहचान की थी और अपराध में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी से जुड़ी कुछ कमियों की ओर भी इशारा किया.
अदालत ने पाया कि कोर्ट के बाहर किए गए कबूलनामा से जुड़ा सबूत बहुत कमज़ोर था. उन्होंने कहा, "गवाह के बयान की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं है. ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि आरोपी और गवाह के बीच इतनी नज़दीकी थी कि वह इस गवाह के सामने अपना अपराध कबूल करता. ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह पता चल सके कि CBI अधिकारी को कैसे पता चला कि आरोपी ने गवाह के सामने अपना अपराध कबूल किया था. इसलिए उसका बयान सबूत के तौर पर बहुत कमज़ोर है."
फैसले में कहा गया, "इस मामले में गिरफ़्तारी के बाद से ही आवेदक कमज़ोर सबूत के आधार पर लगभग छह साल से हिरासत में है, इसलिए उसे ज़मानत पर रिहा किया जाना चाहिए."
क्या था मामला?
यह मामला डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से जुड़ा है, जिन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चला रखी थी. उन्होंने 'महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति' की स्थापना की थी. वे अंधविश्वास-विरोधी बिल के मुख्य समर्थक थे. ये बिल अगस्त 2013 में महाराष्ट्र राज्य विधानसभा में कानून बनने के लिए लंबित था.
अभियोजन पक्ष के अनुसार सनातन संस्था जैसे संगठन इस बिल का विरोध कर रहे थे. आखिरकार, डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र सरकार ने 24 अगस्त 2013 को एक अध्यादेश के ज़रिए यह बिल पारित किया.
इस केस में सरकारी वकील का दावा है कि सनातन संस्था के मन में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के प्रति नफ़रत थी. सनातन संस्था 'दैनिक सनातन प्रभात' में डॉ. दाभोलकर के खिलाफ़ कई लेख प्रकाशित कर रही थी.
20 अगस्त 2013 को सुबह लगभग 7:20 बजे पुणे में डेक्कन पुलिस स्टेशन के इलाके में ओंकारेश्वर पुल पर दो लोगों ने डॉ. दाभोलकर पर गोलियां चलाईं. जख्म के कारण उनकी मौत हो गई. कुछ चश्मदीदों ने यह घटना देखी.
भरोसेमंद नहीं थे सबूत
अंडुरे की तरफ से पेश हुए वकील नितिन प्रधान ने दलील दी कि उनके क्लाइंट के खिलाफ सबूत भरोसेमंद नहीं थे, खासकर उन दो चश्मदीद गवाहों की पहचान, जिन्होंने घटना के लगभग 9 और साढ़े आठ साल बाद बिना किसी पहले 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (TIP) के उन्हें अदालत में पहचाना था.
प्रधान ने मामले में 'एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन' यानी कि अदालत के बाहर किए गए कबूलनामे को भी कमज़ोर और बिना पुष्टि वाला बताते हुए चुनौती दी और कहा कि मुख्य गवाहों और जांच अधिकारियों से पूछताछ नहीं की गई थी. उन्होंने बैलिस्टिक रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें दिखाया गया था कि दाभोलकर के शरीर से मिली गोलियां उन हथियारों से मेल खाती थीं जो दूसरों से ज़ब्त किए गए थे, जिनके ख़िलाफ़ CBI ने इस संबंध को समझाए बिना ही क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल कर दी थी.
सह-आरोपी शरद कालस्कर को मिली ज़मानत का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि समानता का सिद्धांत अंडुरे पर भी लागू होता है.
CBI के वकील अमित मुंडे ने ज़मानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया था और अपील के दौरान ज़मानत की स्टेज पर सबूतों का दोबारा विस्तृत मूल्यांकन करना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि चश्मदीदों ने अदालत में अंडुरे की पहचान की थी, जो एक ठोस सबूत है, और TIP न होने से उनकी पहचान पर कोई असर नहीं पड़ता.
उन्होंने यह भी कहा कि एक गवाह के सामने किया गया 'एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन'- जिसका बयान CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज किया गया था- मज़बूत और भरोसेमंद था और स्वतंत्र गवाहों के पास अंडुरे को झूठे मामले में फंसाने का कोई कारण नहीं था.