बर्थडे पर केक आए. उस पर मोमबत्तियां लगे. फिर सब मिलकर हैप्पी बर्थडे गाएं और आखिर में जन्मदिन मनाने वाला शख्स आंखें बंद करके मोमबत्तियां बुझा दे... ये नजारा आज दुनिया के लगभग हर हिस्से में आम है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर जन्मदिन के केक पर मोमबत्ती लगाने और उसे बुझाने की शुरुआत कब और क्यों हुई? इसके पीछे वजह क्या है?
दिलचस्प बात ये है कि केक और मोमबत्ती वाला बर्थडे सेलिब्रेशन उतना पुराना नहीं है, जितना हम सोचते हैं. मोमबत्तियां तो हजारों साल से इंसानी जिंदगी का हिस्सा रही हैं, लेकिन जन्मदिन के केक पर मोमबत्ती लगाने की परंपरा करीब 18वीं सदी में सामने आई. यानी इंसान सदियों से मोमबत्ती जला रहा था, लेकिन उसे केक पर लगाने का आइडिया काफी बाद में आया.
पहले जन्मदिन ऐसे नहीं मनाए जाते थे
आज जन्मदिन का मतलब केक, पार्टी, गिफ्ट और मोमबत्ती है. लेकिन इतिहास में ऐसा हमेशा नहीं था. लंबे समय तक जन्मदिन मनाने की परंपरा आम लोगों में थी ही नहीं. कई जगह अगर किसी का जन्मदिन याद रखा भी जाता था, तो उसका संबंध धार्मिक मान्यताओं से ज्यादा होता था.
आग को माना जाता था पवित्र
जन्मदिन की मोमबत्ती की कहानी समझने के लिए हमें आग के इतिहास तक जाना पड़ेगा. दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताओं में आग को पवित्र माना जाता था. वैदिक परंपराओं से लेकर फारस, यूनान और रोम तक धार्मिक अनुष्ठानों में आग का इस्तेमाल होता था.
लोग आग और लौ को किसी दैवी शक्ति से जोड़कर देखते थे. मंदिरों और घरों में जलने वाली लौ सिर्फ रोशनी का साधन नहीं थी, बल्कि उसे ईश्वर या किसी पवित्र शक्ति से जुड़ने का जरिया भी माना जाता था. यही वजह है कि जन्मदिन की मोमबत्ती के इतिहास को समझाते समय आग और रोशनी की इस पुरानी मान्यता का जिक्र मिलता है.
क्या जन्मदिन की मोमबत्ती का संबंध प्राचीन यूनान से है?
आपने शायद यह कहानी सुनी होगी कि जन्मदिन के केक पर मोमबत्तियां लगाने की परंपरा प्राचीन यूनान से आई. कहा जाता है कि यूनान में देवी आर्टेमिस के लिए खास तरह के केक बनाए जाते थे. इन केक पर जलती हुई मशालें लगाई जाती थीं, जो चांद की रोशनी जैसी दिखाई देती थीं.
कहानी सुनने में काफी दिलचस्प है. लेकिन इतिहासकारों के पास ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं है, जो इन केक और आज के जन्मदिन के केक के बीच सीधा संबंध साबित कर सके. यानी यह थ्योरी मशहूर जरूर है, लेकिन फिलहाल इसे इतिहास से ज्यादा एक लोककथा माना जाता है.
ईसाई धर्म आया तो जन्मदिन मनाने की परंपरा और पीछे चली गई. शुरुआती ईसाई धर्म में जन्मदिन मनाने को खास प्राथमिकता नहीं दी जाती थी. ईसाई धार्मिक कैलेंडर में जन्मदिन के बजाय बपतिस्मा, ईस्टर और संतों की मृत्यु जैसी घटनाओं को ज्यादा महत्व मिला. हालांकि मोमबत्तियां धार्मिक आयोजनों से गायब नहीं हुईं. चर्च में इनका इस्तेमाल संतों के सम्मान और दूसरे धार्मिक अवसरों पर होता रहा. यानी मोमबत्ती बची रही, लेकिन केक उससे दूर रहा.
फिर केक की वापसी हुई
समय के साथ तस्वीर बदलने लगी. मध्यकाल के आखिर में केक दोबारा खास मौकों से जुड़ने लगा. हालांकि उस समय इसे ज्यादातर अमीर परिवार ही आसानी से अफोर्ड कर सकते थे.
फिर 17वीं सदी में यूरोप के कुछ प्रोटेस्टेंट इलाकों में संतों के त्योहारों की जगह लोगों के निजी जीवन के खास मौकों को महत्व मिलने लगा. जन्मदिन, शादी और बपतिस्मा जैसे मौके ज्यादा खास तरीके से मनाए जाने लगे. यहीं से जन्मदिन और केक के बीच रिश्ता मजबूत होने लगा.
1691 में जर्मन विद्वान जोहान क्रिस्टोफ वैगेंज़ाइल ने नूर्नबर्ग शहर के बारे में लिखते हुए बच्चों के जन्मदिन के केक का जिक्र किया. इसे जन्मदिन के केक के शुरुआती लिखित प्रमाणों में से एक माना जाता है. लेकिन तब भी केक पर मोमबत्तियां लगाने की परंपरा पक्की नहीं हुई थी.
जर्मनी से जुड़ी केक और मोमबत्ती की कहानी
केक और मोमबत्ती को जोड़ने की परंपरा आमतौर पर 18वीं सदी के जर्मनी से जोड़ी जाती है. इसे बच्चों के एक खास समारोह किंडरफेस्ट से जोड़कर देखा जाता है. इस परंपरा में बच्चों के जन्मदिन को खास तरीके से मनाया जाता था. केक पर बच्चे की उम्र के हिसाब से मोमबत्तियां लगाई जाती थीं. एक अतिरिक्त मोमबत्ती भी रखी जाती थी, जिसे आने वाले जीवन और आगे बढ़ने की उम्मीद से जोड़ा जाता था.
यानी अगर बच्चा 7 साल का है, तो 7 मोमबत्तियां और एक अतिरिक्त मोमबत्ती. इस परंपरा में मोमबत्ती सिर्फ रोशनी नहीं थी. इसे बच्चे के जीवन, विकास और भविष्य से जोड़कर देखा जाता था.
जर्मन लेखक जोहान वोल्फगैंग फॉन गोएथे ने 1740 के दशक में एक जन्मदिन समारोह का जिक्र किया था. इसमें जन्मदिन के केक के चारों तरफ कई रोशनियां थीं. उन्होंने इन रोशनियों की तुलना एक वेदी यानी धार्मिक जगह पर जलने वाली रोशनी से की थी.
यह बात इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इससे पता चलता है कि उस समय भी जन्मदिन की मोमबत्तियों में सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि एक तरह का प्रतीकात्मक अर्थ देखा जाता था.
मोमबत्ती बुझाने के साथ विश मांगने की शुरुआत कैसे हुई?
अब सबसे दिलचस्प सवाल पर आते हैं. मोमबत्ती बुझाते समय विश क्यों मांगते हैं? इसका जवाब इंसान की सांस से जुड़ी पुरानी मान्यताओं में छिपा हो सकता है. कई संस्कृतियों और धार्मिक परंपराओं में सांस को जीवन या आत्मा से जोड़ा गया है. ऐसे में मोमबत्ती बुझाने के लिए अपनी सांस का इस्तेमाल करना एक तरह के प्रतीकात्मक काम जैसा बन गया.
धीरे-धीरे इसमें मन ही मन इच्छा मांगने की परंपरा भी जुड़ गई. यानी जब आप आंखें बंद करके विश मांगते हैं और फिर एक सांस में मोमबत्तियां बुझाने की कोशिश करते हैं, तो ये सिर्फ मजेदार बर्थडे गेम नहीं है. इसके पीछे इंसान की सांस, जीवन और प्रार्थना से जुड़ी बहुत पुरानी सोच की झलक भी मिलती है.
हालांकि 'विश मांगो और मोमबत्ती बुझाओ' वाली परंपरा का सबसे शुरुआती लिखित रिकॉर्ड 19वीं सदी के आखिर में मिलता है. उस समय स्विट्जरलैंड में ऐसी परंपरा का जिक्र किया गया था.
अब सवाल है कि जर्मनी की ये परंपरा पूरी दुनिया तक कैसे पहुंच गई? मोमबत्तियां लगाने और बुझाने की परंपरा जर्मनी से अमेरिका पहुंची और फिर पूरी दुनिया में फैल गई. इसमें जर्मन प्रवासियों की बड़ी भूमिका रही. 19वीं सदी में जर्मनी से अमेरिका पहुंचे लोगों के साथ जन्मदिन की ये परंपरा भी वहां पहुंची. अमेरिकी शहरों में प्रकाशित होने वाले जर्मन भाषा के अखबारों में बच्चों के ऐसे समारोहों के जिक्र मिलने लगे.
धीरे-धीरे यह परंपरा अमेरिका के मध्यम वर्ग में लोकप्रिय हो गई. 20वीं सदी की शुरुआत तक अमेरिका और ब्रिटेन में केक पर मोमबत्ती लगाना सामान्य बात बन चुकी थी. 1920 के दशक तक तो मोमबत्तियां बाकायदा बाजार में बिकने लगीं. अलग-अलग उम्र के हिसाब से मोमबत्तियों के सेट मिलने लगे. यानी जन्मदिन की मोमबत्ती अब सिर्फ परंपरा नहीं रही, बल्कि एक बिजनेस भी बन गई.
डिज्नी ने बना दिया बर्थडे का 'स्क्रिप्ट'
फिर आया सिनेमा और पॉप कल्चर का दौर. 1931 में डिज्नी ने जन्मदिन की पार्टी पर आधारित एक शॉर्ट फिल्म रिलीज की. इसमें केक, मोमबत्तियां, गाना और विश मांगने का पूरा सिलसिला दिखाया गया.
इसके बाद जन्मदिन मनाने का ये तरीका और तेजी से लोकप्रिय हुआ. परिवारों ने इसे अपनाया और धीरे-धीरे यही जन्मदिन मनाने का एक तरह का स्टैंडर्ड तरीका बन गया.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी संस्कृति, फिल्मों, टीवी, बच्चों के कार्यक्रमों और पार्टी से जुड़ी चीजों के कारोबार ने इस परंपरा को दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई.
जन्मदिन मनाने की अलग-अलग परंपरा
एक सवाल ये भी है कि क्या दुनिया के हर देश में ऐसे ही बर्थडे मनाया जाता है? ऐसे बिल्कुल नहीं था. दुनिया की हर संस्कृति में जन्मदिन पर केक और मोमबत्ती की यही परंपरा नहीं है. कई देशों ने इसे बाद में अपनाया, जबकि कई जगह जन्मदिन मनाने के तरीके बिल्कुल अलग हैं.
मसलन, घाना में जन्मदिन के दिन 'ओटो' नाम की मीठे आलू से बनी डिश खाने की परंपरा का जिक्र मिलता है. रूस में जन्मदिन पर केक की जगह खास तरह की पाई बनाई जाती है. चीन में लंबे जीवन का प्रतीक माने जाने वाले लंबे नूडल्स खाए जाते हैं. जापान में भी मोमबत्ती बुझाने की परंपरा 20वीं सदी के मध्य में अमेरिकी संस्कृति और मीडिया के प्रभाव के साथ लोकप्रिय हुई.
जर्मनी में आज भी एक अलग अंदाज है. मजेदार बात ये है कि जिस देश से मोमबत्ती वाली जन्मदिन परंपरा जुड़ी मानी जाती है, वहां आज भी कुछ परिवार इसे अलग अंदाज में निभाते हैं. जर्मनी में बच्चों के लिए लकड़ी का एक खास बर्थडे रिंग या जन्मदिन का घेरा इस्तेमाल किया जाता है. इसमें बच्चे की उम्र के हिसाब से मोमबत्तियां लगाई जाती हैं. बीच में एक बड़ी लाइफ कैंडल भी हो सकती है.
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कई परिवार इन मोमबत्तियों को तुरंत बुझाने के बजाय पूरे दिन जलने देते हैं. बच्चों के लिए यह परंपरा आमतौर पर शुरुआती उम्र में ज्यादा देखने को मिलती है.
इसलिए अगली बार जब आप किसी बर्थडे पार्टी में केक के सामने खड़े होकर आंखें बंद करें, विश मांगें और फूंक मारकर मोमबत्तियां बुझाएं, तो याद रखिए, ये सिर्फ केक काटने से पहले की रस्म नहीं है. इसके पीछे सदियों पुरानी आग, धर्म, जीवन, प्रार्थना और इंसानी परंपराओं की लंबी कहानी छिपी है. और हां, विश पूरी हो या न हो, केक मिलने की उम्मीद जरूर रखिए!