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ट्रेन के पहियों पर टायर नहीं होते, फिर वो घिसते नहीं हैं? कितने दिन में बदलते हैं?

ट्रेन के पहियों पर रबर के टायर नहीं होते, क्योंकि वे हजारों टन वजन और लंबी दूरी के लिए सटीक नहीं होते. ट्रेनों में विशेष स्टील से बने पहियों का उपयोग किया जाता है, जो स्टील की पटरियों पर कम फ्रिक्शन के साथ चलते हैं. हालांकि ये पहिए भी समय के साथ घिसते हैं, लेकिन नियमित मेंटेनेंस और री-प्रोफाइलिंग के कारण लाखों किलोमीटर तक चल सकते हैं.

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एक पहिए को कई बार री-प्रोफाइल किया जा सकता है. ( Photo: ITG)
एक पहिए को कई बार री-प्रोफाइल किया जा सकता है. ( Photo: ITG)

ट्रेन में सफर करते समय आपने कभी न कभी उसके विशाल लोहे के पहियों को जरूर देखा होगा. इन्हें देखकर कई लोगों के मन में एक सवाल आता है कि आखिर ट्रेन के पहियों पर कार या बाइक की तरह रबर के टायर क्यों नहीं होते? और जब पहिए पूरी तरह लोहे के बने होते हैं, तो क्या वे घिसते नहीं हैं? अगर घिसते हैं तो उन्हें कितने समय बाद बदला जाता है? दरअसल, ट्रेन के पहिए भी घिसते हैं, लेकिन उनका डिजाइन और इस्तेमाल का तरीका सड़क पर चलने वाले वाहनों से बिल्कुल अलग होता है. यही वजह है कि वे लाखों किलोमीटर तक चल सकते हैं.

क्यों नहीं लगाए जाते रबर के टायर?
ट्रेन का वजन हजारों टन तक हो सकता है. अगर उसके पहियों पर रबर के टायर लगाए जाएं, तो वे इतने भारी भार को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाएंगे. इसके अलावा तेज गति और लगातार घर्षण के कारण टायर बहुत जल्दी खराब हो जाएंगे. इसीलिए ट्रेनों में खास तरह के स्टील से बने पहियों का इस्तेमाल किया जाता है. स्टील के पहिए स्टील की पटरियों पर चलते हैं, जिससे फ्रिक्शन काफी कम होता है और ट्रेन कम ऊर्जा में भारी वजन खींच पाती है.

क्या ट्रेन के पहिए घिसते नहीं हैं?
ट्रेन के पहिए भी लगातार उपयोग के कारण घिसते हैं. जब पहिए पटरी पर चलते हैं, ब्रेक लगते हैं, मोड़ आते हैं या भार अधिक होता है, तब धीरे-धीरे उनकी सतह पर घिसाव होने लगता है. समय के साथ पहियों का आकार बदल सकता है, उनकी मोटाई कम हो सकती है या सतह पर दरारें और खुरदरापन आ सकता है. इसलिए रेलवे समय-समय पर पहियों की जांच करता है.

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पहियों की मरम्मत कैसे होती है?
जब पहियों में शुरुआती घिसाव दिखाई देता है, तो उन्हें तुरंत बदला नहीं जाता. पहले उन्हें व्हील लेथ मशीन (Wheel Lathe Machine) पर चढ़ाकर दोबारा सही आकार दिया जाता है. इस प्रोसेस को री-प्रोफाइलिंग कहा जाता है. इसमें पहिए की ऊपरी सतह की एक पतली परत हटाई जाती है ताकि उसका आकार और संतुलन फिर से सही हो जाए. एक पहिए को कई बार री-प्रोफाइल किया जा सकता है.

कितने दिन में बदलने पड़ते हैं पहिए?
ट्रेन के पहियों की कोई निश्चित समय सीमा नहीं होती. उनकी लाइफ टाइम कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे ट्रेन की स्पीड, भार, ट्रैक की स्थिति और उपयोग की आवृत्ति. आमतौर पर एक रेलवे पहिया करीब 5 लाख से 15 लाख किलोमीटर तक चल सकता है. कई मामलों में यह 8 से 10 साल या उससे भी अधिक समय तक उपयोग में रहता है. जब पहिए की मोटाई निर्धारित सुरक्षा सीमा से नीचे चली जाती है या उसमें गंभीर दरारें आ जाती हैं, तब उसे बदल दिया जाता है.

रेलवे कैसे रखता है निगरानी?
आधुनिक रेलवे में अल्ट्रासोनिक टेस्ट, लेजर माप और अन्य उन्नत तकनीकों की मदद से पहियों की नियमित जांच की जाती है. इससे किसी भी तरह की खराबी का पता पहले ही चल जाता है और दुर्घटनाओं की संभावना कम हो जाती है.

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ट्रेन के पहियों पर रबर के टायर नहीं होते क्योंकि वे हजारों टन वजन और लंबी दूरी के लिए उपयुक्त नहीं हैं. ट्रेन के स्टील के पहिए भी घिसते हैं, लेकिन उनकी मजबूती और नियमित रखरखाव के कारण वे लाखों किलोमीटर तक चलते हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें री-प्रोफाइल किया जाता है और सुरक्षा सीमा पूरी होने पर नए पहियों से बदल दिया जाता है. 

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