तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में एक निर्देश जारी किया था, जिस पर काफी सवाल उठ रहे हैं. दरअसल, यहां की सरकार ने प्रदेश के स्टूडेंट्स को कॉकरोच जनता पार्टी और लेफ्ट पार्टियों की ओर से आयोजित प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के निर्देश दिए गए थे. हालांकि, अब सरकार ने ये फैसला वापस ले लिया है. लेकिन, एक सवाल अभी भी है कि क्या क्या सरकार छात्रों को प्रदर्शन और आंदोलन में शामिल होने से रोक सकती है? तो समझते हैं इस पर कानून क्या कहता है...
कानून जानने से पहले आपको बता दें कि सरकार ने आदेश क्या दिया था. दरअसल, सरकार ने 14 अगस्त को सभी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार को एक आदेश भेजा गया था. इसमें स्कूल और कॉलेज के छात्रों को राजनीतिक प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा गया था. स्कूल शिक्षा विभाग, उच्च शिक्षा विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन को मिलकर इस पर नजर रखने के निर्देश दिए गए थे. लेकिन, जब इस पर बवाल हुआ तो इसे वापस ले लिया गया है.
क्या सरकार ऐसा कर सकती है?
बता दें कि सरकार की ओर से स्टूडेंट्स को प्रदर्शन में जाने से नहीं रोका जा सकता है. लेकिन, अगर किसी प्रदर्शन से हिंसा, कानून-व्यवस्था बिगड़ने या सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा है, तो प्रशासन उस प्रदर्शन पर पाबंदी लगा सकता है. लेकिन, स्टूडेंट्स को प्रदर्शन में जाने से मना नहीं किया जा सकता है. भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी बात कहने और शांतिपूर्ण तरीके से एक जगह इकट्ठा होने का अधिकार देता है. इसे आर्टिकल-19 के तहत मौलिक अधिकार मिला हुआ है. इसलिए अगर कोई छात्र किसी शांतिपूर्ण और कानूनी प्रदर्शन में शामिल होना चाहता है, तो सिर्फ यह कहकर कि वह छात्र है, उसे रोक देना सही नहीं है.
अगर किसी प्रदर्शन में हिंसा की आशंका है, हथियार हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हो रहा है या उससे गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने का खतरा है, तो पुलिस और प्रशासन उस प्रदर्शन को रोक सकते हैं या उस पर शर्तें लगा सकते हैं. लोगों का प्रदर्शन का अधिकार खत्म नहीं कर सकती.
इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मनोज के मिश्रा का कहना है कि ऐसे स्टूडेंट्स को प्रदर्शन में जाने से रोका जाना सही नहीं है. उन्होंने बताया कि सरकार बिना वजह या कारण के स्टूडेंट्स को प्रदर्शन में जाने से रोक नहीं सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने भी किया है मना
इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के वकील प्रेम जोशी ने भी बताया कि सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया जा सकता है. उन्होंने बताया, 'सुप्रीम कोर्ट ने Himat Lal K. Shah v. Commissioner of Police (1973) मामले में माना था कि सरकार सार्वजनिक जगहों पर होने वाली सभाओं को नियंत्रित करने के लिए नियम बना सकती है, लेकिन अधिकारियों को ऐसी मनमानी शक्ति नहीं दी जा सकती कि वे किसी भी सभा को अपनी मर्जी से रोक दें.
इनके अलावा रामलीला मैदान और मजदूर किसान शक्ति संगठन केस में भी कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को संविधान से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार माना था. साथ ही यह भी साफ किया कि इस अधिकार पर पब्लिक ऑर्डर और दूसरे वैध कारणों से प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है. वकील के अनुसार, किसी सरकारी सर्कुलर के जरिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सीधा बैन लगाना कई सवाल खड़े करता है. सरकार को बताना होगा कि रोक क्यों लगाई जा रही है और उसका कानूनी आधार क्या है.