मकड़ी का जाला देखते ही आमतौर पर हमारे दिमाग में एक बेहद पतला और आसानी से टूट जाने वाला धागा आता है. लेकिन अगर आपको बताया जाए कि यही धागा मजबूती के मामले में कई तरह के स्टील के वायर से टक्कर ले सकता है, तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा. वैज्ञानिकों ने अब मकड़ी के रेशम की इस खासियत के पीछे छिपे उस राज को समझ लिया है, जिसकी वजह से यह एक साथ मजबूत भी होता है और लचीला भी.
किसी पदार्थ की मजबूती मापने के लिए उसकी टेनसिल स्ट्रेंथ देखी जाती है. आसान भाषा में समझें तो किसी चीज को दोनों तरफ से खींचने पर वह टूटने से पहले कितना खिंचाव सह सकती है, यही उसकी तन्य शक्ति यानी टेनसिल स्ट्रेंथ बताती है.यानी टेनसिल स्ट्रेंथ किसी वस्तु के टूटने से पहले लगाए जा सकने वाले खिंचाव बल को दिखाता है. इसे पास्कल यानी MPa में मापा जाता है. यानी प्रति वर्ग मीटर 1 न्यूटन का फोर्स.
आखिर कितनी मजबूत होती है मकड़ी की सिल्क?
मकड़ी के रेशम की शक्ति यानी टेनसिल स्ट्रेंथ करीब 1,200 मेगापास्कल (MPa) होती है. इसकी तुलना सामान्य स्ट्रक्चरल स्टील से करें तो उसकी ताकत करीब 400 MPa बताई जाती है. यानी खींचने पर टूटने से पहले मकड़ी का जाल कई तरह के स्टील की तुलना में काफी ज्यादा दबाव सह सकता है.
हालांकि, हर तरह के स्टील से इसकी तुलना नहीं की जा सकती. कुछ हाई-स्ट्रेंथ अलॉय करीब 760 MPa तक पहुंचते हैं, जबकि खास तौर पर तैयार किए गए स्टील वायर की ताकत 2,200 MPa से भी ज्यादा हो सकती है. इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि मकड़ी का रेशम वजन के मुकाबले बेहद मजबूत प्राकृतिक पदार्थों में से एक है.
इसकी खासियत सिर्फ मजबूती नहीं है. यह स्टील की तुलना में कहीं ज्यादा लचीला भी है. टूटने से पहले मकड़ी का रेशम अपनी मूल लंबाई के करीब दोगुना तक खिंच सकता है. यानी यह एक ऐसा धागा है जो खिंचने पर तुरंत टूटता नहीं, बल्कि काफी हद तक खुद को खींच सकता है और फिर भी भारी दबाव सह सकता है.
जाले में ऐसा क्या है?
अब सवाल है कि आखिर इतना पतला धागा इतनी मजबूती हासिल कैसे कर लेता है? नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है. किंग्स कॉलेज लंदन और सैन डियागो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मकड़ी के रेशे एटॉमिक स्ट्रक्चर यानी बेहद छोटे स्तर पर इसके निर्माण को समझने की कोशिश की.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, मकड़ी का रेशा मुख्य रूप से प्रोटीन से बना होता है. ये प्रोटीन अमीनो एसिड की लंबी श्रृंखलाएं होती हैं. इनमें कुछ खास अमीनो एसिड आपस में इस तरह जुड़ते हैं, जैसे छोटे-छोटे 'चिपकने वाले बिंदु' हों. ये बार-बार बनने वाले और टूटने वाले कनेक्शन प्रोटीन को एक जगह इकट्ठा करने में मदद करते हैं. यही व्यवस्था रेशम को ऐसा ढांचा देती है, जो खींचने के साथ-साथ भारी वजन भी सह सके.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यही आपसी आकर्षण रेशम के रेशे बनने के दौरान भी बना रहता है. इससे धीरे-धीरे एक बेहद जटिल नैनो-स्ट्रक्चर तैयार होता है. यही संरचना मकड़ी के रेशम को उसकी असाधारण मजबूती और लचीलापन देती है.
मकड़ी के शरीर में पहले तरल होता है रेशम
मकड़ी जब जाला बनाती है तो वह शुरुआत में ठोस धागे के रूप में नहीं होता. मकड़ी की सिल्क ग्लैंड के अंदर रेशे बनाने वाले प्रोटीन एक गाढ़े तरल के रूप में मौजूद रहते हैं. इसे 'सिल्क डोप' कहा जाता है.
जब मकड़ी इस तरल को अपने शरीर से बाहर निकालकर जाला बुनना शुरू करती है, तो यही पदार्थ धीरे-धीरे ठोस और बेहद मजबूत फाइबर में बदल जाता है.
वैज्ञानिक लंबे समय से जानते थे कि रेशम बनने से पहले इसके प्रोटीन छोटे-छोटे तरल जैसे समूह बनाते हैं. लेकिन ये समूह आखिर किस तरह व्यवस्थित होकर मजबूत फाइबर में बदलते हैं, इसकी पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं थी. नई रिसर्च ने इसी प्रक्रिया को एटॉमिक लेवल पर समझने में मदद की है.
स्टील और केवलर से भी होती है तुलना
मकड़ी का रेशा प्राकृतिक दुनिया के सबसे खास पदार्थों में गिना जाता है. यह मकड़ी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसका इस्तेमाल वह जाला बनाने, खुद को सहारा देने और एक जगह से दूसरी जगह जाने में करती है.
इसकी खासियत की तुलना अक्सर स्टील और केवलर जैसे मजबूत पदार्थों से की जाती है. खास तौर पर वजन के हिसाब से इसकी मजबूती काफी प्रभावशाली है और इसकी टफनेस यानी ऊर्जा सहने की क्षमता भी बहुत ज्यादा है. यही वजह है कि वैज्ञानिक दशकों से मकड़ी के रेशम जैसा कृत्रिम फाइबर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इंसानों के लिए भी काम आ सकता है
अब वैज्ञानिक सिर्फ मकड़ी के जाले की नकल नहीं करना चाहते. उनका मकसद यह समझना है कि प्रकृति किस तरह मजबूत और टिकाऊ सामग्री तैयार करती है. इनसे भविष्य में, हल्के लेकिन मजबूत सुरक्षात्मक कपड़े, विमान के हल्के और मजबूत हिस्से, बायोडिग्रेडेबल मेडिकल इम्प्लांट, सॉफ्ट रोबोटिक्स के लिए फाइबर, जैसी चीजें बनाने में मदद मिल सकती है.
पतला धागा, गजब की ताकत
मकड़ी का जाला इसलिए खास नहीं है कि वह हर तरह के स्टील से ज्यादा मजबूत है. इसकी असली ताकत इस बात में है कि बहुत कम वजन के बावजूद यह बेहद मजबूत और लचीला है.